Bhojpuri24.com की शृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय उस बहुआयामी व्यक्तित्व का, जिन्होंने भोजपुरी लोकसंगीत को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे लोकजीवन, मनोविज्ञान, शोध और संगीत चिकित्सा से जोड़कर देखने का प्रयास किया। डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय उन चुनिंदा साधकों में हैं, जिन्होंने भोजपुरी लोकपरंपरा की आत्मा को वैज्ञानिक दृष्टि और आधुनिक विमर्श से जोड़ा है।
वे लोकगायक, मनोवैज्ञानिक, शोधकर्ता, संगीत चिकित्सक और संस्कृति साधक हैं। उनकी यात्रा इस बात का उदाहरण है कि लोक और शास्त्र, परंपरा और आधुनिकता तथा कला और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। भोजपुरी लोकसंगीत के संरक्षण, संवर्धन और नए संदर्भों में प्रस्तुति के लिए उनका निरंतर प्रयास उन्हें विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।
चंदौली की जड़ों से रोहतास की लोकमाटी तक
डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय का पैतृक संबंध उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद से है, लेकिन उनका बचपन बिहार के रोहतास जनपद के विक्रमगंज क्षेत्र में बीता। लगभग पांच वर्ष की उम्र से ही उन्हें भोजपुरी लोकसंस्कृति, लोकभाषा और लोकपरंपराओं को करीब से देखने-समझने का अवसर मिला।
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रोहतास और भोजपुर अंचल का सांस्कृतिक परिवेश लोकगीतों, लोककथाओं और परंपराओं से समृद्ध रहा है। यहां लोकगीत केवल गीत नहीं होते, बल्कि जीवन के संस्कार, सामाजिक संबंधों और सामूहिक अनुभवों की अभिव्यक्ति होते हैं। इसी परिवेश ने डॉ. उपाध्याय के भीतर लोकसंगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा किया।
पूर्वांचल और भोजपुरी अंचल की सांस्कृतिक धाराओं के बीच पले-बढ़े होने के कारण उन्होंने भोजपुरी की विभिन्न बोलियों, शब्दावली और गायन परंपराओं को समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पूंजी बना।

गुरु परंपरा से मिली लोकसंगीत की साधना
डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय की संगीत यात्रा वर्ष 2001 में शुरू हुई, जब उन्हें भोजपुरी लोकसंगीत के प्रतिष्ठित गुरु श्री जितेन्द्रनाथ सिंह ‘जीत’ का सान्निध्य प्राप्त हुआ।
गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों की विभिन्न विधाओं का अध्ययन किया। उन्होंने समझा कि लोकगीत केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं हैं, बल्कि समाज की स्मृतियों और भावनाओं के जीवंत दस्तावेज हैं।
गुरुजी ने उन्हें लोकगीतों को संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करने की सीख दी। यही कारण है कि डॉ. उपाध्याय के गायन में केवल स्वर नहीं, बल्कि लोकजीवन की अनुभूति भी दिखाई देती है।
वर्ष 2003 में उन्हें आकाशवाणी द्वारा ‘बी-ग्रेड लोकगीत कलाकार’ के रूप में मान्यता मिली। इसी वर्ष प्रतिष्ठित लोकगायन प्रतियोगिता ‘फोक जलवा’ में वे उपविजेता रहे। यह उपलब्धियां उनकी संगीत साधना के महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुईं।
संगीत और मनोविज्ञान का अनूठा संगम
डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय की सबसे अलग पहचान यह है कि उन्होंने संगीत को केवल कला के रूप में नहीं देखा, बल्कि मानव मन से उसके संबंधों को भी समझने का प्रयास किया।
उन्होंने मनोविज्ञान, सांख्यिकी और शोध के क्षेत्र में अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने अनुभव किया कि संगीत मानव भावनाओं, मानसिक संतुलन और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करने की अद्भुत क्षमता रखता है।
इसी सोच ने उन्हें संगीत चिकित्सा (Music Therapy) के क्षेत्र की ओर प्रेरित किया। वर्तमान में वे मनोविज्ञान के क्षेत्र में अध्यापन एवं शोध कार्य से जुड़े हैं और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के संगीत चिकित्सा लैब एवं शोध केंद्र के माध्यम से भारतीय संदर्भ में संगीत चिकित्सा की संभावनाओं पर कार्य कर रहे हैं।
उनका मानना है कि भारतीय लोकसंगीत में केवल सांस्कृतिक मूल्य ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी वैज्ञानिक संभावनाएं भी छिपी हैं।
लोकविद्वानों के सान्निध्य से समृद्ध हुई यात्रा
वर्ष 2018 में वाराणसी लौटने के बाद उनकी सांस्कृतिक यात्रा को नई दिशा मिली। कोविड काल के दौरान उनका संपर्क भोजपुरी लोकसाहित्य और लोकगायन के विद्वान पंडित हरिराम द्विवेदी ‘बाबूजी’ से हुआ।
बाबूजी के मार्गदर्शन में उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों की दुर्लभ विधाओं, उनके सामाजिक संदर्भों और पारंपरिक प्रस्तुति शैली को समझा।
उनका मानना है कि लोकगीतों की वास्तविक शक्ति उनके शब्दों में नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे लोकजीवन के अनुभवों में होती है। बाबूजी से मिली सीख ने उनके दृष्टिकोण को और व्यापक बनाया।
इसी क्रम में उन्हें संकटमोचन संगीत समारोह सहित अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर लोकगायन प्रस्तुत करने का अवसर मिला। उत्तर प्रदेश सरकार से संबद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में भी उन्होंने भोजपुरी लोकसंगीत का प्रतिनिधित्व किया।
लोकविधाओं के संरक्षण की निरंतर साधना
वर्तमान समय में डॉ. उपाध्याय भोजपुरी लोकसंगीत के वरिष्ठ विद्वान डॉ. रामनारायण तिवारी के मार्गदर्शन में निरंतर सीख रहे हैं।
वे भोजपुर और रोहतास क्षेत्र की पारंपरिक शब्दावली, गंगा गीत, कजरी, सोहर, विवाह गीत और अन्य लोकविधाओं के संरक्षण एवं अध्ययन में सक्रिय हैं।
उनका उद्देश्य केवल गीतों का गायन नहीं, बल्कि उन लोकपरंपराओं का दस्तावेजीकरण करना है जो धीरे-धीरे विस्मृति की ओर बढ़ रही हैं।
डिजिटल माध्यमों के जरिए वे भोजपुरी लोकसंगीत को नई पीढ़ी और वैश्विक श्रोताओं तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। ‘Music of Durgesh’, ‘Music by Dr. Durgesh Upadhyay’ और ‘Music of Durgesh Official’ जैसे मंचों के माध्यम से वे लोकधुनों को व्यापक समाज तक पहुंचा रहे हैं।
लोकगीतों में समाज की आत्मा देखते हैं
डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय के अनुसार लोकगीत किसी समाज के जीवंत अभिलेख होते हैं। इनके माध्यम से समाज की संस्कृति, पारिवारिक व्यवस्था, स्त्री जीवन, लोकविश्वास, कृषि परंपरा और सामाजिक परिवर्तन को समझा जा सकता है।
विशेष रूप से भोजपुरी लोकगीतों में स्त्री जीवन की संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। बेटी, बहन, पत्नी और मां के अनुभव लोकगीतों में पीढ़ियों से संरक्षित हैं।
उनका मानना है कि लोकगीत पीढ़ियों के बीच संवाद का सबसे प्रभावी माध्यम हैं। आज जब नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो रही है, तब लोकसंगीत उन्हें अपनी पहचान से जोड़ने का कार्य कर सकता है।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी लोकसंगीत को केवल मंचीय कला तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे लोकसंस्कृति, मनोविज्ञान और वैज्ञानिक अध्ययन से जोड़कर इसकी संभावनाओं को विस्तार दिया।
उनकी साधना में लोक की आत्मीयता है, शोध की गंभीरता है और संस्कृति संरक्षण की प्रतिबद्धता है। वे भोजपुरी को केवल अतीत की विरासत नहीं मानते, बल्कि भविष्य की संभावनाओं वाली जीवंत संस्कृति के रूप में देखते हैं।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि लोकसंगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, मन की चिकित्सा और संस्कृति की पहचान भी है।
भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय उस साधक के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने लोकधुनों को मन की संवेदना और विज्ञान की दृष्टि से जोड़कर भोजपुरी संस्कृति को नई दिशा देने का कार्य किया है।

