भोजपुरी के शेक्सपियर क्यों कहलाए भिखारी ठाकुर?

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Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला में आज पढ़िए उस महान लोकनाट्यकार, कवि और समाज सुधारक की कहानी, जिसने अपनी कलम, रंगमंच और लोकगीतों के माध्यम से भोजपुरी समाज की आत्मा को आवाज दी। आज उनकी पुण्यतिथि (10 जुलाई 1971) है। भोजपुरी के शेक्सपियर और भोजपुरी रंगमंच के जनक कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर का पूरा जीवन मातृभाषा भोजपुरी, लोकसंस्कृति और सामाजिक चेतना को समर्पित रहा। उन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं-बिदेसिया, गबरघिचोर, गंगा स्नान और बेटी वियोग के जरिए प्रवासन, दहेज, बाल विवाह, स्त्री अस्मिता और सामाजिक कुरीतियों जैसे ज्वलंत मुद्दों को जन-जन तक पहुंचाया। प्रसिद्ध साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें ‘अनगढ़ हीरा’ कहा था। आज उनकी पुण्यतिथि पर आइए जानते हैं उस लोकनायक की प्रेरक कहानी, जिसने भोजपुरी को गांव की चौपाल से उठाकर राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान दिलाई।

अगर शहनाई की बात होती है तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खान याद आते हैं, हॉकी का नाम लिया जाता है तो मेजर ध्यानचंद का चेहरा सामने आता है और जब भोजपुरी भाषा, संस्कृति और लोकजीवन की चर्चा होती है तो सबसे पहले जिस महान व्यक्तित्व का नाम सामने आता है, वह हैं भिखारी ठाकुर।

भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर केवल एक नाटककार नहीं थे। वे एक युग निर्माता थे, जिन्होंने बिना किसी बड़े साहित्यिक संस्थान, विश्वविद्यालय या राजकीय संरक्षण के अपनी लोकभाषा को समाज की आवाज बना दिया। उन्होंने गांव की गलियों, खेत-खलिहानों और आम लोगों के जीवन से कथाएं उठाईं और उन्हें रंगमंच पर इस तरह प्रस्तुत किया कि लाखों लोग अपने जीवन की झलक उनमें देखने लगे।

उन्होंने भोजपुरी को केवल भाषा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक बदलाव का माध्यम बना दिया। उनके गीतों में पीड़ा थी, नाटकों में संघर्ष था और संवादों में समाज को बदलने की बेचैनी थी।

सारण की मिट्टी से निकला लोकनायक

18 दिसंबर 1887 को बिहार के सारण जिले (छपरा) के कुतुबपुर गांव में जन्मे भिखारी ठाकुर का बचपन सामान्य परिस्थितियों में बीता। उनके पिता का नाम दलसिंगार ठाकुर और माता का नाम शिवकली देवी था। वे सामाजिक रूप से साधारण परिवार से आते थे। शुरुआती शिक्षा बहुत सीमित रही, लेकिन सीखने और समझने की उनकी इच्छा असाधारण थी।

उन्होंने कैथी लिपि का ज्ञान प्राप्त किया और लोकजीवन को अपना सबसे बड़ा विद्यालय बनाया। उनके लिए किताबों से ज्यादा महत्वपूर्ण था समाज को पढ़ना। गांव के लोगों की परेशानियां, महिलाओं की पीड़ा, मजदूरों का संघर्ष और गरीब परिवारों की समस्याएं ही उनकी रचनाओं की प्रेरणा बनीं।

भिखारी ठाकुर ने महसूस किया कि समाज में ऐसी अनेक आवाजें हैं जिन्हें कोई मंच नहीं मिलता। उन्होंने उन्हीं दबे हुए अनुभवों को अपनी कला का आधार बनाया।

मजदूरी की तलाश में बंगाल पहुंचे, वहीं मिला कलाकार का रास्ता

जीवन की परिस्थितियों ने उन्हें रोजगार की तलाश में बंगाल पहुंचाया। उस समय बड़ी संख्या में बिहार और पूर्वांचल के लोग काम की तलाश में बंगाल, असम और अन्य क्षेत्रों में जाते थे। यही प्रवासन बाद में उनके सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हुआ।

बंगाल में रहते हुए उन्होंने रामलीला, बंगला जात्रा और लोकनाट्य परंपराओं को करीब से देखा। यही अनुभव उनके भीतर छिपे कलाकार को बाहर लेकर आया।

उन्होंने समझा कि नाटक केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि समाज से संवाद करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। वापस गांव लौटने के बाद उन्होंने अपनी नाच मंडली बनाई और भोजपुरी लोकमंच को एक नई दिशा दी।

जब गांव-गांव पहुंचा भिखारी ठाकुर का रंगमंच

उस दौर में न सिनेमा की पहुंच थी और न ही मनोरंजन के आधुनिक साधन। ऐसे समय में भिखारी ठाकुर की नाच मंडली गांव-गांव जाकर लोगों तक पहुंचती थी।

उनके कार्यक्रमों में हजारों की भीड़ जुटती थी। लोग सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं आते थे, बल्कि अपनी जिंदगी की कहानियां देखने आते थे।

उनके पात्र कोई काल्पनिक दुनिया के राजा-महाराजा नहीं थे। वे खेत में काम करने वाले किसान थे, मजदूरी करने वाले लोग थे, संघर्ष करती महिलाएं थीं और समाज के वे लोग थे जिनकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती थी।

यही कारण था कि भिखारी ठाकुर का रंगमंच सीधे जनता के दिल से जुड़ गया।

‘बिदेसिया’ बना भोजपुरी समाज का आईना

भिखारी ठाकुर की सबसे प्रसिद्ध कृति ‘बिदेसिया’ है। यह केवल एक नाटक नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज के प्रवासी जीवन का दस्तावेज है।

इस नाटक में उन्होंने उस दर्द को दिखाया जब रोजगार के लिए पुरुष गांव छोड़कर दूर शहरों में चले जाते थे और पीछे रह जाती थीं उनकी पत्नियां, परिवार और अधूरे सपने।

‘बिदेसिया’ का नायक कोई आदर्श पुरुष नहीं है। वह अपनी कमजोरियों, गलतियों और स्वार्थ के साथ एक आम इंसान है। भिखारी ठाकुर ने समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाई, न कि केवल आदर्शों की दुनिया बनाई।

यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने जीवन को उसी रूप में स्वीकार किया जैसा वह था।

भिखारी ठाकुर ने लोक को साहित्य का सम्मान दिलाया

भिखारी ठाकुर से पहले भी भोजपुरी में साहित्य रचा जा रहा था, लेकिन उन्होंने भोजपुरी लोकजीवन को उस ऊंचाई तक पहुंचाया जहां आम आदमी की कहानी साहित्य का विषय बन गई।
उनके नाटक ‘बिदेसिया’, ‘गबरघिचोर’, ‘बेटी वियोग’, ‘भाई विरोध’, ‘गंगा स्नान’, ‘नाई बहार’ और अन्य रचनाओं में समाज के अलग-अलग पक्ष दिखाई देते हैं। उन्होंने दहेज, बाल विवाह, नशाखोरी, अशिक्षा, पारिवारिक टूटन और महिलाओं की समस्याओं पर खुलकर सवाल उठाए। उनकी कला का उद्देश्य केवल तालियां बटोरना नहीं था, बल्कि समाज को सोचने के लिए मजबूर करना था।

भिखारी ठाकुर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने उन विषयों को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया, जिन पर समाज अक्सर चुप रहना चाहता था। उन्होंने लोकजीवन के उन हिस्सों को मंच पर जगह दी, जिन्हें साहित्य और संस्कृति की मुख्यधारा में लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता रहा।

वे जानते थे कि समाज की असली तस्वीर महलों में नहीं, बल्कि गांव की चौपालों, गरीबों के घरों और आम लोगों के संघर्षों में छिपी होती है। इसलिए उनकी रचनाओं में किसान, मजदूर, प्रवासी, महिलाएं, बुजुर्ग और समाज के कमजोर वर्ग मुख्य पात्र बने।

‘गबरघिचोर’ रिश्तों और सामाजिक नैतिकता पर बड़ा सवाल

भिखारी ठाकुर का नाटक ‘गबरघिचोर’ उनकी सबसे चर्चित और साहसिक रचनाओं में शामिल है। इस नाटक में उन्होंने विवाह, प्रवासन, स्त्री की स्थिति और पितृत्व जैसे जटिल सवालों को उठाया।

राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण ...

कहानी एक ऐसी महिला के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है जिसका पति रोजगार के लिए बाहर चला जाता है। अकेलेपन और परिस्थितियों के बीच उसके जीवन में बदलाव आते हैं और बाद में बच्चे के अधिकार को लेकर विवाद खड़ा होता है।

इस नाटक की खास बात यह है कि भिखारी ठाकुर ने केवल पुरुष दृष्टिकोण से कहानी नहीं कही, बल्कि महिला के पक्ष को भी मजबूती से सामने रखा।

उस दौर में जब समाज में महिलाओं की आवाज को सीमित रखा जाता था, भिखारी ठाकुर ने मंच पर महिला पात्रों को अपनी बात रखने का साहस दिया।

स्त्री को बनाया संघर्ष और स्वाभिमान का प्रतीक

भिखारी ठाकुर के नाटकों में महिलाएं केवल दुख सहने वाली पात्र नहीं हैं। वे सवाल करती हैं, विरोध करती हैं और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती हैं।

‘बिदेसिया’ की पत्नी हो या ‘गबरघिचोर’ की गलीज बहू, उनके पात्र समाज की वास्तविक महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भिखारी ठाकुर ने दिखाया कि गरीबी और सामाजिक दबाव के बावजूद महिलाओं के भीतर आत्मसम्मान और निर्णय लेने की क्षमता होती है।

यही कारण है कि आधुनिक दृष्टि से देखने पर उनके नाटक स्त्री विमर्श के महत्वपूर्ण दस्तावेज नजर आते हैं।

समाज की कुरीतियों पर सीधा प्रहार

भिखारी ठाकुर का रंगमंच सुधारवादी आंदोलन का हिस्सा था। उन्होंने अपने नाटकों के जरिए समाज की कई बुराइयों पर हमला किया।

उन्होंने दहेज प्रथा का विरोध किया, बाल विवाह की समस्या उठाई, नशाखोरी के नुकसान बताए, प्रवासन से टूटते परिवारों की पीड़ा दिखाई, अशिक्षा के खिलाफ आवाज उठाई, महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की बात की। उनकी भाषा इतनी सरल थी कि गांव का सामान्य व्यक्ति भी उनके संदेश को आसानी से समझ पाता था।

‘गंगा अस्नान’ और बुजुर्गों की पीड़ा

भिखारी ठाकुर केवल युवा और महिलाओं के सवालों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने समाज के बुजुर्गों की समस्याओं को भी अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

‘गंगा अस्नान’ जैसे नाटकों में उन्होंने धार्मिक आस्था, सामाजिक व्यवहार और मानवीय संवेदनाओं के बीच के अंतर को दिखाया।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल कर्मकांड से समाज बेहतर हो सकता है या इसके लिए इंसानियत और संवेदना भी जरूरी है।

इसी तरह ‘बुढ़शाला के बयान’ में उन्होंने बुजुर्गों की उपेक्षा और उनकी पीड़ा को सामने रखा।

उनकी दृष्टि व्यापक थी। वे समाज के हर उस व्यक्ति की आवाज बनना चाहते थे, जिसकी बात कोई नहीं सुन रहा था।

राहुल सांकृत्यायन ने पहचानी थी भिखारी ठाकुर की प्रतिभा

भिखारी ठाकुर की प्रतिभा को बड़े साहित्यकारों ने भी स्वीकार किया। प्रसिद्ध लेखक और विचारक राहुल सांकृत्यायन ने 1947 में आयोजित द्वितीय अखिल भोजपुरी साहित्य सम्मेलन में भिखारी ठाकुर की कला की प्रशंसा की थी।

उन्होंने कहा था कि भोजपुरी भाषा की ताकत और क्षमता भिखारी ठाकुर के नाटकों में दिखाई देती है। उनके नाटकों को देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जुटना उनकी लोकप्रियता और प्रभाव का प्रमाण है।

राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें ‘अनगढ़ हीरा’ कहा था, जिसमें अद्भुत प्रतिभा मौजूद थी। यह टिप्पणी बताती है कि भिखारी ठाकुर केवल लोक कलाकार नहीं थे, बल्कि भोजपुरी साहित्य की बड़ी शक्ति थे।

भिखारी ठाकुर का रंगमंच, मनोरंजन से आगे सामाजिक आंदोलन

आज जिस तरह सिनेमा और डिजिटल माध्यम समाज को प्रभावित करते हैं, अपने समय में भिखारी ठाकुर का नाटक वही भूमिका निभाता था। उनका मंच गांव के लोगों का अखबार था। उनके संवाद समाज की खबर थे और उनके गीत लोगों की भावनाओं की आवाज थे।

उन्होंने लोकगीत, संगीत, अभिनय और संवाद को मिलाकर भोजपुरी रंगमंच की ऐसी शैली विकसित की, जिसकी अपनी अलग पहचान बनी। उनकी मंडली में कलाकारों के साथ-साथ सामाजिक संदेश भी चलता था। उन्होंने साबित किया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम हो सकती है।

लवंडा नाच को दी सांस्कृतिक पहचान

भिखारी ठाकुर ने लोकनाट्य की उस परंपरा को भी सम्मान दिलाया जिसे लंबे समय तक उच्च संस्कृति का हिस्सा नहीं माना जाता था। उन्होंने लवंडा नाच, लोकगीत और पारंपरिक अभिनय शैली को अपनाकर उसे सामाजिक संदेश का माध्यम बनाया।

उन्होंने लोक की भाषा और लोक की शैली को अपनाने में कभी संकोच नहीं किया। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। भिखारी ठाकुर ने साबित किया कि महान कला के लिए महंगे मंच और बड़े संसाधन नहीं, बल्कि समाज की गहरी समझ और संवेदनशील हृदय चाहिए।

भोजपुरी के शेक्सपियर क्यों ?

अंग्रेजी साहित्य में विलियम शेक्सपियर ने अपने समय के समाज, रिश्तों और मानवीय भावनाओं को अपनी रचनाओं में जिस गहराई से प्रस्तुत किया, उसी तरह भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी समाज के जीवन को अपनी रचनाओं में उतारा।

उन्होंने राजा-महाराजाओं की कहानियां नहीं लिखीं, बल्कि गांव के साधारण लोगों की जिंदगी को अपनी कला का विषय बनाया। उनके नाटकों में खेतों में मेहनत करता किसान है, रोजी की तलाश में घर छोड़ता मजदूर है, इंतजार करती पत्नी है, संघर्ष करती मां है, सामाजिक बंधनों से जूझती बेटी है, और बदलाव की उम्मीद करता आम इंसान है। यही वजह है कि उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है।

भिखारी ठाकुर की रचनाएं आज भी क्यों जीवित हैं?

किसी भी महान रचनाकार की पहचान यही होती है कि उसकी रचनाएं समय बदलने के बाद भी प्रासंगिक बनी रहें। भिखारी ठाकुर के नाटक आज भी इसलिए जीवित हैं क्योंकि उनमें उठाए गए सवाल आज भी समाज के सामने मौजूद हैं। आज भी लाखों लोग रोजगार के लिए गांव छोड़कर शहरों और विदेशों में जाते हैं। आज भी परिवारों में दूरी, अकेलापन और रिश्तों की चुनौतियां हैं। ‘बिदेसिया’ आज भी प्रवासी जीवन की पीड़ा को समझने का सबसे बड़ा दस्तावेज है। आज भी महिलाओं के सम्मान, सामाजिक समानता और मानवीय रिश्तों की चर्चा होती है तो भिखारी ठाकुर की रचनाएं प्रासंगिक नजर आती हैं।

साहित्यकार नहीं, जनता के कलाकार थे भिखारी ठाकुर

भिखारी ठाकुर को केवल साहित्य की कसौटी पर देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे जनता के कलाकार थे। उन्होंने साहित्य को किताबों से निकालकर मंच तक पहुंचाया और मंच को समाज के बीच ले गए। उनका रंगमंच किसी बंद सभागार का रंगमंच नहीं था। वह गांव की चौपालों, मेलों और खुले मैदानों का रंगमंच था। उनके दर्शक साहित्य के बड़े आलोचक नहीं थे, बल्कि किसान, मजदूर, महिलाएं और सामान्य ग्रामीण थे। लेकिन यही सामान्य लोग उनकी सबसे बड़ी ताकत बने।

भिखारी ठाकुर और भोजपुरी की सांस्कृतिक पहचान

भोजपुरी आज दुनिया के कई देशों में बोली जाती है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों में बसे भोजपुरी भाषी समुदायों के लिए भोजपुरी केवल भाषा नहीं, बल्कि पहचान है। इस पहचान को मजबूत करने वालों में भिखारी ठाकुर का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने भोजपुरी को केवल मनोरंजन की भाषा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे विचार, संघर्ष और सामाजिक चेतना की भाषा बनाया।

आखिरी समय तक जारी रहा रचनात्मक सफर

18 दिसंबर 1887 को जन्मे भिखारी ठाकुर का निधन 10 जुलाई 1971 को हुआ, लेकिन उनका रचनात्मक जीवन आज भी लोगों के बीच जीवित है। उन्होंने लगभग तीन दर्जन के करीब रचनाओं के माध्यम से भोजपुरी समाज का सामाजिक दस्तावेज तैयार किया। उनके गीत आज भी गाए जाते हैं, उनके नाटक आज भी मंचित होते हैं और उनके संवाद आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करते हैं।

नई पीढ़ी के लिए भिखारी ठाकुर का संदेश

आज जब डिजिटल दौर में भाषाएं तेजी से बदल रही हैं, भिखारी ठाकुर का जीवन नई पीढ़ी को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है-अपनी भाषा और संस्कृति को सम्मान देकर ही कोई समाज अपनी पहचान बचा सकता है। उन्होंने साबित किया कि अपनी मिट्टी से जुड़कर भी दुनिया तक पहुंचा जा सकता है। उनका संघर्ष बताता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति और आत्मा होती है।

अमर हैं भोजपुरी के महान पुरोधा

भिखारी ठाकुर चले गए, लेकिन उनकी आवाज आज भी भोजपुरी समाज में गूंज रही है। उन्होंने अपने जीवन से साबित किया कि एक कलाकार केवल मनोरंजन नहीं करता, वह समाज का इतिहास भी लिखता है। भोजपुरी के इस महान पुरोधा ने लोकमंच को सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया और लाखों लोगों के जीवन को अपनी कला से छुआ।

इसलिए भिखारी ठाकुर केवल एक नाम नहीं हैं, वे भोजपुरी की पहचान हैं। वे भोजपुरी की आत्मा हैं। वे भोजपुरी लोकचेतना के सबसे बड़े प्रहरी हैं। भोजपुरी जब तक जीवित रहेगी, भिखारी ठाकुर का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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