परिचय दास : जिन्होंने भोजपुरी को लोकभाषा से साहित्यिक विमर्श की वैश्विक पहचान तक पहुंचाया

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Bhojpuri24.com की शृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय उस बहुआयामी साहित्यकार का, जिन्होंने भोजपुरी को केवल लोकगीतों और लोककथाओं की भाषा मानने की संकीर्ण धारणा को तोड़ा और उसे आधुनिक कविता, वैचारिक विमर्श, अकादमिक अध्ययन तथा वैश्विक सांस्कृतिक संवाद का सशक्त माध्यम बनाया। परिचय दास भोजपुरी साहित्य के उन रचनाकारों में हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी, सांस्कृतिक नेतृत्व और संस्थागत योगदान से भोजपुरी को नई प्रतिष्ठा प्रदान की है।

वे कवि, सुगद्यकार, आलोचक, संपादक, संस्कृति-चिंतक और सबसे बढ़कर भोजपुरी भाषा के एक सजग प्रहरी हैं। साहित्य में उन्होंने ‘सुगद्य’ ( जिसे भोजपुरी में उन्होंने ‘सुगद’ कहा है ) नाम की नई विधा स्थापित की है। इस विधा का अपना सौंदर्यशास्त्र है। उनके साहित्य में लोक की संवेदना भी है और समकाल की वैचारिक बेचैनी भी।

मऊ की माटी से निकला साहित्य का पुरोधा

1 मार्च , 1964 को उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के रामपुर कांधी, देवलास गांव में जन्मे परिचय दास का मूल नाम रवींद्रनाथ श्रीवास्तव है। उनके पिता राजेन्द्र लाल श्रीवास्तव और माता माधुरी श्रीवास्तव ने उन्हें भारतीय संस्कृति, साहित्य और सामाजिक मूल्यों के संस्कार दिए।

ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े परिचय दास के भीतर बचपन से ही लोक संस्कृति और भाषा के प्रति गहरा लगाव था। गांव की बोली, लोकगीतों की मिठास और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं ने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में लोक और समकालिकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। कभी-कभी अल्ट्रा कंटेम्पररी ( अति समकालीन ) भी किंतु उनमें परंपरा व समकालीनता के बीच प्रवहशीलता निरंतर बनी रहती है।

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शिक्षा और साहित्य का संगम

परिचय दास ने हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद गोरखपुर विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि हासिल की। वर्तमान में वे संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन नव नालंदा महाविहार (डीम्ड विश्वविद्यालय), नालंदा (बिहार) में हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं संकाय अध्यक्ष ( डीन ) के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वे हिंदी विभाग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

उनकी शैक्षणिक यात्रा यह प्रमाणित करती है कि भोजपुरी केवल लोकजीवन की भाषा नहीं बल्कि गंभीर अकादमिक विमर्श और शोध की भी सशक्त भाषा है।

भोजपुरी कविता को दिया नया सौंदर्यबोध

समकालीन भोजपुरी कविता के इतिहास में परिचय दास का नाम एक नए मुहावरे के कवि के रूप में दर्ज है। उन्होंने भोजपुरी कविता को पारंपरिक भावभूमि से आगे बढ़ाकर वैश्वीकरण, संस्कृति, लोकतंत्र, सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों से जोड़ा। उनकी कविताओं को भारतीय परिप्रेक्ष्य में उच्च स्थान के रूप में देखा जा सकता है। वे असमिया, बांग्ला, ओड़िया आदि अन्य भारतीय भाषाओं के समकालीन साहित्य के समतुल्य हैं।

उनकी कविताएं भोजपुरी समाज की आत्मा को आधुनिक संवेदनाओं के साथ अभिव्यक्त करती हैं। वे लोकभाषा की सहजता को बनाए रखते हुए उसे वैचारिक ऊंचाई प्रदान करते हैं। यही कारण है कि साहित्यिक जगत उन्हें भारतीय भाषाओं के विशिष्ट वैयक्तिक निबंधकार और भोजपुरी के प्रखर कवि के रूप में स्वीकार करता है।

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दिल्ली सरकार की अकादमियों को दिया नया आयाम

परिचय दास दिल्ली सरकार के अधीन मैथिली-भोजपुरी अकादमी और हिंदी अकादमी के सचिव रह चुके हैं। उनके कार्यकाल को इन दोनों संस्थाओं के स्वर्णिम दौर के रूप में देखा जाता है।

उन्होंने न केवल साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई ऊंचाई दी बल्कि भोजपुरी की नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया। उनके नेतृत्व में साहित्य, कला, नाटक, संगीत और लोक संस्कृति से जुड़े सौ से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।

भोजपुरी भाषा को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में संस्थागत पहचान दिलाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। अनेक युवा साहित्यकारों को उन्होंने मंच और अवसर उपलब्ध कराए।

संपादन के क्षेत्र में भी आगे

परिचय दास ने कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया है। इनमें प्रमुख हैं-
इंद्रप्रस्थ भारती (हिंदी अकादमी, दिल्ली)
परिछन (मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली)
स्रोतस्विनी (सीसीआरटी, भारत सरकार)
सांस्कृतिकी (सीसीआरटी, भारत सरकार)
प्रद्न्या (सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक पत्रिका)।
इस समय ‘गौरवशाली भारत’ हिंदी मासिक पत्रिका एवं ‘समाचार विंदु’ साप्ताहिक भोजपुरी समाचार पत्र के प्रधान संपादक हैं।

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उन्होंने भोजपुरी के लोकनाट्य सम्राट भिखारी ठाकुर पर एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक पुस्तक का संपादन भी किया जिसे भोजपुरी साहित्य का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। इस पुस्तक का शीर्षक है ‘सर्जक भिखारी ठाकुर’।

संस्कृति~संरक्षण के लिए किया महत्त्वपूर्ण कार्य

परिचय दास ने भारतीय कला और संस्कृति के संरक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने 25 से अधिक सांस्कृतिक प्रकाशनों का संपादन किया है, जिनमें प्रमुख हैं. इसमें सत्रीय नृत्य, भारत में पारंपरिक रंगमंच ( दो खंड ), भारत के पर्व ( दो खंड ) आदि है. यह कार्य उनके व्यापक सांस्कृतिक दृष्टिकोण और भारतीय लोक परंपराओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भोजपुरी की बुलंद आवाज

परिचय दास ने भोजपुरी साहित्य को वैश्विक मंच तक पहुंचाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2012 में केंद्रीय साहित्य अकादेमी के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने काठमांडू में भोजपुरी भाषा और साहित्य पर व्याख्यान दिया। 2011 में दिल्ली में आयोजित सार्क साहित्य सम्मेलन में कविता पाठ किया।
साहित्य अकादेमी, दिल्ली में अपनी कविताओं का पाठ किया। भारतीय कविता-उत्सव की अध्यक्षता की। दिल्ली विश्वविद्यालय , महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी , दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया, मगध विश्व विद्यालय , बोधगया, बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर विश्व विद्यालय, लखनऊ सहित देश के अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों में व्याख्यान दिए। वैश्वीकरण, साहित्य, संस्कृति और विश्वबंधुत्व जैसे विषयों पर अनेक राष्ट्रीय संगोष्ठियों को संबोधित किया। नृत्य , संगीत और सिनेमा के अंतरसंबंधों पर ‘खजुराहो महोत्सव’ में व्याख्यान दिया। कथक के सांस्कृतिक प्रसंगों पर कथक केंद्र , भारत सरकार, नई दिल्ली में गोष्ठी का संयोजन किया तथा व्याख्यान दिया। फिजी में 2023 में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। दिल्ली सहित देशभर में उन्होंने पचास से अधिक महत्त्वपूर्ण व्याख्यान दिए हैं।

साहित्यिक कृतियों का समृद्ध संसार

परिचय दास ने तीस से अधिक पुस्तकों का लेखन, संपादन और पाठ-संपादन किया है। उनकी साहित्यिक यात्रा में चारुता, एक नया विन्यास, संसद भवन की छत पर खड़ा हो के, पृथ्वी से रस ले के, युगपत समीकरण में, आकांक्षा से अधिक सत्वर, धूसर कविता, कविता चतुर्थी, धीमी आंच में, लिपि-अलीपी, अनुपस्थित दिनांक, स्वप्न, संपर्क, स्मृति और मनुष्यता की भाषा का मर्म जैसी महत्वपूर्ण कृतियां शामिल हैं। उनकी रचनाएं भाषा, संवेदना और समकालीन जीवन के विविध पक्षों को गहराई से अभिव्यक्त करती हैं। विशेष रूप से उनकी कविताओं को समकालीन भोजपुरी कविता के विकास और विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

सम्मानों से अलंकृत साहित्यिक यात्रा

साहित्य और भाषा सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए परिचय दास को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें भारतीय अनुवाद परिषद का द्वि-वागीश सम्मान (2012), भोजपुरी कीर्ति सम्मान, भारतीय दलित साहित्य सम्मान, श्याम नारायण पांडेय सम्मान, एडिटर्स चॉइस अवार्ड, माटी के लाल सम्मान, रोटरी क्लब सम्मान, दामोदर दास चतुर्वेदी भाषा-साहित्य सम्मान और भगीरथ सम्मान प्रमुख हैं। ये सम्मान उनकी साहित्यिक साधना, भाषा संरक्षण और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण के प्रमाण हैं।

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क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?

परिचय दास को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी को केवल एक लोकभाषा नहीं रहने दिया। उन्होंने इसे आधुनिक कविता, अकादमिक अध्ययन, सांस्कृतिक विमर्श और वैश्विक संवाद की भाषा बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उनकी लेखनी में लोक की आत्मीयता है, विचार की गंभीरता है और संस्कृति के प्रति गहरी प्रतिबद्धता है। उन्होंने भोजपुरी को गांव की चौपाल से विश्वविद्यालय के शोध कक्ष तक और साहित्यिक मंचों से अंतरराष्ट्रीय सभागारों तक सम्मान दिलाने का काम किया है।
भोजपुरी धुरंधर शृंखला में परिचय दास उस साहित्यकार के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने भोजपुरी भाषा को नया विन्यास दिया और उसे भारतीय भाषाओं के साहित्यिक मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई। परिचय दास भोजपुरी को सिर्फ भाषा के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना के रूप में देखते हैं। वे भोजपुरी को लोक-स्मृति में सुरक्षित रखने के बजाय उसे समकाल के प्रश्नों से लगातार जोड़ते हैं। वे लोकप्रिय होने के लिए लोक का सरलीकरण नहीं करते बल्कि लोक की गहराई को समकालीन बौद्धिकता प्रदान करते हैं। उनकी भोजपुरी में गाँव की मिट्टी है लेकिन दृष्टि केवल गाँव तक सीमित नहीं है। वे भोजपुरी को भावुक अस्मिता से उठाकर साहित्यिक गरिमा और वैचारिक स्वायत्तता प्रदान करते हैं। उनके यहाँ लोक और समकालीनता आमने-सामने नहीं बल्कि एक-दूसरे को प्रकाशित करते हैं।
वे भोजपुरी के लिए केवल लिखते नहीं बल्कि संस्थाओं, संपादन, अकादमिक विमर्श और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से उसका सार्वजनिक क्षेत्र निर्मित करते हैं।

उनकी रचनात्मकता की बारीकी यह है कि वे भोजपुरी की सहजता को बचाए रखते हुए उसमें जटिल समकालीन अनुभवों को व्यक्त करने की क्षमता पैदा करते हैं। वे भोजपुरी को अतीत की विरासत नहीं बल्कि भविष्य की संभावनाओं वाली जीवित भाषा मानते हैं। उनकी सबसे अलग पहचान यह है कि उनके लिए भाषा-प्रेम केवल भावनात्मक आग्रह नहीं बल्कि बौद्धिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक कर्म है। इसीलिए परिचय दास का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने भोजपुरी में क्या लिखा बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने भोजपुरी के बारे में सोचने का दायरा भी विस्तृत किया।

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