संतोष पटेल
आधुनिक जनसंचार माध्यमों, सोशल मीडिया और डिजिटल एल्गोरिदम के इस युग में किसी संस्कृति या भाषा को बहुत जल्दी किसी एक कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। पिछले दो-तीन दशकों में ‘भोजपुरी’ भाषा के साथ भी यही हुआ है। यूट्यूब रील्स, द्विअर्थी (Double Meaning) गानों और सस्ते म्यूज़िक वीडियो के आधार पर एक पूरी भाषा पर ‘अश्लीलता’ और ‘फूहड़पन’ का थप्पा लगा दिया गया है।
अक्सर यह सतही धारणा बना ली जाती है कि भोजपुरी inherently अश्लील भाषा है। लेकिन क्या किसी भाषा का अपना कोई नैतिक चरित्र होता है? क्या अभिव्यक्ति के माध्यम (Medium) और उस माध्यम से बेचे जा रहे कंटेंट (Content) में कोई अंतर नहीं है? यदि शृंगार, काम-भावना या शारीरिक वर्णन ही अश्लीलता का पैमाना है, तो फिर संस्कृत का शास्त्रीय काव्य, मैथिली के विद्यापति और हिंदी साहित्य के रीतिकाल को किस श्रेणी में रखा जाएगा?
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इन सभी प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए हमें भाषाविज्ञान, साहित्य के इतिहास, भारतीय सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) और आधुनिक बाज़ार व्यवस्था के अंतर्संबंधों को गहराई से समझना होगा।
भाषाविज्ञान और भाषा का चरित्र
भाषाविज्ञान (Linguistics) का पहला और बुनियादी नियम यह है कि भाषा स्वयं में केवल ध्वनियों, प्रतीकों और व्याकरण का एक निष्पक्ष ढांचा होती है। भाषा का अपना कोई धर्म, जाति, नैतिकता या अश्लीलता नहीं होती।
भाषा को एक साफ़ कागज़ या बहते हुए जल की तरह समझा जा सकता है। कागज़ पर आप ज्ञान-विज्ञान की बातें लिखें या कोई भद्दी बात—दोष कागज़ का नहीं, उस पर लिखने वाले की नीयत और विचार का होता है। जल में आप इत्र मिलाएँ या गंदगी—जल का अपना स्वभाव केवल बहना है।
इसी प्रकार, दुनिया की हर समृद्ध भाषा में हर तरह का कंटेंट रचा गया है:
- अंग्रेज़ी: जिस अंग्रेज़ी में शेक्सपियर, जॉन मिल्टन और स्टीफ़न हॉकिंग ने लिखा, उसी अंग्रेज़ी में दुनिया की सबसे बड़ी वयस्क फ़िल्म (Pornographic) इंडस्ट्री और बेहद आक्रामक हिप-हॉप/रैप म्यूज़िक भी बनता है।
- जापानी: जिस जापानी भाषा में बाशो की कविताएँ और तकनीकी शोध लिखे गए, उसी जापान की ‘AV’ (Adult Video) इंडस्ट्री अरबों डॉलर का बाज़ार है।
- हिंदी व स्पैनिश: इन दोनों भाषाओं में जहाँ एक तरफ़ विश्वस्तरीय साहित्य मौजूद है, वहीं दूसरी तरफ़ व्यावसायिक स्तर पर अत्यधिक यौन-उत्तेजक सामग्री भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
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यदि अंग्रेज़ी, जापानी या हिंदी को उनके कमर्शियल और एडल्ट मटीरियल के कारण “अश्लील भाषा” नहीं कहा जाता, तो फिर सिर्फ़ भोजपुरी के साथ यह दोहरा मापदंड (Double Standard) क्यों अपनाया जाता है? इससे यह साफ़ होता है कि किसी भाषा को अश्लील कहना भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है।
भारतीय साहित्य में शृंगार और देह-वर्णन
जो लोग यह मानते हैं कि देह का वर्णन या काम-भावना की अभिव्यक्ति केवल आधुनिक दौर के फूहड़ गानों की देन है, वे भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा से अनभिज्ञ हैं। भारतीय मनीषा ने ‘काम’ को जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—में से एक स्वीकार किया है। हमारी संस्कृति में काम-भावना को दबाने या उससे कुंठित होने के बजाय उसे जीवन के एक स्वाभाविक और सुंदर अंग के रूप में देखा गया है।
यदि नग्नता या शारीरिक मिलन के वर्णन को अश्लीलता मान लिया जाए, तो भारत के सबसे प्रतिष्ठित साहित्य को इस दायरे में लाना पड़ेगा:
(क) संस्कृत का शास्त्रीय साहित्य
संस्कृत साहित्य के सिरमौर महाकवि कालिदास की रचनाओं में शृंगार रस का अत्यंत प्रत्यक्ष वर्णन मिलता है। उनके प्रसिद्ध महाकाव्य ‘कुमारसंभवम्’ के आठवें सर्ग में भगवान शिव और माता पार्वती के सुरत (यौन-क्रीड़ा) और काम-केली का ऐसा विस्तृत और बारीक वर्णन है कि बाद के आचार्यों में इस पर तीखी बहस हुई।
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ध्वन्यालोक के आचार्य मम्मट ने अपने ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ में इस बात का उल्लेख ज़रूर किया कि जगत् के माता-पिता (शिव-पार्वती) का ऐसा प्रत्यक्ष वर्णन ‘अनौचित्य दोष’ (Impropriety) के अंतर्गत आता है, लेकिन किसी ने कालिदास की भाषा या संस्कृत को अश्लील नहीं कहा। इसी प्रकार, जयदेव कृत ‘गीतगोविंद’ में राधा और कृष्ण की रासलीला और देह-मिलन का अत्यंत मुग्धकारी और उघड़ा हुआ वर्णन है।
उदाहरण देखें:
गीता-गोविन्द या गीता-गोविन्द पंच-श्लोकी का हमारा चौथा आवश्यक श्लोक अंतिम अध्याय में आता है और अंतिम प्रबंध या गीत 24 का सारांश प्रस्तुत करता है।
“रचाय कुकयोश चित्रं पात्रं कुरुश्व कपोलयोर
घटया जघने कांचीं मुग्धा-सृजा कवारी-भरम |
कालया वलय-श्रेणिणं पाणौ पदे मणि-नुपुरव
इति निगादितः प्रीतः पीताम्बरोऽपि तथाकारोत ||”
अर्थ:(राधा ने कहा, “मेरे स्तनों पर चित्र बनाइए, मेरे गालों पर कस्तूरी की बूँदें लगाइए, मेरी कमर पर घंटियों की कमरबंद बाँधिए, मेरे बालों में सुंदर माला गूँथिए। मेरी कलाईयों में चूड़ियाँ और पैरों में रत्नजड़ित पायल पहनाइए।”
ऐसा सुनकर पीले वस्त्रधारी कृष्ण प्रसन्न हुए और उन्होंने वैसा ही किया। (12.25)
(ख) मैथिली के ‘मैथिल कोकिल’ विद्यापति
14वीं-15वीं शताब्दी के महान कवि विद्यापति की ‘पदावली’ मैथिली साहित्य का अनमोल रत्न है। विद्यापति को ‘अभिनव जयदेव’ भी कहा जाता है। उनकी कविताओं में नायिका के किशोरावस्था से यौवन में प्रवेश (वयोसंधि), स्नान करके निकलती नायिका (सद्यःस्नाता), उसके अंगों के उभार और प्रथम समागम की झिझक का ऐसा पारदर्शी वर्णन है जो आज के किसी भी पाठक को चौंका सकता है।
विद्यापति लिखते हैं: “कामिनि करइ सनाने। हेरइते हृदय हनइ पँचबाने॥”
(अर्थात, नायिका जब स्नान करके निकलती है और अपने बालों को सुखाती है, तो उसे देखकर लगता है मानो कामदेव अपने पाँचों बाणों से देखने वाले के हृदय को बिंद रहे हों।)
विद्यापति के इन पदों में अध्यात्म है या केवल देह-भोग, इस पर हिंदी साहित्य में लंबा विवाद रहा। हिंदी साहित्य के सबसे कड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में विद्यापति के शृंगार पर कड़ा व्यंग्य करते हुए लिखा था:
“आध्यात्मिक रंग के चश्मे आज-कल बहुत सस्ते हो गए हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘गीतगोविंद’ के पदों को आध्यात्मिक बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।”
शुक्ल जी का स्पष्ट मानना था कि विद्यापति मूलतः शृंगारी कवि हैं। इसके बावजूद, विद्यापति के पदों की मिठास और काव्यात्मकता के कारण उन्हें महाकवि का दर्जा मिला, और मैथिली भाषा पूज्य बनी रही।
(ग) हिंदी साहित्य का रीतिकाल
हिंदी साहित्य के रीतिकाल (17वीं से 19वीं शताब्दी) में बिहारी, केशवदास, देव, पद्माकर और घनानंद जैसे कवियों ने दरबारी संरक्षण में केवल और केवल शृंगार, देह-सौंदर्य और काम-वासना का चित्रण किया।
बिहारी का एक प्रसिद्ध दोहा देखिए:
“बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौंहनु हँसै दैन कहै नटि जाय॥”
रीतिकाल के कवियों ने महिला के नख से लेकर शिख तक (नाखून से सिर के बालों तक) के एक-एक अंग का कामुक वर्णन किया। आधुनिक आलोचकों ने रीतिकाल को “दरबारी अश्लीलता” और “भोगवादी सोच” का काल ज़रूर कहा, लेकिन इससे हिंदी भाषा अश्लील नहीं हो गई।
कलात्मक शृंगार और बाज़ारू फूहड़पन
कलात्मक शृंगार (Aesthetics) और बाज़ारू फूहड़पन (Vulgarity) का बुनियादी अंतर क्या है?
यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि यदि कालिदास, विद्यापति और बिहारी भी देह का वर्णन कर रहे थे, और आज के भोजपुरी गानों में भी देह की ही बात हो रही है, तो दोनों में अंतर क्या है?
इन दोनों के बीच का अंतर ‘भाषा’ का नहीं, बल्कि ‘उद्देश्य’ और ‘कलात्मकता’ का है। अतः समस्या यह नहीं है कि भोजपुरी में शृंगार की बात क्यों हो रही है; समस्या यह है कि वह शृंगार काव्यात्मक न होकर केवल बाज़ार से प्रेरित फूहड़ता (Vulgarity) बन चुका है। इससे कोई इनकार नहीं। कर सकता।
जिस भोजपुरी भाषा को आज कुछ गानों के कारण बदनाम किया जाता है, उसका अपना इतिहास अत्यंत उज्ज्वल, पावन और समृद्ध रहा है। भोजपुरी केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, यह करोड़ों लोगों की संवेदनाओं, लोक-आस्था और संस्कारों की अभिव्यक्ति है।
भोजपुरी का समृद्ध साहित्यिक और लोक-सांस्कृतिक पक्ष
(क) संत साहित्य और वैचारिक क्रांति
हिंदी और भोजपुरी के मुहाने पर खड़े संत कबीरदास ने अपनी कई प्रसिद्ध साखियाँ और पद भोजपुरी के प्रभाव वाली बोली में लिखे। कबीर ने समाज में फैले आडंबर, जातिवाद और पाखंड पर जो करारे प्रहार किए, उनमें भोजपुरी माटी की ही अक्खड़ता और ईमानदारी थी। इसके अलावा, राहुल सांकृत्यायन जैसे महान महापंडित ने भोजपुरी में ‘नाटक’ लिखकर सामाजिक सुधारों का बिगुल बजाया था।
(ख) भिखारी ठाकुर: भोजपुरी के शेक्सपियर
भोजपुरी के महान लोक-नाटककार और गीतकार भिखारी ठाकुर ने ‘बिदेसिया’, ‘बेटी-बेचवा’ और ‘गबरघिचोर’ जैसे अमर नाटकों की रचना की। उन्होंने अपने नाटकों के ज़रिए पलायन के दर्द, नारी-उत्पीड़न, बाल-विवाह और नशाखोरी जैसी सामाजिक बुराइयों पर ऐसा मार्मिक प्रहार किया कि पूरा दर्शक वर्ग रो पड़ता था। उनके गीतों में जो संवेदना और लोक-संस्कृति थी, वह किसी भी विश्वस्तरीय साहित्य के समकक्ष खड़ी हो सकती है।
(ग) छठ, सोहर और कजरी की निर्मलता
भोजपुरी संस्कृति की आत्मा उसके लोकगीतों में बसती है:
छठ पर्व के गीत: लोक-आस्था के सबसे कठिन और पवित्र पर्व ‘छठ’ के गीत भोजपुरी में ही गाए जाते हैं। इन गीतों में जो शुद्धता, सादगी और प्रकृति के प्रति समर्पण है, उसकी मिसाल दुनिया की किसी संस्कृति में मिलना मुश्किल है।
सोहर और गारी: बच्चे के जन्म पर गाए जाने वाले ‘सोहर’ और विवाह के समय गाए जाने वाले ‘गाली-गीत/समधौन’ में पारिवारिक रिश्तों का मीठा दुलार होता है।
कजरी और रोपने के गीत: सावन के महीने में गाई जाने वाली ‘कजरी’ और खेतों में धान रोपते समय गाए जाने वाले गीतों में श्रम और प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य झलकता है।
क्या छठ के पावन गीत गाने वाली, कबीर की चेतना को ढोने वाली और भिखारी ठाकुर के दर्द को बयाँ करने वाली भाषा कभी “अश्लील” हो सकती है? कदापि नहीं।
भोजपुरी में फूहड़पन का उभार: कारण और बाज़ार का खेल
है, इसको कोई झुठला नहीं सकता। यदि भोजपुरी इतनी समृद्ध भाषा है, तो फिर इस पर अश्लीलता का यह विकराल आरोप क्यों लगा? इसके पीछे भाषा का कोई दोष नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और डिजिटल कारण ज़िम्मेदार हैं:
कॉर्पोरेट और संस्थागत समर्थन का अभाव: बॉलीवुड (हिंदी) या साउथ सिनेमा (तमिल, तेलुगु) को बड़े कॉर्पोरेट फ़ंड्स, मल्टीप्लेक्स थिएटर्स और सरकारी अकादमियों का सहारा मिला। भोजपुरी सिनेमा को ऐसा कोई संगठित ढांचा नहीं मिला। यह उद्योग पूरी तरह से असंगठित (Informal) और कम बजट वाले मेकर्स के हाथों में चला गया।
सस्ते डिजिटल मीडिया और यूट्यूब का दौर: इंटरनेट और यूट्यूब के आने के बाद भोजपुरी म्यूज़िक इंडस्ट्री ने ‘कम लागत में ज़्यादा मुनाफ़ा’ कमाने का रास्ता चुना। डिजिटल एल्गोरिदम उन्हीं चीज़ों को प्रमोट करता है जिनमें ‘शॉक वैल्यू’ या उत्तेजना हो। कुछ गायक और म्यूज़िक कंपोज़र रातों-रात मशहूर होने के लिए द्विअर्थी गानों का सहारा लेने लगे।
सेंसरशिप की अनुपस्थिति: फ़िल्मों के लिए तो सेंसर बोर्ड होता है, लेकिन यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम पर अपलोड होने वाले गानों के लिए कोई कड़ा सरकारी या कानूनी नियमन (Regulation) नहीं था। इसका फायदा उठाकर घटिया क्वालिटी का मटीरियल धड़ल्ले से परोसा गया।
एलीट क्लास का पूर्वाग्रह (Stereotyping): जब मुख्यधारा के मीडिया और महानगरीय समाज ने भोजपुरी को देखा, तो उन्होंने केवल उन वायरल गानों के आधार पर पूरी भाषा और भोजपुरी भाषी लोगों के प्रति एक हीन भावना (Inferiority Complex) और स्टीरियोटाइप बना लिया।
उपरोक्त सभी ऐतिहासिक, साहित्यिक और भाषावैज्ञानिक तथ्यों के विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है:
- अश्लीलता भाषा का गुण नहीं है: अश्लीलता किसी भाषा की व्याकरण या उसकी शब्दावली में नहीं होती, बल्कि उसका इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की नीयत, बाज़ार के मुनाफ़े और विचार में होती है।
- प्राचीन साहित्य से सीख: यदि शृंगार और देह-वर्णन के आधार पर भाषा तय होती, तो संस्कृत और मैथिली भी कटघरे में होतीं। अंतर केवल काव्यात्मक सौंदर्य और सस्ते बाज़ारू फूहड़पन का है।
- भोजपुरी पर आरोप भ्रामक है: “भोजपुरी ही अश्लीलता की भाषा है”—यह कथन पूरी तरह से गलत, पूर्वाग्रह से ग्रसित और अज्ञानता से भरा हुआ है।
भोजपुरी में व्यावसायिक स्तर पर जो कचरा परोसा जा रहा है, उसकी आलोचना होनी चाहिए और उस पर कड़े कानूनी व सामाजिक कदम उठाए जाने चाहिए। लेकिन उस बाज़ारू कचरे की सज़ा पूरी भोजपुरी भाषा, उसके महान इतिहास, उसकी लोक-संस्कृति और उसको बोलने वाले 20 करोड़ से अधिक लोगों को नहीं दी जा सकती। दोष भोजपुरी भाषा का नहीं, बल्कि भाषा के नाम पर व्यापार करने वाले असंवेदनशील बाज़ार का है। (लेखक के निजी विचार हैं)
डॉ. संतोष पटेल, अध्यक्ष, भोजपुरी जन जागरण अभियान और सहायक कुलसचिव, दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय, नई दिल्ली


भोजपुरी के अश्लील भाषा कहे वला लोग या त खुदे अश्लीलता के दास हऽ, आ न तऽ, ऊ एक लम्मर के शातिर हऽ, जेकरा भाषा-साहित्य, साहित्यिक विधा भा भाषा शैली के कवनो जानकारी नईखे। जदि रहीत त ऊ लोग कबो एह प्रकार के सतही बात न करीत।
पिछिला सप्ताह दिल्ली विश्वविद्यालय के एगो परफेसर जे मूलतः बिहारे निवासी बाड़न। भोजपुरी के लेके ऊ कुछ अईसने बात कहि दिहलन जे सुन के मन बहुत आहत भईल।
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