भाषाओं की भीड़ में भोजपुरी ही क्यों बाहर? करोड़ों की जुबान के सवाल पर सरकार मौन

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भारत की भाषाई विविधता दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है। संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाओं को स्थान प्राप्त है। इनमें कई ऐसी भाषाएं हैं जिनके बोलने वालों की संख्या भोजपुरी भाषी समाज की तुलना में काफी कम है। 2011 की जनगणना में भोजपुरी को अलग संवैधानिक भाषा के रूप में दर्ज नहीं किया गया, इसलिए इसकी वास्तविक संख्या का आकलन चुनौतीपूर्ण है। इसके बावजूद विभिन्न भाषाई अध्ययनों में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या करोड़ों में बताई गई है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के बड़े हिस्से के साथ नेपाल तथा मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना और कैरेबियाई देशों तक भोजपुरी की मौजूदगी है। ऐसे में भोजपुरी का सवाल केवल एक क्षेत्रीय भाषा का नहीं, बल्कि भारत और भारतीय प्रवासी समाज की एक बड़ी भाषाई-सांस्कृतिक पहचान का सवाल है।

कई संवैधानिक भाषाओं से बड़ी भाषाई आबादी

2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि डोगरी, बोडो, मणिपुरी और सिंधी जैसी कई संवैधानिक भाषाओं के मातृभाषी समुदायों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। डोगरी के मातृभाषी लगभग 26 लाख, बोडो के करीब 15 लाख और मणिपुरी के लगभग 18 लाख दर्ज किए गए थे। सिंधी मातृभाषियों की संख्या करीब 28 लाख थी। इन आंकड़ों की तुलना भोजपुरी क्षेत्र के बड़े जिलों की आबादी से करने पर भाषाई जनसंख्या का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। हालांकि यह तुलना करते समय यह समझना जरूरी है कि किसी जिले की कुल आबादी और किसी भाषा के मातृभाषियों की संख्या एक समान सांख्यिकीय श्रेणी नहीं है। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि कम जनसंख्या वाली कई भाषाओं को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, जबकि करोड़ों लोगों की व्यापक भाषाई परंपरा वाली भोजपुरी अभी उस सूची से बाहर है।

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भोजपुरी की साहित्यिक परंपरा केवल लोकगीतों तक सीमित नहीं

भोजपुरी को केवल गीत-संगीत या मनोरंजन की भाषा मानना इसके विशाल साहित्यिक संसार को सीमित कर देना होगा। भोजपुरी में लोकगीत, लोककथाएं, कहावतें, सोहर, कजरी, चैता, बिरहा और विभिन्न लोकनाट्य परंपराओं का समृद्ध भंडार है। इसके साथ ही कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना और अन्य साहित्यिक विधाओं में भी लगातार लेखन हुआ है। भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी रंगमंच और लोकनाट्य को व्यापक पहचान दिलाई। उनकी रचनाओं में समाज, गरीबी, प्रवास, स्त्री जीवन और सामाजिक विसंगतियों का जीवंत चित्रण मिलता है। भोजपुरी साहित्य की यही विशेषता इसे केवल बोलचाल की भाषा से आगे ले जाकर एक विकसित साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित करती है।

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व्याकरण, शब्दकोश और भाषा-अध्ययन का अपना आधार

किसी भाषा की परिपक्वता का मूल्यांकन केवल उसके बोलने वालों की संख्या से नहीं किया जाता। उसके व्याकरण, शब्द-संपदा, शब्दकोश, साहित्य, शिक्षण और अकादमिक अध्ययन भी महत्वपूर्ण आधार होते हैं। भोजपुरी के व्याकरण पर लंबे समय से काम हुआ है और इसके शब्दकोश भी तैयार किए गए हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में यूरोपीय तथा भारतीय विद्वानों ने भोजपुरी की संरचना और शब्द-संपदा का अध्ययन किया। आज भी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में भोजपुरी भाषा और साहित्य पर शोध जारी है। भोजपुरी के पास देवनागरी में विकसित लेखन परंपरा भी है। इसलिए इसे केवल मौखिक या घरेलू संचार तक सीमित भाषा मानना भाषाई इतिहास की अनदेखी होगी।

सिनेमा और संगीत ने भोजपुरी को बनाई जनभाषा की पहचान

भोजपुरी सिनेमा और संगीत ने इस भाषा को भारत के बाहर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भोजपुरी फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग बिहार और उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त दिल्ली, मुंबई, झारखंड और देश के दूसरे हिस्सों में भी है। डिजिटल माध्यमों ने इस पहुंच को और व्यापक बनाया है। भोजपुरी गीत और फिल्में मॉरीशस, नेपाल, फिजी, सूरीनाम और कैरेबियाई देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों तक भी पहुंचती हैं। हालांकि भोजपुरी मनोरंजन उद्योग के सामने गुणवत्ता, अश्लीलता और व्यावसायिक दबाव जैसी चुनौतियां हैं, लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि सिनेमा और संगीत ने भोजपुरी को वैश्विक सांस्कृतिक पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

भारत से बाहर भोजपुरी की जड़ें कई पीढ़ियों पुरानी 

भोजपुरी की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी वैश्विक उपस्थिति भी शामिल है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में भारत से गए श्रमिक समुदायों के साथ भोजपुरी और इससे जुड़े भाषाई रूप मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना तथा त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों तक पहुंचे। इन देशों में भोजपुरी की लोक-स्मृतियां, गीत, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं और पारिवारिक बोलचाल आज भी दिखाई देती हैं। मॉरीशस में भोजपुरी को सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्तर पर भी स्थान मिला है। फिजी में विकसित फिजी हिंदी पर भी भोजपुरी सहित उत्तर भारतीय भाषाओं का प्रभाव रहा है। यह प्रवासी इतिहास भोजपुरी को केवल उत्तर भारत की भाषा नहीं रहने देता, बल्कि इसे भारतीय प्रवासी संस्कृति की महत्वपूर्ण विरासत बनाता है।

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सवाल केवल मान्यता का नहीं, भाषाई सम्मान और संरक्षण का भी

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन के माध्यम से बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया, जिससे अनुसूचित भाषाओं की संख्या 22 हो गई। भोजपुरी अभी भी इस सूची से बाहर है। साहित्य अकादमी की मान्यता और संवैधानिक मान्यता अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं; इसलिए दोनों को एक ही आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। भोजपुरी के सामने आज चुनौती केवल संवैधानिक दर्जा हासिल करने की नहीं, बल्कि शिक्षा, उच्च शिक्षा, प्रशासन, डिजिटल सामग्री, गुणवत्तापूर्ण साहित्य और मानकीकृत भाषा-अध्ययन को और मजबूत करने की भी है। करोड़ों लोगों की भाषा के रूप में भोजपुरी की ताकत उसकी संख्या के साथ-साथ उसके साहित्य, संस्कृति, इतिहास और वैश्विक प्रवासी समुदाय में है। इसलिए बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसे संरक्षित, विकसित और सम्मानित किया जाए।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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