समीक्षक: डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा
भोजपुरी अपनी वाचिक परंपरा, लोकधर्मी चेतना और गेयता के लिए विश्वभर में पहचानी जाती है। सदियों से यह भाषा लोकजीवन के सुख-दुःख, प्रेम, पीड़ा, संघर्ष और सांस्कृतिक स्मृतियों को अपने भीतर संजोती रही है। भोजपुरी में रचना केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह समाज की सांस्कृतिक, सामाजिक और मानवीय चेतना को भी स्वर देती है।
इसी संदर्भ में युवा समालोचक डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी की कृति ‘ककहरा’ भोजपुरी काव्य की समकालीन धारा को समझने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक प्रयास है। यह पुस्तक भोजपुरी कविता के बदलते स्वरूप, उसकी संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों को समझने का एक प्रभावी माध्यम बनती है।
‘ककहरा’ नाम का सांकेतिक अर्थ
‘ककहरा’ शब्द अपने आप में अत्यंत अर्थपूर्ण है। ककहरा यानी वर्णमाला का प्रारंभिक पाठ, जो भाषा सीखने की पहली सीढ़ी होता है। इसी भाव में यह पुस्तक भोजपुरी काव्य की मूल संवेदनाओं, प्रवृत्तियों और रचनात्मक सरोकारों को समझने का प्रवेश-द्वार बनती है।
डॉ. तिवारी ने इस कृति में 42 रचनाकारों की काव्य-रचनाओं की समीक्षा के माध्यम से समकालीन भोजपुरी कविता के विविध रंगों और स्वरों को सामने लाने का प्रयास किया है।
लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना
‘ककहरा’ की सबसे बड़ी विशेषता भोजपुरी कविता की लोकधर्मी चेतना को पहचानना है। भोजपुरी काव्य का गहरा संबंध गाँव, खेत-खलिहान, श्रम, पारिवारिक संबंधों, लोकाचार और सांस्कृतिक जीवन से रहा है।
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डॉ. तिवारी की आलोचना में इन तत्वों को केवल विषय के रूप में नहीं, बल्कि भोजपुरी कविता की मूल अंतःचेतना के रूप में देखने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक लोकजीवन को केवल अतीत की स्मृति नहीं मानती, बल्कि वर्तमान को समझने के एक सक्रिय सांस्कृतिक आधार के रूप में प्रस्तुत करती है।
समकालीनता और सामाजिक सरोकार
पुस्तक की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता इसकी आधुनिक दृष्टि है। ‘ककहरा’ भोजपुरी कविता को केवल प्रेम, भक्ति और लोकगीतों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि शहरीकरण, पर्यावरण, नारी चेतना और सामाजिक परिवर्तन जैसे आधुनिक प्रश्नों से भी जोड़ती है।
समकालीन भोजपुरी कविता में गाँव और शहर के बदलते संबंध, जीवन-मूल्यों में परिवर्तन, सामाजिक विसंगतियाँ और आधुनिकता के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। डॉ. तिवारी इन रचनाओं में केवल विषय-वस्तु को नहीं देखते, बल्कि उनके पीछे छिपी सामाजिक चेतना, प्रतिरोध और मानवीय संवेदना को भी रेखांकित करते हैं।
भाव, रस और संवेदना का विश्लेषण
भोजपुरी कविता की शक्ति उसकी गेयता के साथ-साथ उसकी भाव-संपन्नता में भी निहित है। ‘ककहरा’ में शृंगार, करुण, भक्ति और वीर जैसे विभिन्न रसों एवं भावों की उपस्थिति को आलोचनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
प्रेम और भक्ति की रचनाओं में भावात्मक गहराई तथा सामाजिक सरोकारों वाली कविताओं में संघर्ष, पीड़ा और संवेदना को पहचानना आलोचक की संवेदनशील दृष्टि को दर्शाता है।
इस पुस्तक में कविता को केवल शब्द और शिल्प की संरचना नहीं माना गया है, बल्कि उसके भावात्मक प्रभाव और सांस्कृतिक संदर्भ के साथ समझने का प्रयास किया गया है।
आलोचक की संतुलित दृष्टि
‘ककहरा’ का महत्वपूर्ण पक्ष डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी की आलोचनात्मक दृष्टि है। उनकी समीक्षा में संवेदनशीलता के साथ-साथ तटस्थता भी दिखाई देती है।
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वे केवल रचनाकारों की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि उनकी रचनाओं के साहित्यिक गुण, सामाजिक संदर्भ और रचनात्मक विशेषताओं को भी सामने रखते हैं। एक आलोचक का दायित्व केवल गुणों का वर्णन करना नहीं, बल्कि उपलब्धियों के साथ सीमाओं को भी पहचानना होता है। इस दृष्टि से ‘ककहरा’ का आलोचनात्मक स्वर संतुलित दिखाई देता है।
भाषा और शैली
‘ककहरा’ की भाषा सहज, प्रवाहमयी और बौद्धिक है। डॉ. तिवारी ने आलोचना को अनावश्यक रूप से जटिल बनाने के बजाय सरल और संप्रेषणीय भाषा का प्रयोग किया है।
इस कारण यह पुस्तक सामान्य पाठक के साथ-साथ गंभीर साहित्यिक अध्येताओं के लिए भी उपयोगी बनती है। उनकी लेखनी में भोजपुरी भाषा और उसके लोक संसार के प्रति आत्मीयता स्पष्ट दिखाई देती है।
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यह पुस्तक इस धारणा को मजबूत करती है कि भोजपुरी केवल गीतों और लोककथाओं तक सीमित भाषा नहीं है, बल्कि आधुनिक साहित्यिक चेतना को भी प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में सक्षम है।
व्यापकता और सीमा
‘ककहरा’ की बड़ी उपलब्धि इसका व्यापक फलक है। एक ही पुस्तक में 42 रचनाकारों को शामिल करके डॉ. तिवारी ने समकालीन भोजपुरी कविता के अनेक स्वर सामने लाने का प्रयास किया है।
हालांकि यही व्यापकता इसकी एक सीमा भी बन जाती है। इतने अधिक रचनाकारों को एक पुस्तक में समेटने के कारण कई कवियों की केवल कुछ प्रतिनिधि रचनाओं के आधार पर चर्चा हो पाई है। किसी रचनाकार की संपूर्ण रचनाधर्मिता और काव्य-यात्रा को समझने के लिए उसके व्यापक साहित्य का अध्ययन अधिक उपयोगी होता है।
यहाँ पुस्तक में प्रयुक्त उदाहरण को स्वीकार करते हुए कहा जा सकता है कि-“चावल के एक दाने को टोह कर बटुली के पूरे भात की तासीर को महसूस किया जा सकता है।”
लेकिन किसी रचनाकार के समग्र मूल्यांकन के लिए उसके पूरे साहित्य से गुजरना आवश्यक होता है।
फिर भी यह सीमा पुस्तक की उपलब्धि को कम नहीं करती, बल्कि इसकी प्रकृति को समझने में सहायता करती है। ‘ककहरा’ का उद्देश्य अनेक रचनाकारों की रचनात्मक उपस्थिति और समकालीन भोजपुरी कविता की विविध प्रवृत्तियों को सामने लाना अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होता है।
भोजपुरी साहित्य में ‘ककहरा’ का महत्व
‘ककहरा’ का महत्व केवल 42 रचनाकारों की समीक्षा तक सीमित नहीं है। यह पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी साहित्य अपने लोक आधार को बनाए रखते हुए आधुनिक सामाजिक और साहित्यिक प्रश्नों से लगातार जुड़ रहा है।
गाँव और लोकजीवन के साथ-साथ शहरीकरण, पर्यावरण, नारी चेतना और सामाजिक बदलाव जैसे विषय भोजपुरी कविता के विस्तार और बदलती संवेदना को प्रमाणित करते हैं।
इस अर्थ में ‘ककहरा’ परंपरा और समकालीनता के बीच एक उपयोगी सेतु का कार्य करती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो ‘ककहरा’ भोजपुरी काव्य की समकालीन प्रवृत्तियों को समझने वाली एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति है। इसकी प्रमुख शक्तियाँ लोकधर्मिता, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक सरोकार, भाव-संवेदना, गेय परंपरा और आलोचक की संतुलित दृष्टि हैं।
42 रचनाकारों को एक साथ प्रस्तुत करने से पुस्तक को व्यापकता मिली है, हालांकि इसी कारण प्रत्येक रचनाकार की संपूर्ण रचनाधर्मिता पर विस्तार से चर्चा संभव नहीं हो पाई है। फिर भी यह सीमा इसकी मूल उपलब्धि को प्रभावित नहीं करती। डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी ने ‘ककहरा’ के माध्यम से भोजपुरी कविता को केवल लोक-अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर आधुनिक साहित्यिक चेतना, सामाजिक सरोकार और बदलते समय के प्रश्नों से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया है। इस दृष्टि से ‘ककहरा’ समकालीन भोजपुरी काव्य को समझने के लिए एक उपयोगी, महत्वपूर्ण और स्वागतयोग्य आलोचनात्मक कृति है।

