‘हम मेहररुए नू हईं’: स्त्री की पीड़ा, प्रतिरोध और भीतर छिपल आग के सशक्त स्वर

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समीक्षक- राजेश भोजपुरिया
चर्चित कवयित्री आ लेखिका डॉ. संध्या सिन्हा के चर्चित भोजपुरी काव्य-संग्रह ‘दोहमच’ में शामिल रचना ‘हम मेहररुए नू हईं’ स्त्री-जीवन के पीड़ा, संघर्ष, उपेक्षा आ प्रतिरोध के बहुत गहिराई से सामने ले आवे वाली कविता बा। ई कविता स्त्री के खाली अबला, पीड़ित भा सहनशील रूप में ना देखत, बलुक ओकर भीतर छिपल अपार शक्ति, सृजनात्मक क्षमता आ प्रतिरोध के चेतना के उजागर करत बा।

कविता के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ई बा कि कवयित्री स्त्री के स्थिति के माचिस के काठी के प्रतीक से जोड़त बाड़ी। सदियन से पुरुषवादी व्यवस्था में स्त्री के जरूरत के चीज समझल गइल—जब जरूरत पड़ल त इस्तेमाल कइल गइल आ काम पूरा भइला पर ओकरा के उपेक्षित कर दीहल गइल। एह पीड़ा के कवयित्री बहुत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करत बाड़ी—

“शताब्दियन से शिकार होत आइल बानी
तोहार रगड़ल, भोगल,
मसाला जर गइला पर
फेंक देहल काठी अइसन।”

इहाँ ‘काठी’ खाली माचिस के तीली ना ह, बल्कि सदियन से शोषित आ इस्तेमाल होत आइल स्त्री के प्रतीक बन जाला। ओकर उपयोगिता खत्म होते ही ओकरा के फेंक देवे वाली मानसिकता पर कविता तीखा सवाल खड़ा करेला।

पीड़ा से प्रतिरोध तक

कविता के अगिला पड़ाव पर स्त्री के भीतर छिपल शक्ति सामने आवेला। कवयित्री पुरुषवादी समाज के चेतावत कहत बाड़ी कि स्त्री के लगातार कमजोर समझे के भूल मत करीं। आग के लपट जवन चीज के जरा सकेले, ओकर शुरुआत ओही माचिस के काठी से होला—

“बकिर हर बेर
तूँ काहें भुला जाल कि
मसाला काठिए प चढ़ल होला,
जेकरा एक रगड़ से जर जाला घर
जरि के छार हो जाला—शहर-के-शहर।”

एह पंक्तियन में कविता के स्वर अचानक आक्रोशपूर्ण हो जाला। स्त्री अब सिर्फ सहन करे वाली पात्र ना रह जाली; ऊ जरूरत पड़ला पर प्रतिरोध करे वाली शक्ति के रूप में सामने आवेली। ‘एक रगड़’ के बिंब स्त्री के भीतर दबा विद्रोह आ ओकर संभावित विस्फोट के संकेत देला।

सहनशीलता कमजोरी ना ह

कविता के अंतिम हिस्सा एकर सबसे प्रभावशाली पड़ाव बा। कवयित्री बतावत बाड़ी कि अपना भीतर आग समेट के चुप रहना स्त्री के कमजोरी ना, बल्कि ओकर धैर्य आ संयम ह—

“ऊ त हमहीं बानी,
जे अपना में आग समेटले
चुपाइल रहीला,
आखिर कुछुओ होखे
हम मेहररुए नू हईं।”

‘हम मेहररुए नू हईं’ के दोहराव कविता के शीर्षक के अर्थ के अउरी गहिर कर देला। एह वाक्य में एक ओर समाज द्वारा स्त्री पर थोपल गइल सहनशीलता के विडंबना बा, त दूसरी ओर स्त्री के अपना अस्तित्व के स्वीकार करे के दृढ़ता भी बा।

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कवयित्री के कहनाम जइसे बा कि हम स्त्री हईं, एह चलते हमार सहनशीलता के कमजोरी मत समझीं। हम चुप बानी त एकर मतलब ई ना कि हमार भीतर आग नइखे।

भोजपुरी में सशक्त स्त्री-विमर्श

‘हम मेहररुए नू हईं’ भोजपुरी कविता में स्त्री-विमर्श के दृष्टि से महत्वपूर्ण रचना बनके सामने आवेली। कविता में ना त भारी-भरकम शब्दावली बा आ ना ही विचार के अनावश्यक जटिलता। सहज भोजपुरी में कहल गइल बात सीधे पाठक के मन तक पहुँचेला।

डॉ. संध्या सिन्हा स्त्री के सिर्फ ममता, त्याग आ सहनशीलता के प्रतीक बनाके ना देखेली, बल्कि ओकरा भीतर मौजूद रौद्र रूप, प्रतिरोध आ आत्मसम्मान के भी आवाज देत बाड़ी। यही कारण बा कि कविता व्यक्तिगत स्त्री-पीड़ा से आगे बढ़के सामाजिक संरचना पर सवाल खड़ा करे लागेली।

कविता पुरुष समाज से पूछत बिया कि स्त्री से हर परिस्थिति में सहनशील बने के उम्मीद आखिर काहे? ओकरा त्याग के गुण आ चुप्पी के संस्कार काहे मानल जाला? आ जब ऊ अपना भीतर के आग के आवाज देवे लागेले, तब ओकरा के विद्रोही काहे कहल जाला?

कुल मिलाके ‘हम मेहररुए नू हईं’ एगो मर्मस्पर्शी, विद्रोही आ अर्थगर्भित कविता बा। ‘माचिस के काठी’ के प्रतीक के माध्यम से कवयित्री स्त्री के शोषण, उपेक्षा, उपयोग आ ओकर भीतर छिपल प्रतिरोध के बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कइले बाड़ी।

ई रचना भोजपुरी साहित्य में स्त्री के परंपरागत छवि से आगे बढ़के ओकर शक्ति, चेतना आ प्रतिरोध के पहचान देवे के कोशिश करेली। कविता पढ़ला के बाद पाठक के मन में एगो सवाल जरूर रह जाला—सहनशीलता के सीमा आखिर कहाँ तक बा आ चुप्पी के पीछे छिपल आग के कब तक अनदेखा कइल जा सकेला?

ई रचना निश्चित रूप से प्रभावित करे वाली बा। एकरा पर कलम चलावल आसान हो सकेला, बाकिर एकरा के अंतिम रूप से स्वीकार कइल पाठक आ रचनाकार—दूनो के संवेदना आ दृष्टिकोण पर निर्भर करेला।

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