डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह
भोजपुरी की गीत परंपरा में प्रतिरोध, राग-विराग, संयोग-वियोग, संस्कार और जन सरोकारों की चेतना प्रवाहित होती रही है। वहीं इक्कीसवीं सदी के भोजपुरी गीतों में अपसंस्कृति का प्रवेश तेजी से हुआ है। बाज़ार, विज्ञापन और स्त्री देह पर केंद्रित होकर भोजपुरी गीत अश्लीलता का वाहक बन रहें हैं। जिस भोजपुरी की पहचान कबीर, भिखारी ठाकुर, रसूल मियां, महेंद्र मिसिर, अमर गीत बटोहिया के गीतकार रघुवीर नारायण, धरीक्षण मिश्र, मोती बी.ए, परगन राम और आगे चलकर गोरख पांडेय, राम जियावन दास बावला, अंजन जी, पांडेय कपिल, भोलानाथ गहमरी, कैलाश गौतम, तारकेश्वर मिश्र राही, शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास जैसे गायक-गायिकाओं और गीतकारों के साथ बनी, उसे इस दौर के तमाम नायक-नायिकाओं और एलबम के लिए गीत लिखने और गाने वाले गीतकारों ने मटियामेट किया। हालांकि, इन्हीं में से कुछ युवा गीतकारों और गायक-गायिकाओं ने भोजपुरी की वास्तविक महक और मायने को कायम रखा है।
भोजपुरी गीतों के संदर्भ में डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय का यह कथन उल्लेखनीय है, ‘हमारी ऐसी धारणा है कि भारतवर्ष में ग्राम गीतों की संपत्ति में संसार के अन्य देशों में सबसे अधिक धनवान है और भारत के अन्य प्रांतों की अपेक्षा भोजपुर प्रांत की उर्वरा भूमि इस विषय में सबसे अधिक समृद्धिशालिनी है। भोजपुरी भाषा में ग्राम गीतों का अनंत भंडार भरा पड़ा है।’ सुपरिचित भोजपुरी गीतकार पाण्डेय कपिल और भगवती प्रसाद द्विवेदी ने ‘धार के खिलाफ’ नाम से भोजपुरी गीतों का एक संकलन इक्कीसवीं सदी के शुरुआती वर्ष यानी 2001 ई. में संपादित किया। इस संकलन के प्राक्कथन में भगवती प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, ‘भोजपुरिया समाज में त गीत केंद्रीय विधे भर ना, बलुक जिनगी के धड़कनो ह। इहेन ओजह बा कि पैदाइश से लेके मउवत ले कवनो संस्कार गीत के बेगर पूरा ना होला। इहां तो मउवतो पर गीत बा आ गारियो गवाला गीते में असल में लोकजीवन की जीवंतता के निशानी ह गीत। चाहे सुख होखे भा दुःख, हँसी होखे भा विषाद, सिंगार-अहवात-मिलन होखे भा बिछोह हरेक रंग-रूप, रस-गंध के सवदगर एहसास भोजपुरी गीत करावत आइल बाड़न स।’
सुनील कुमार पाठक ने अपनी पुस्तक ‘छवि और छाप’ में लिखा है, ‘भोजपुरी लोकगीतों में भोजपुरी क्षेत्र की पूरी लोक -आस्था, लोक प्रकृति, लोक मनभावना, लोक परंपरा, लोक संस्कृति, लोक व्याप्तियां, लोक धर्म, लोक संस्कार, लोक मर्यादाएं और सीधे तौर पर कहें तो पूरी लोक आत्मा मुखरित मिलती है।’ डॉ. तैयब हुसैन अपने लेख भोजपुरी लोकगीतों में प्रतिरोध के स्वर में लिखते हैं, ‘भोजपुरी लोकगीतों में बच्चों के खेल गीत, मौसम गीत, श्रम गीत और कुछ जाति विशेष के गीत तथा पैदा होने से मृत्यु तक के संस्कार गीत हमारा ध्यान अपनी ओर खींचते जैन संझा पराती (प्रभाती), सोहर, झूमर, सोहनी रोपनी और जंतसार गीत, कजरी, होरी, चैता और बारहमासा, इन सबके विश्लेषण से यह बात छनकर आती है कि इनमें खुशी के स्वर क्षणिक हैं और दुःख के शाश्वत।’ हरिश्चंद मिश्र जी का कहना है, ‘भोजपुरी लोकगीतों में शृंगार रस में संयोग की अपेक्षा वियोग पक्ष अधिकाधिक ग्रहण किया गया है। इसी से प्रेम का सच्चा एवं सहज स्वरूप प्रस्तुत होता है। भोजपुरी लोकगीतों में वियोगजनित वेदना इतनी तीव्रता तक पहुंचती है कि करुण का पोषक बन जाती है।’
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भोजपुरी गीतों की एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत होने के बावजूद इक्कीसवीं सदी के शुरुआत में ही भोजपुरी एलबम और द्विअर्थी गानों ने ऐसी दस्तक दी कि भोजपुरी धाराप्रवाह ढंग से अश्लीलता की ओर मुड़ गई। उसके बाद तो दर्जनों चर्चित गायक-गायिका और गीतकार इस परंपरा में जुड़ते हैं, जिन्होंने द्विअर्थी गाना ही नहीं बल्कि खुले तौर पर स्त्री देह का वस्तुकरण किया। मनीष जैसल ने 30 दिसंबर 2017 को भोजपुरी की चर्चित गायिका कल्पना के संदर्भ में ‘चोली का साइज बताने वाली कल्पना को भी, भोजपुरी में अश्लीलता अब अच्छी नहीं लगती!’ शीर्षक से एक लेख में लिखा है, ‘कल्पना पटवारी आज जिस भिखारी ठाकुर के मंच से भोजपुरी में अश्लीलता को खत्म करने की बात कर रही हैं, उन्हें अपना एल्बम और उसके गीत को याद कर लेना चाहिए।… एक महिला होने के नाते भी अगर वो अपने गाये गाने पर विमर्श करें भोजपुरी सिनेमा आज जिस निचले स्तर पर है वह कभी नहीं होता।… भोजपुरी गीतों में चोली, कजरा, चुम्मा, हुक, लेजर वगैरह की जब भी चर्चा होगी तो असम में जन्मी इस लोक गायिका के योगदान को भुला पाना आसान नहीं है।’
भोजपुरी की इसी सांस्कृतिक विचलन को लक्षित करते हुए भोजपुरी गीतों की अश्लीलता के संदर्भ में दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ के हवाले से अभिषेक श्रीवास्तव लिखते हैं, ‘उस समय तक कम से कम केवाड़ी बंद कर के जो कुछ करना था किया जाता था। थोड़ा शर्म लिहाज बचा था। सात साल बाद कलकत्ता से दिनेश ने जब टेरी मारी, तो लोक संस्कृति की देह पूरी तरह उघड़ गयी। निरहुआ का पहला सार्वजनिक परिचय था खुशबू राज के साथ उनका गाना ‘निरहुआ सटल रहे’। इसके बाद वे निरहुआ कहलाए! इस समय तक मंचीय बिरहा या दंगल का कल्चर धीमा पड़ चुका था। पुराने बिरहा धुरंधर जा चुके थे। दादा पंधारी, उस्ताद हैदर अली जुगनू, बुल्लू दादा, ये सब के रहते जो आँख का पानी बचा था, 2000 के बाद धीरे-धीरे मर गया। भोजपुरी वालों को मनोज तिवारी की राह पर चलना अब आसान लग रहा था। उधर पैसा था। ग्लैमर था। इसके लिए जितनी नंगई चाहिए थी उतनी सामाजिक रूप से स्वीकार्य और अर्जित हो चुकी थी। इस नयी परिस्थिति में निरहुआ को ऊपर चढ़ने में बहुत समय नहीं लगा।’ दूसरी ओर कुछ गीतकार और गायक-गायिका अपने आरंभिक दौर में भोजपुरी क्षेत्र की सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लिखे और गाये, धार्मिक और देवी गीतों की रचना किए और उसे गाये, लेकिन उनमें से तमाम गीतकार और गायक-गायिका बड़ी जल्दी ही सस्ती और आसान लोकप्रियता की लहर में अश्लीलता पर उतर आए।
अश्लीलता की सीढ़ी चढ़कर आगे बढ़े तमाम गीतकारों और गायकों ने अश्लीलता के आरोपों को लेकर बड़ा ही सतही बयान दिया। ‘लोग सुनते ही क्यों हैं?’ ऐसा नहीं कि यह प्रश्न वाजिब नहीं है, लेकिन इस प्रश्न को उठाने वाले इसके हकदार नहीं। जन दवाब में ही सही लेकिन फूहड़ और अश्लील गीत और गायकी के जो साझेदार बन चुके हैं, उनमें से अधिकांश अश्लीलता से मुक्त भोजपुरी की वकालत कर रहें हैं, यह स्वागत योग्य है। भोजपुरी सिनेमा के चर्चित नाम रवि किशन जैसे अभिनेता और गोरखपुर से वर्तमान सांसद, जिनके ऊपर खुद फूहड़पन और अश्लीलता का आरोप लग चुका है, 21 जून 2021 को NEWS 18 को दिए गए एक साक्षात्कार में बड़ी ही महत्वपूर्ण बात कही, “हम एगो फिल्म में काम कइलीं नाम रहे पंडित जी बताईं बियाह कब होई…जेकरा में लहंगा अउर रिमोट वाला गाना रहे जेकरा खातिर हम क्षमा चाहेलीं…लेकिन एलबम के नया दौर में जे गाना परोसल जात बा उ ठीक नइखे…लोग कहेलन का हो का इहे बा भोजपुरी…बड़ा खराब लागेला…एकरा रोकना जरुरी बा।… अइसन गाने गावे से पैसा गाड़ी, घोड़ा खूब होई लेकिन समाज इहो पूछी कि पैसा कमौउल, भोजपुरी साहित्य के कहां पहुंचवला, भाषा के कहवां पहुंचवला…बुरा लगत होई जानेलीं हम…लेकिन न्यूज़ 18 के दर्शक सबन से अपील बा कि एकरा रोके के होई…परसेप्शन सेट नइखे होए दीं कि यही भोजपुरी बा…’
मनोज तिवारी मृदुल के भी कई गीतों पर अश्लीलता का आरोप लगा है। जिसमें उनके द्वारा गाए गए, ‘बेबी बीयर पी के…’ और ‘कुरती के टूट बा बटनियां’ आदि गीतों का नाम लिया जाता है। हालाँकि, मनोज तिवारी मृदुल ने भोजपुरी को अश्लीलता से मुक्त करने के संदर्भ में 21 मई 2022 को नवभारत टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा, ‘देखिए, गलतियां तो हुई हैं। उस कारण बहुत से लोगों का मन भी थोड़ा सा हटा। मैं भी उसमें शामिल हूं। मुझे लगा कि यार, ठीक नहीं हो रहा है। अभी हम भी दोबारा इसी शर्त पर जुड़ रहे है कि एक नई शुरुआत की जाए और पहले जिन भी कारणों से हमारी अच्छी चीजें भी दब गईं और वही वल्गैरिटी और अश्लीलता आगे आई, उसे हमें खत्म करना है।’
वर्ष 2024 में भोजपुरी प्रदेश के सांस्कृतिक विचलन को देखते हुए अवध क्षेत्र के वरिष्ठ हिंदी कवि अष्टभुजा शुक्ला ने वागर्थ पत्रिका में धीरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा आयोजित परिचर्चा ‘हिंदी प्रदेश की बोलियां और उनका समाज’ विषयक लेखन में भोजपुरी को लेकर एक बड़ी ही बेधक टिप्पणी की थी। उनका कहना था, वास्तव में देखा जाए तो आज भोजपुरी का बाजार सबसे ज्यादा चटका हुआ है। फिल्मों से लेकर लोकगीतों तक, कैसेटों से लेकर भक्ति के बाजार तक इसका दायरा बहुत व्यापक हो चुका है, किंतु यह तथ्य अत्यंत खेदजनक है कि भोजपुरी में भिखारी ठाकुर के, ‘विदेसिया’ जैसा मार्मिक और क्लासिक नाट्योत्सव रहने के बावजूद बाजार के दबाव ने भोजपुरी को अत्यंत सतही, फूहड़ और अश्लील बनाकर छोड़ा है। इसके लोक लुभावन गीतों ने हमारे समय की स्त्री अस्मिता और उसकी चेतना का अपमानित ढंग से चित्रण किया है। यह तथाकथित लोकसंस्कृति का फूहड़तम संस्करण है।… अवधीभाषियों की तुलना में भोजपुरीभाषी (भले ही उसे गर्दा और गंदा कर रहे हों) अभिनंदन के पात्र हैं।
वस्तुतः अब सोशल मीडिया में स्वीकार्यता ही लोकप्रियता समझी जा रही है। सोशल मीडिया में अधिक से अधिक लाइक, कमेंट और व्यूअर संख्या के ख़ातिर सस्ती और सतही गतिविधियां बड़ी तेजी से शामिल होती जा रही हैं। भोजपुरी के तमाम गीत और गाने भी इसी चपेट में हैं। बावजूद इसके यह समझा जाना चाहिए कि भोजपुरी का लोकरंग केवल वही नहीं है, जो सोशल मीडिया या मुख्यधारा की मीडिया में अश्लील गानों, फिल्मों और एलबम के रूप में प्रचारित है और दिख रहा है। अश्लीलता के समानांतर भोजपुरी की श्लील परंपरा भी ख़ूब समृद्ध हो रही है। भोजपुरी गीत परंपरा में श्लील शब्द के संदर्भ में कहना है कि अश्लीलता से मुक्त भोजपुरी में जो गीत लिखे और गाए गए हैं, वस्तुत: उन्हें ही श्लील कहा गया है। श्लील का अर्थ होता है, जो अश्लील न हो। जिसमें स्त्री देह का नग्न प्रदर्शन शामिल न हो। जो लैंगिक, जातीय-धार्मिक भेदभाव से परे सुंदर, श्रेष्ठ, सभ्य और संघर्षरत समाज का द्योतक हो।
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भोजपुरी की श्लील गीत-परंपरा को नई पहचान देने में लोकगायिका चंदन तिवारी और गायक दुर्गेश उपाध्याय का योगदान उल्लेखनीय है। ‘पुरबिया तान’ के माध्यम से वे भोजपुरी लोकगीतों की समृद्ध सांगीतिक विरासत को जिस संवेदनशीलता और सौंदर्य के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं, वह न केवल श्रवणीय है, बल्कि नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्पद भी है। कबीर, भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिसिर, रसूल मियां, कैलाश गौतम जैसे बेहतरीन गीतकारों के गीतों को चंदन तिवारी ने बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से गाया है। अभी किशोयवय की गायिका मैथिली ठाकुर ने मिथिला और भोजपुरी के लोक संस्कार के गीतों को गाकर भोजपुरी को ख़ूब मान दिया है। मैथिली ठाकुर का अपना ‘यू-ट्यूब चैनल’ भी है। इस चैनल पर मैथिली और भोजपुरी की मिठास और महक बिखरी हुई है। नेहा सिंह राठौर ने राजनीतिक विसंगतियों पर प्रहार के गीतों के अलावा दांपत्य और पारिवारिक संस्कार से भी संबंधित कई मनोहर गीतों को लिखा भी है और गाया भी है।
इस बीच कई हिंदी फिल्मों में, मसलन ‘आर्टिकल 15’ (2019) फ़िल्म के लिए शकील आज़मी का लिखा गीत ‘कहब त लग जाई धक से…’, ‘भीड़’ (2023) फ़िल्म में डॉ. सागर द्वारा लिखा गीत ‘खुनवा पसीना शहरिया में भईया/ कौड़ी के भाव में बिकायल बा/ चल उड़ चल सुगुणा गांववा के ओरिया/जहाँ माटी में सोना हेराइल बा…/’ और ‘महारानी 2’ (2022) वेब सीरीज में डॉ. सागर द्वारा लिखा और जिसे शारदा सिन्हा ने गाया है, ‘सेनुरा धुंआइ गइले/ रहिया अन्हार भइले/ पियवा हमार होइ गए निर्मोहिया…’ जैसे भोजपुरी के सुंदर और प्रतिरोध के गीत सुनने को मिले हैं।
कैलाश गौतम के गीत तो भोजपुरी गीतों की थाती की तरह है। ‘अमौसा क मेला’ और ‘गान्ही जी’ जैसे गीत भोजपुरी की मिठास और प्रतिरोध दोनों की बानगी है। गान्ही जी गीत का एक अंश गौरतलब है, ‘सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी/देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्हीर जी/ बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्ही जी/ तोहरे घर क रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्ही जी/’ हिंदी के कवि माने जाने वाले गोरख पांडेय ने प्रतिरोधी चेतना से लैस भोजपुरी में एक से बढ़कर एक गीत लिखा। उनका एक गीत ख़ूब लोकप्रिय है, ‘समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई/ समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई/ हाथी से आई/ घोड़ा से आई/ अँग्रेज़ी बाजा बजाई/ समाजवाद…/ नोटवा से आई/ वोटवा से आई/ बिड़ला के घर में समाई/ समाजवाद…/ गांधी से आई/ आँधी से आई/ टुटही मड़इयो उड़ाई/ समाजवाद…/’
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तारकेश्वर मिश्र राही का एक बहुत ही मार्मिक भोजपुरी गीत यहाँ उल्लेखनीय है, ‘खेत बारी बट जाई/ अरे अंगना दुवरवा, पाई पाई विरना/ हो कईसे भाई के सनेहिया बाटल जाई विरना/ कईसे भाई के सनेहिया बाटल जाई विरना/’ यह गीत पारिवारिक बंटवारे में भाई-भाई के बीच के संवाद का है। दहेज की आग में भोजपुरी क्षेत्र भी ख़ूब जलता है। दहेज से प्रताड़ित बेटियों और बाप के लिए भोजपुरी में बहुत ही मार्मिक गीत मौजूद हैं। भरत शर्मा व्यास के लिखे और गाए एक गीत के बोल आज भी बहुत विचलित करते हैं। वह गाते हैं, ‘जनती जे जारल जईबू आग में दहेज के/ पाप नहीं करती बेटी ससुरा में भेज के…/” चंदन तिवारी ने ‘पुरबिया तान’ नामक अपने यू-ट्यूब चैनल के जरिए भोजपुरी की विरासत को ख़ूब गमकाया है। भोजपुरी के तमाम ख्यातिलब्ध और गुमनाम गीतकारों की बेजोड़ गीतों को वह सुमधुर ढंग से गा रहीं हैं।
विगत वर्षों में कुछ युवा गीतकारों ने भोजपुरी गीतों की श्लील परंपरा में महती योगदान दिया है। युवा गीतकार सुशांत शर्मा की एक रचना ‘बारहमासा’ का एक गीत खूब सुना और पसंद किया जा रहा है, ‘कहियो आवऽ न हमारा मकान चिरई…’ एक दूसरे गीत में सुशांत गाते हैं, ‘लोहे की टंगुलिया से बगिया में बाबा, कटिहा न अमवा के सोर हो…’, तथा ‘असमान में दरार परे तो परे…’ मार्मिक और बेजोड़ संदेशपरक गीत हैं। पिया और प्रेम को लेकर नेहा सिंह राठौर के एक गीत से भोजपुरी गीतों की श्लील परंपरा का परिचय मिलता है। गाने का बोल है, ‘हमरी राजा जी के गलिया पर तिल ए सखि/ हमरे पियवा बिना निक नइखे लागत ए सखि…’ श्लील परंपरा में युवा पीढ़ी के अग्रज गीतकार मनोज भावुक के गीतों और गजलों में बड़ी कसक और प्रेम भावों की सुंदर व्यंजना है। अपने काव्य संग्रह ‘चलनी में पानी’ के गीत खंड में उनका एक गीत उल्लेखनीय है, ‘नेह तहरा से लागल अंजोर हो गइल/सांच मानऽ जिनिगिया में भोर हो गइल/’ एक अन्य गीत में लिखते हैं, ‘पिरितिया लगा के भुला त न जइबऽ/ हिया में समा के परा त न जइबऽ/’
दरअसल, अब यह बात हाशिए पर जा रही है कि गीतों की दुनिया में भोजपुरी का रंग कितना स्वस्थ और चटक रहा है। वह कितना जनपक्षधर और संयोग-वियोग के सुंदर शब्दों का तान रही है। हाशिए पर ही सही लेकिन आज भी भोजपुरी के अनेक गीतों का राग-रंग और तान बेहद मर्मस्पर्शी और जनपक्षधर है। इक्कीसवीं सदी में तकनीक प्रदत्त यू-ट्यूब और फेसबुक के जरिए भोजपुरी लोक की परंपरागत और उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे नए गीतों की उपस्थिति सुखद है। जिसमें शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, मालिनी अवस्थी के अलावा नए लोगों में चंदन तिवारी, मनोज भावुक, मैथिली ठाकुर, सुशांत शर्मा, डॉ. सागर आदि ने भोजपुरी गीतों के वास्तविक रंग को ख़ूब चटक किया है। यहाँ यह भी गौरतलब है कि यदि इस दौर के डिजिटल परिवेश में भोजपुरी की स्वस्थ सांस्कृतिक गरिमा, मिठास और हास्य-प्रहसन को देखना हो तो भोजपुरी के कुछ डिजिटल मंच उल्लेखनीय हैं, जिसमें https://youtube.com/@viralkalakar या https://youtube.com/@mintuaa से गुजरना भोजपुरी के लिए एक सुखद अनुभूति की तरह है। भोजपुरी के सांस्कृतिक परिदृश्य की बेहतरी के लिए जितने भी प्रयास हो रहें हैं, वही भोजपुरी की मूल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं। आज जरूरत उन्हें ही संरक्षित और प्रोत्साहित करने की है। मुझे लगता है कि Bhojpuri24.com का जो यह डिजिटल अभियान शुरू हुआ है, वह निश्चित ही भोजपुरी के भाषिक वैभव के जागरण में अपना उल्लेखनीय योगदान दे सकेगा।
(लेखक का निजी विचार है)
लेखक परिचय- डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक, परास्नातक एवं डी. फिल की उपाधि प्राप्त की है। महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से ‘इक्कीसवीं सदी में गाँव’ विषय पर इन्हें एम.फिल की उपाधि प्राप्त हुई है। हाल ही में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही इक्कीसवीं सदी में भोजपुरी भाषी लोक जीवन विषय पर पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च पूरा किया है। आप ‘धवल’ उपनाम से कविताएं भी लिखते हैं। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में इन्होंने ‘लोक एवं जलस्रोत’ विषयक शोध पत्र भी प्रस्तुत किया है। जिसे मिडिल ईस्ट टेक्निकल यूनिवर्सिटी, तुर्की की प्रोफेसर स्मिता जस्सल द्वारा प्रशंसित भी किया गया। आकाशवाणी, प्रयागराज एवं दूरदर्शन केंद्र मऊ से इनकी वार्ता भी प्रसारित हो चुकी है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज और साहित्य भंडार, प्रयागराज से इनकी अनूदित एवं संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में आप झारखंड सरकार के स्कूली शिक्षा विभाग में बतौर हिंदी शिक्षक कार्यरत हैं।

