भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता से रोकने के लिए दिए जाने वाले तर्कों पर भाषा विशेषज्ञों का पक्ष, व्याकरण नहीं होने का आरोप तथ्यहीन
नई दिल्ली। भोजपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग लंबे समय से चली आ रही है। इस मांग के विरोध में समय-समय पर कई तर्क दिए जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख आरोप यह लगाया जाता है कि भोजपुरी की अपनी कोई स्वतंत्र व्याकरण व्यवस्था नहीं है। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. बृज भूषण मिश्र का कहना है कि यह आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। भोजपुरी एक जीवंत, स्वाभाविक और समृद्ध भाषा है, जिसकी अपनी व्याकरणिक संरचना और साहित्यिक परंपरा मौजूद है।
डॉ. मिश्र ने कहा कि भोजपुरी किसी कृत्रिम रूप से निर्मित भाषा की तरह नहीं, बल्कि लोक जीवन से विकसित हुई स्वाभाविक भाषा है। इसके बोलने वालों को इसका व्याकरण जन्मजात भाषा संस्कार के रूप में प्राप्त होता है।
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उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि भोजपुरी भाषी कभी यह नहीं कहते कि ‘बाबूजी जात बाड़ी’ या ‘माई खात बाड़न’, बल्कि स्वाभाविक रूप से कहते हैं- ‘बाबूजी जात बाड़न, माई खात बाड़ी।’ यह दर्शाता है कि भोजपुरी में लिंग, वचन और क्रिया के प्रयोग की स्पष्ट व्याकरणिक व्यवस्था मौजूद है।
भोजपुरी व्याकरण पर हुआ है गंभीर अध्ययन
डॉ मिश्र का कहना है कि यदि किसी भाषा के लिए लिखित व्याकरण आवश्यक माना जाए, तो भोजपुरी इस कसौटी पर भी पूरी तरह खरी उतरती है। पिछले एक शताब्दी से अधिक समय में भोजपुरी व्याकरण पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं।
भाषाविदों के अनुसार वर्ष 1905 में एम. चाइल्ड द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई ‘A Grammar of Bhojpuri’ से लेकर आधुनिक समय तक भोजपुरी व्याकरण पर दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।
इनमें प्रमुख हैं-
ए ग्रामर ऑफ भोजपुरी –राजा एम. चाइल्ड, 1905
भोजपुरी भाषा और साहित्य -डॉ. उदय नारायण तिवारी, बिहार राष्ट्र भाषा परिषद, पटना, 1954
भोजपुरी व्याकरण- रासबिहारी राय शर्मा, वाराणसी, 1965
भोजपुरी और हिन्दी का तुलनात्मक व्याकरण – डॉ. शुकदेव सिंह, 1967
भाषा विज्ञान और भोजपुरी- प्रो. कृपा शंकर सिंह
भोजपुरी शब्दानुशासन-रसिक बिहारी ओझा निर्भीक, 1976
भोजपुरी ठेठ भाषा व्याकरण- शिवदास ओझा
आदर्श भोजपुरी व्याकरण- श्रद्धानंद अवधूत, 1987
भोजपुरी व्याकरण- डॉ. रामदेव त्रिपाठी, भोजपुरी अकादमी, पटना, 1987
मानक भोजपुरी वर्तनी – प्राचार्य विश्वनाथ सिंह, 1988
भोजपुरी व्याकरण के रूपरेखा – विंध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव, 1999
भोजपुरी व्याकरण आ रचना –बिहार राज्य पाठ्य पुस्तक निगम, 2008
मानक भोजपुरी भाषा, व्याकरण आ रचना –डॉ. जयकांत सिंह, 2013
मानक भोजपुरी व्याकरण- देवनाथ सिंह फौलादी, 2023
भोजपुरी व्याकरण- डॉ. गोपाल ठाकुर, 2023
प्रयोगात्मक भोजपुरी व्याकरण –गोपाल अश्क, 2026
शोध और भाषा वैज्ञानिक अध्ययन भी प्रमाण
डॉ. मिश्र के अनुसार भोजपुरी के विभिन्न क्षेत्रों और बोलियों पर अनेक शोध कार्य किए गए हैं। भोजपुरी के कारक, क्रिया पद, ध्वनि व्यवस्था, शब्द निर्माण और वाक्य संरचना पर विश्वविद्यालय स्तर के शोध प्रबंध उपलब्ध हैं।
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भोजपुरी समर्थकों का कहना है कि किसी भाषा की समृद्धि केवल उसके लिखित साहित्य या सरकारी मान्यता से तय नहीं होती, बल्कि उसकी अपनी भाषिक संरचना, करोड़ों लोगों का प्रयोग और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी उसकी पहचान होती है।
‘व्याकरण नहीं होने’ का आरोप वास्तविकता से दूर
भोजपुरी भाषा प्रेमियों का कहना है कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के विरोध में दिया जाने वाला ‘व्याकरण नहीं होने’ का तर्क ऐतिहासिक और भाषावैज्ञानिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। भोजपुरी की अपनी व्याकरण व्यवस्था, साहित्यिक परंपरा और वैज्ञानिक अध्ययन की लंबी परंपरा मौजूद है।
उनका मानना है कि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देना केवल एक भाषा को सम्मान देना नहीं होगा, बल्कि करोड़ों भोजपुरी भाषियों की सांस्कृतिक पहचान को स्वीकार करना भी होगा।


धन्यवाद, भोजपुरी 24 एवं हेमंत पाण्डेय जी। मेरे तथ्यात्मक विचार को प्रचारित प्रसारित करने के लिए।