बिहार में त्योहार सिर्फ रंग, पूजा और पकवानों का नाम नहीं हैं, बल्कि ये घर की पुरानी परंपराओं, रिश्तों और यादों का हिस्सा भी हैं। इन्हीं परंपराओं में शामिल है पेड़किया, जो कई बिहारी घरों में होली से लेकर बेटी की शादी तक खास जगह रखती है।
बेटी की विदाई के समय मायके के हाथों से बनी यह मिठाई सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि घर का अपनापन भी अपने साथ ले जाती है। वहीं, होली में रंग और अबीर के बीच पेड़किया की मिठास त्योहार की रौनक बढ़ा देती है।
लेकिन सवाल यह है कि देश के दूसरे हिस्सों में गुजिया के नाम से पहचानी जाने वाली यह मिठाई बिहार में पेड़किया क्यों कहलाती है? इसकी कहानी कितनी पुरानी है? और बिहार के अलग-अलग इलाकों में इसके स्वाद और बनाने के तरीके में कितना फर्क है? तो चलिए जानते हैं बिहार की इस देसी मिठाई की कहानी, इसके अलग-अलग स्वाद और इससे जुड़ी खास परंपराओं के बारे में।
गुजिया नहीं, बिहार में पेड़किया क्यों?
पेड़किया को बिहार में पिड़किया और कुछ जगहों पर पुरुकिया जैसे नामों से भी जाना जाता है। दिखने में यह गुजिया जैसी होती है। मैदा या आटे की बाहरी परत के अंदर मीठी भरावन भरी जाती है और फिर इसे घी या तेल में तलकर तैयार किया जाता है।
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भारत के अलग-अलग राज्यों में इसी तरह की मिठाई अलग-अलग नामों और स्वाद के साथ मिलती है। महाराष्ट्र में इसे करंजी, जबकि गुजरात में घुघरा कहा जाता है।
लेकिन बिहार में पेड़किया की अपनी अलग पहचान है। इसकी भरावन, आकार और किनारों पर बनाई जाने वाली डिजाइन तक घर और इलाके के हिसाब से बदल सकती है। यही स्थानीय विविधता इसे सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि बिहार की घरेलू खाद्य परंपरा का हिस्सा बनाती है।
13वीं शताब्दी तक जाती है इसकी कहानी?
गुजिया या इससे मिलते-जुलते मीठे पकवानों का इतिहास काफी पुराना माना जाता है। कुछ स्रोत इसके शुरुआती रूप को 13वीं शताब्दी से जोड़ते हैं। पुराने संदर्भों में गेहूं के आटे की परत में गुड़ और शहद जैसी मीठी चीजें भरकर तैयार किए जाने वाले पकवान का उल्लेख मिलता है।
वहीं, कुछ फूड हिस्टोरियन इसके आकार और बनाने की तकनीक की तुलना मध्य-पूर्व और मध्य एशिया की कुछ मीठी पेस्ट्री से करते हैं।
हालांकि, इसकी शुरुआत को लेकर कोई एक सर्वमान्य और पक्की कहानी नहीं है। इसलिए पेड़किया या गुजिया को किसी एक देश या संस्कृति से आया हुआ बताना सही नहीं होगा। इतना जरूर है कि समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों ने इस तरह के पकवान को अपने स्थानीय स्वाद और परंपराओं के मुताबिक अपना लिया।
बेटी की शादी में पेड़किया का क्या मतलब है?
बिहार में बेटी की शादी पूरे परिवार के लिए एक बड़ा आयोजन होती है। शादी की तैयारियों में कपड़े और गहनों के साथ खाने-पीने की चीजों की भी अपनी अहमियत होती है।
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कई परिवारों में घर की महिलाएं मिलकर पारंपरिक पकवान तैयार करती हैं और पेड़किया भी उनमें शामिल हो सकती है। इसे रिश्तेदारों और बेटी के ससुराल पक्ष के लोगों के लिए भेजने की परंपरा भी कुछ परिवारों में देखने को मिलती है।
यानी पेड़किया सिर्फ एक मिठाई बनकर नहीं जाती, उसके साथ मायके के घर का स्वाद और अपनापन भी जाता है।
हालांकि, यह परंपरा हर बिहारी परिवार या हर इलाके में एक जैसी नहीं है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में इसके तौर-तरीके अलग हो सकते हैं।
होली में पेड़किया की मिठास
बिहार की होली का अपना अलग रंग है। रंग और अबीर के साथ घर में पकवानों की तैयारी, रिश्तेदारों का आना-जाना और साथ बैठकर खाना-ये सब मिलकर त्योहार की रौनक बढ़ाते हैं।
इसी दौरान कई घरों में पेड़किया भी बनाई जाती है। कहीं यह होली की खास मिठाई के तौर पर बनती है, तो कहीं परिवार की पुरानी रेसिपी के हिसाब से। इसलिए किसी के लिए पेड़किया होली की याद है, तो किसी के लिए बचपन के घर की।
सूजी वाली या मावे वाली, कौन सी पेड़किया?
पेड़किया का सबसे खास हिस्सा उसकी भरावन होती है। यही भरावन उसके स्वाद को एक घर से दूसरे घर तक अलग बना देती है।
सूजी वाली पेड़किया में सूजी को घी में भूनकर उसमें चीनी, नारियल, इलायची और मेवे मिलाए जाते हैं। यह भरावन खुशबूदार होती है और स्वाद में हल्की खस्ता लगती है।
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वहीं, खोआ या मावे वाली पेड़किया में भुना हुआ मावा, चीनी और मेवे इस्तेमाल किए जाते हैं। इसकी भरावन अपेक्षाकृत ज्यादा समृद्ध और मुलायम होती है।
हालांकि, कई घरों में सामग्री और उसकी मात्रा परिवार की पसंद और पुरानी रेसिपी के हिसाब से बदलती रहती है। यही वजह है कि एक ही नाम की पेड़किया का स्वाद अलग-अलग घरों में बिल्कुल अलग महसूस हो सकता है।
हाथ से बनी पेड़किया की अलग ही बात
पेड़किया बनाना भी अपने आप में एक घरेलू कला है। पहले मैदा में घी का मोयन डालकर आटा गूंथा जाता है। फिर इसकी छोटी-छोटी लोइयां बनाकर उन्हें बेला जाता है। बीच में भरावन रखी जाती है और किनारों को अच्छी तरह बंद किया जाता है। कहीं हाथ से किनारों को मोड़कर खूबसूरत डिजाइन बनाई जाती है, तो कहीं सांचे की मदद ली जाती है। इसके बाद पेड़किया को धीमी आंच पर घी या तेल में सुनहरा और खस्ता होने तक तला जाता है। और जब गर्म पेड़किया की खुशबू पूरे घर में फैलती है, तो त्योहार का एहसास अपने आप आने लगता है।
बिहार के किन इलाकों में मिलती है खास पहचान?
पेड़किया बिहार के कई हिस्सों में बनाई जाती है। भोजपुर और आरा, पटना के आसपास के ग्रामीण इलाकों, बाढ़ और मोकामा जैसे क्षेत्रों में इसकी स्थानीय पहचान देखने को मिलती है। गया और मिथिलांचल के कई इलाकों में भी त्योहारों के दौरान इसे बनाया जाता है। लेकिन पेड़किया की खास बात यह है कि इसका कोई एक तय बिहारी स्वाद नहीं है।
किसी घर में नारियल ज्यादा होगा, तो किसी में सूजी। कहीं मावे की भरावन होगी, तो कहीं देसी घी की खुशबू ज्यादा महसूस होगी। कहीं यह ज्यादा खस्ता होगी, तो कहीं अंदर से मुलायम। यही विविधता पेड़किया को बिहार के अलग-अलग घरों की अपनी मिठाई बनाती है।
आखिर पेड़किया सिर्फ मिठाई क्यों नहीं?
क्योंकि बिहार में खाने का रिश्ता अक्सर सिर्फ स्वाद से नहीं होता। उसमें परिवार होता है, त्योहार होते हैं और पुरानी यादें होती हैं। होली में पेड़किया त्योहार की मिठास बन जाती है। बेटी की शादी में यह मायके के अपनापन की निशानी बन सकती है। और जब इसे मां, दादी या नानी अपने हाथों से बनाती हैं, तो उसका स्वाद सिर्फ जीभ पर नहीं रहता, बल्कि यादों में बस जाता है। शायद इसलिए बिहार में पेड़किया को सिर्फ गुजिया कह देना इसकी पूरी कहानी नहीं बताता।
इसके नाम में बिहार की बोली है, इसके स्वाद में घर की पहचान है और इसकी खुशबू में त्योहारों और रिश्तों की पुरानी यादें। यही वजह है कि पेड़किया बिहार में सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि स्वाद, परंपरा और अपनापन को जोड़ने वाली एक ऐसी कड़ी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती चली आ रही है।

