डॉ. संतोष पटेल
जन्मदिन विशेष: शैलेंद्र ने भारत की पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ (रिलीज वर्ष 1963) के सभी प्रसिद्ध गाने लिखे। उनके पूर्वज मूल रूप से बिहार के भोजपुर (आरा) जिले के रहने वाले थे।
हिंदी और भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में गीतकार शैलेंद्र के नाम की एक ऐसी अमिट छाप है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। कवि शैलेंद्र सही मायने में ‘उम्मीदों के गीतकार’ थे। 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) जन्मे शैलेंद्र का शुरुआती दौर काफी संघर्षमय और जनवादी तेवर से भरा रहा। रेलवे वर्कशॉप में मजदूरी करते हुए उन्होंने ‘तू जिंदा है, तो जिंदगी की जीत में यकीन कर’ और ‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’ जैसे क्रांतिकारी गीत लिखकर जनवादी कवियों में अपनी अलग पहचान बनाई।
जब राज कपूर ने शैलेंद्र को एक कवि सम्मेलन में सुना और अपनी फिल्म ‘बरसात’ (1949) के लिए गीत लिखने का निमंत्रण दिया, तो शुरुआत में शैलेंद्र ने स्वाभिमान के कारण इसे ठुकरा दिया। बाद में जब उन्हें आर्थिक आवश्यकता हुई, तो उन्होंने राज कपूर से सहायता ली और फिल्म के लिए गीत लिखे। इसके बाद राज कपूर और शैलेंद्र की जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे सफल और अमर जोड़ियों में गिनी जाने लगी। ‘आवारा हूँ’, ‘गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ’ से लेकर ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ और ‘तीसरी कसम’ तक, शैलेंद्र का रचना-कर्म जनमानस की आवाज बन गया।
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हिंदी सिनेमा में शैलेंद्र के गीतों पर तो खूब चर्चा हुई, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भोजपुरी भाषा, लोक-संस्कृति और अपनी मिट्टी से उनका कितना गहरा लगाव था। शैलेंद्र का परिवार मूल रूप से बिहार के आरा जिले के ‘अख्तियारपुर’ गाँव से था। उनके घर में भोजपुरी बोली जाती थी। वर्ष 2019 में जब उनकी बेटी अमला शैलेंद्र मजूमदार अपने पूर्वजों के गाँव अख्तियारपुर गईं, तो वहाँ के बुजुर्गों से बातचीत में यह बात सामने आई कि शैलेंद्र की जड़ों में भोजपुरी संस्कृति गहराई से रची-बसी थी।
इसी कारण जब 1961-62 के आसपास भारत की पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण की शुरुआत हुई, तो संगीतकार चित्रगुप्त के साथ गीतकार के रूप में शैलेंद्र को भी चुना गया। वर्ष 1962 में प्रदर्शित यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म मानी जाती है। इसके गीतों ने भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा।
‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ का शीर्षक गीत—
‘हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो,
सैंयाँ से करि दे मिलनवा, हाय राम।’
यह गीत सीधे लोकमानस से उपजी ऐसी रचना प्रतीत होता है, जिसमें भोजपुरी समाज की आस्था, प्रेम और लोक-संवेदना एक साथ दिखाई देती है। आज भी यह गीत भोजपुरी समाज के हर घर और हर पीढ़ी के कंठहार की तरह जीवित है।
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इसी फिल्म में शैलेंद्र ने बिदेसिया परंपरा को अपनाते हुए ‘लोगवा नजर लगावेला’ और ‘अंगिया लगवले रे, दगिया लगवले’ जैसे मार्मिक गीत लिखे। फिल्म का विदाई गीत—‘सोनवा के पिंजरा में बंद भइल हाय राम, चिरई के जियवा उदास’—मोहम्मद रफी की अत्यंत कारुणिक आवाज में आज भी श्रोताओं की आँखें नम कर देता है। इन गीतों में भोजपुरी लोकजीवन, स्त्री की पीड़ा, विरह और सामाजिक यथार्थ का अत्यंत संवेदनशील चित्रण मिलता है।
फिल्म ‘नैहर छूटल जाए’ में संगीतकार जयदेव के संगीत के साथ शैलेंद्र के गीतों का एक अलग ही मिजाज देखने को मिलता है। मोहम्मद रफी का गाया गीत—‘जियरा कसक-मसक मोर रहे लागल, मन में आके केहू चोर रहे लागल’—मन को आनंद और उल्लास से भर देता है। इसी फिल्म में मुबारक बेगम और मीनू पुरुषोत्तम के स्वर में प्रस्तुत बारहमासा और कजरी शैली का गीत—‘चढ़ला आषाढ़, भरेला सब नदिया, सूझे न आर न पार रे’—में आषाढ़ से चैत तक के विरह और भावनात्मक स्मृतियों का बेहद सुंदर चित्रण मिलता है।
शैलेंद्र ने जनवादी तेवर और क्रांतिकारी कविता से निकलकर हिंदी और भोजपुरी सिनेमा को साहित्य तथा लोक-संस्कृति से जिस तरह जोड़ा, वह अभूतपूर्व था। ‘तीसरी कसम’ फिल्म बनाने के जुनून में उनकी अपनी आर्थिक पूँजी तक डूब गई। 14 दिसंबर 1966 को महज 43 वर्ष की उम्र में यह महान गीतकार हमें छोड़कर चला गया। अपने अंतिम दिनों में उन्होंने लिखा था—
‘रुला के गया सपना मेरा,
बैठी हूँ कब हो सबेरा…’
आज जब भोजपुरी सिनेमा और गीत-संगीत अपनी गौरवशाली विरासत से भटकता हुआ दिखाई देता है, तब शैलेंद्र के रचे गीत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का रास्ता दिखाते हैं। उनके भोजपुरी गीत यह सिखाते हैं कि बिना अश्लीलता के भी लोक-संस्कृति, मानवीय संवेदना और मिट्टी की सोंधी खुशबू से अमर रचनाएँ रची जा सकती हैं। उम्मीद, जन-संवेदना और लोक-संस्कृति के ऐसे महान रचनाकार एवं गीतकार शैलेंद्र की पावन स्मृति को शत-शत नमन!

