नेटुआ नाच: भोजपुरी लोकसंस्कृति का वह मंच, जहां नाच के साथ समाज भी बोलता था

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लोकनृत्य, लोकनाट्य और सामाजिक अभिव्यक्ति का अनूठा संगम है नेटुआ नाच। कभी गांव-गांव घूमकर लोगों का मनोरंजन करने वाली यह परंपरा आज बदलते समय, मनोरंजन के नए साधनों और कलाकारों की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

भोजपुरी अंचल की लोकसंस्कृति को केवल गीतों, सोहर, कजरी और बिरहा से समझना अधूरा होगा। इस संस्कृति की एक बड़ी ताकत उसकी नाच-नाट्य परंपरा रही है। इसी परंपरा में नेटुआ नाच का अपना विशिष्ट स्थान है। बिहार सरकार की शैक्षिक सामग्री में भी नटुआ/नटुवा नाच को बिहार की लोकनृत्य परंपराओं में शामिल किया गया है और इसे लोकजीवन से जुड़ी प्रस्तुति माना गया है।

नेटुआ आखिर है क्या?

‘नेटुआ’ शब्द का संबंध परंपरागत रूप से नट समुदाय और घूम-घूमकर प्रदर्शन करने वाले कलाकारों से जोड़ा जाता है। भोजपुरी शब्दकोश में भी नेटुआ का अर्थ घुमंतू समुदाय और उससे जुड़े नाच से मिलता है।

परंपरागत रूप से नेटुआ मंडलियां गांवों, मेलों और सामाजिक आयोजनों में प्रदर्शन करती थीं। गीत, संगीत, अभिनय, नृत्य और हाव-भाव—इन सबको मिलाकर मनोरंजन की प्रस्तुति तैयार होती थी। भोजपुरी साहित्य संबंधी एक अध्ययन में नेटुआ मंडली में सारंगी, तबला और कांसी जैसे वाद्यों तथा पुरुष कलाकारों द्वारा स्त्री पात्रों की प्रस्तुति का उल्लेख मिलता है।

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यहीं से नेटुआ नाच का वह रूप सामने आता है जिसे आज कई जगह लौंडा नाच के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि दोनों शब्दों को हर क्षेत्र में बिल्कुल समान अर्थ में इस्तेमाल करना उचित नहीं होगा। शोधकर्ताओं ने बिहार की नाच परंपरा के नामकरण—’नाच’, ‘लौंडा नाच’ और ‘बिदेसिया’—के पीछे जाति, वर्ग और लैंगिक राजनीति की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।

जब पुरुष कलाकार निभाते थे स्त्री की भूमिका

नेटुआ नाच की सबसे खास विशेषताओं में से एक पुरुष कलाकारों द्वारा स्त्री पात्रों की भूमिका निभाना रहा है। कलाकार स्त्रियों की वेशभूषा पहनकर उनके हाव-भाव, चाल-ढाल और नृत्य को मंच पर प्रस्तुत करते थे।

बिहार के बक्सर क्षेत्र की नाच परंपरा पर लिखते हुए द इंडियन एक्सप्रेस ने भी बताया है कि सामाजिक आयोजनों में पुरुष कलाकार स्त्री का रूप धारण करके नृत्य करते थे और इसे स्थानीय रूप से लौंडा या नेटुआ नाच की परंपरा से जोड़ा जाता था।

लेकिन इसे केवल ‘पुरुष का स्त्री बनकर नाचना’ कह देना इस कला के साथ न्याय नहीं होगा। इसके पीछे एक पूरी रंगमंचीय परंपरा है-संगीत, संवाद, अभिनय, हास्य, व्यंग्य, कथा और तत्काल सामाजिक परिस्थितियों पर टिप्पणी।

मनोरंजन के साथ समाज का आईना

नेटुआ और व्यापक ‘नाच’ परंपरा की असली ताकत यही रही कि मंच केवल मनोरंजन का स्थान नहीं था। गांव-समाज की समस्याएं भी उसी मंच पर आती थीं।

जाति-व्यवस्था, गरीबी, प्रेम, विवाह, प्रवास, पारिवारिक संघर्ष, स्त्री-पुरुष संबंध और सामाजिक असमानता जैसे विषय लोकनाट्य के माध्यम से सामने आते रहे। एक शोध में बिहार के नटुआ नाच को दलित लोकगाथाओं की प्रदर्शन परंपरा बताते हुए इसे सामूहिक स्मृति, अस्मिता और सामंतवाद के प्रति प्रतिरोध से जोड़ा गया है।

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इस लिहाज से नेटुआ नाच को केवल ‘लोकनृत्य’ कहना भी इसकी भूमिका को छोटा करना है। कई रूपों में यह लोकनाट्य और सामाजिक संवाद का माध्यम रहा है।

लोककथा से लोकप्रतिरोध तक

बिहार की नटुआ नाच परंपरा में अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों की लोकगाथाएं मंचित होती रही हैं। रेशमा-चुहड़मल, सल्हेस, दीना-भद्री, मनसराम-छेछनमल जैसी गाथाओं के मंचन का उल्लेख शोध साहित्य में मिलता है। इन कथाओं में वीरता, संघर्ष और सामाजिक अस्मिता के तत्व मौजूद हैं।

इसलिए नेटुआ नाच की कथा केवल मंच पर चलने वाली कहानी नहीं होती थी। वह उस समुदाय की सामूहिक स्मृति भी होती थी, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी कलाकार अपने प्रदर्शन के माध्यम से आगे बढ़ाते थे।

भिखारी ठाकुर और नाच की नई पहचान

भोजपुरी लोकनाट्य की चर्चा भिखारी ठाकुर के बिना अधूरी है। उन्होंने नाच की लोकप्रिय लोकपरंपरा को सामाजिक सवालों और प्रभावशाली कथानक के साथ जोड़ा। उनके नाच में सामाजिक कुरीतियों, प्रवास, स्त्री की स्थिति और पारिवारिक समस्याओं जैसे विषय प्रमुख रहे।

भिखारी ठाकुर ने 1917 में अपनी नाच मंडली बनाई और ‘बिदेसिया’, ‘गबरघिचोर’, ‘बेटी-बेचवा’, ‘भाई-बिरोध’, ‘गंगा-स्नान’ और ‘नेटुआ’ सहित अनेक नाटकों और गीतों की रचना की। इससे भोजपुरी नाच को केवल मनोरंजन की मंडली के बजाय एक प्रभावशाली लोकनाट्य माध्यम के रूप में नई पहचान मिली।

लेकिन कलाकारों को सम्मान कितना मिला?

यह नेटुआ नाच की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। जिस कला ने गांव के लोगों का मनोरंजन किया, सामाजिक मुद्दों को आवाज दी और लोककथाओं को जिंदा रखा, उसके कलाकारों को लंबे समय तक सामाजिक सम्मान और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल सकी। नाच कलाकारों को लेकर जाति और वर्ग आधारित पूर्वाग्रह भी रहे हैं। शोध में ‘नाच’ से ‘लौंडा नाच’ जैसे नामकरण को सामाजिक शक्ति-संबंधों और हाशिये के समुदायों को नीचा दिखाने की प्रक्रिया से भी जोड़ा गया है।

यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नेटुआ नाच बचा है या नहीं? सवाल यह भी है कि नेटुआ नाच के कलाकारों को वह सम्मान मिला या नहीं, जिसके वे हकदार हैं?

आधुनिक मनोरंजन के दौर में बदलता नेटुआ

मोबाइल, सोशल मीडिया, भोजपुरी सिनेमा, डीजे और डिजिटल मनोरंजन ने ग्रामीण मनोरंजन की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। पहले जिस आयोजन में रातभर नाच-मंडली लोगों को बांधे रखती थी, वहां अब कुछ मिनट के वायरल वीडियो भी दर्शकों का ध्यान खींच लेते हैं।

इसी कारण पारंपरिक नाच मंडलियों के सामने दर्शक जुटाने और नियमित आय का संकट पैदा हुआ है। नेटुआ नाच पर आधारित ‘Netua’ नामक नाट्य प्रस्तुति ने भी इस लोककला की गिरती स्थिति, कलाकारों के शोषण और जाति-लैंगिक सवालों को केंद्र में रखा था।

हालांकि इसे पूरी तरह समाप्त हो चुकी कला मानना भी सही नहीं होगा। बिहार की आधिकारिक शैक्षिक सामग्री में आज भी नटुआ नाच को लोकनृत्य परंपरा के हिस्से के रूप में दर्ज किया गया है।

संरक्षण सिर्फ मंच देने से नहीं होगा

नेटुआ नाच को बचाने के लिए केवल साल में एक-दो सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रस्तुति करवाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कई स्तरों पर काम करना होगा-

  • पुराने कलाकारों और मंडलियों का दस्तावेजीकरण हो।
  • उनके गीत, कथाएं और प्रदर्शन शैली ऑडियो-वीडियो रूप में संरक्षित किए जाएं।
  • युवा कलाकारों को प्रशिक्षण और नियमित मंच मिले।
  • लोक कलाकारों के लिए आर्थिक सहायता और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था हो।
  • स्कूल-कॉलेजों में भोजपुरी लोकनाट्य परंपराओं पर अध्ययन बढ़े।
  • नेटुआ नाच को केवल ‘मनोरंजन’ के नजरिये से नहीं, बल्कि लोक इतिहास और सामाजिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाए।

नेटुआ नाच को बचाना यानी अपनी स्मृति को बचाना

आज जब भोजपुरी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की बात होती है, तब सवाल केवल भाषा के विस्तार का नहीं है। भाषा के साथ उसके लोकगीत, लोककथाएं, लोकनाट्य और कलाकार भी बचने चाहिए।

नेटुआ नाच इसी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। इसके मंच पर कभी गांव की हंसी थी, कभी दुख था, कभी प्रेम था और कभी व्यवस्था पर व्यंग्य। कभी किसी लोकनायक की कहानी थी तो कभी समाज की उस सच्चाई का बयान, जिसे मुख्यधारा की आवाजें दबा देती थीं।

इसलिए नेटुआ नाच को सिर्फ ‘पुराने जमाने का नाच’ कहकर छोड़ देना भोजपुरी समाज की अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूलना होगा। नेटुआ नाच को बचाना दरअसल उन आवाजों को बचाना है, जिन्होंने बिना बड़े मंच, बिना आधुनिक तकनीक और बिना किसी औपचारिक संस्थान के पीढ़ियों तक लोकजीवन की कहानी सुनाई।

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