पटना। भोजपुरी संस्कृति की पहचान सिर्फ लोकगीतों और फिल्मों के गानों तक सीमित नहीं है। भोजपुरी लोकनाट्य की समृद्ध परंपरा में ‘बिदेसिया’ एक ऐसी अमर विधा है, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज की सच्ची तस्वीर भी पेश करती है। इसमें पति-पत्नी के बिछोह, पलायन की मजबूरी और रिश्तों की भावनात्मक पीड़ा को बेहद संवेदनशील तरीके से दिखाया गया है।
भोजपुरी के महान लोक कलाकार और नाटककार भिखारी ठाकुर की रचना ‘बिदेसिया’ को भोजपुरी रंगमंच की सबसे प्रभावशाली कृतियों में गिना जाता है। यह नाटक उस दौर की कहानी कहता है, जब रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़कर कलकत्ता जैसे शहरों की ओर जाते थे और पीछे रह जाती थीं उनकी पत्नियां, जो वर्षों तक इंतजार और विरह का दर्द सहती थीं।
पलायन और रिश्तों की टूटन की कहानी
‘बिदेसिया’ की कहानी एक ऐसे पति की है, जो आर्थिक मजबूरियों के कारण पत्नी को छोड़कर परदेश चला जाता है। वहां नई परिस्थितियों में उसका जीवन बदल जाता है, जबकि गांव में उसकी पत्नी उसके लौटने की उम्मीद में विरह की पीड़ा झेलती रहती है। कहानी सिर्फ पति-पत्नी के रिश्ते की नहीं, बल्कि उस समय के सामाजिक और आर्थिक हालात की भी तस्वीर दिखाती है। 
लोकनाट्य में संगीत, संवाद और भावनाओं का मेल
बिदेसिया में गीत, संवाद, नृत्य और अभिनय के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया जाता है। इसकी खासियत यह है कि दर्शक हंसते भी हैं और कई बार पात्रों के दर्द से भावुक भी हो जाते हैं। यही वजह है कि यह लोकनाट्य आज भी भोजपुरी समाज में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
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भोजपुरी गीतों की मौजूदा बहस के बीच बिदेसिया की प्रासंगिकता
आज जब भोजपुरी संगीत में मनोरंजन और गुणवत्ता को लेकर बहस होती रहती है, ऐसे समय में ‘बिदेसिया’ यह याद दिलाता है कि भोजपुरी कला की असली ताकत उसकी भाषा, संवेदना और समाज से जुड़े विषयों में है। यह सिर्फ गाना या नाच नहीं, बल्कि एक दौर के जीवन संघर्ष और मानवीय रिश्तों का दस्तावेज है।
भोजपुरी संस्कृति को समझने के लिए फिल्मों के लोकप्रिय गीतों के साथ-साथ उसके लोक साहित्य और रंगमंच की परंपरा को जानना भी जरूरी है। ‘बिदेसिया’ इसी विरासत का एक जीवंत उदाहरण है।

