भोजपुरी के सोहर में आजो जनमेलन बनवारी, नंद के लाला से मन के कन्हैया तक

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-डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी

कुछ दृश्य उम्र के साथ धुँधले नहीं होते। वे मन के किसी कोने में वैसे ही सुरक्षित रह जाते हैं। बरसों बाद कोई गीत सुनाई दे, कोई त्योहार आए या कोई पुराना नाम याद हो, वे फिर सामने आ जाते हैं। कृष्ण की मेरी पहली स्मृति भी ऐसी ही है।

बिहार के उस छोटे-से संसार में तब हमारे घर में टीवी नहीं थी। बिजली भी अपने भरोसे नहीं आती थी। उन्हीं दिनों रामानंद सागर का ‘श्रीकृष्णा’ धारावाहिक शुरू हुआ। हमारे मित्र अमित के घर टीवी थी। कृष्ण को देखने हम वहाँ जाते। बैटरी साथ ले जाते। उसे चार्ज कराने के दस रुपये लगते थे। दस रुपये तब बहुत होते थे। मगर कृष्ण देखने की इच्छा के आगे यह खर्च छोटा लगता था।

चार्ज हुई बैटरी लगती। टीवी चलता। हम उसके सामने बैठ जाते। फिर जैसे हमारा छोटा-सा संसार बदल जाता। स्क्रीन पर मोरपंख दिखाई देता, पीताम्बर दिखता, बाँसुरी दिखाई देती और वह मुस्कान सामने आ जाती।

तब हमें यह नहीं मालूम था कि सामने विष्णु का अवतार है। यह भी नहीं जानते थे कि यही कृष्ण आगे चलकर अर्जुन के सारथी होंगे और गीता सुनाएँगे। हमारे लिए तो वे बस कन्हैया थे। ऐसे कन्हैया, जिन्हें देखने के लिए हम बैटरी लेकर मित्र के घर जाते थे।

शायद देवता से पहला परिचय ऐसे ही होता है-किसी बड़े विचार से नहीं, किसी अपने लगने वाले चेहरे से। बाद में कृष्ण के अनेक रूपों से परिचय हुआ। पता चला कि वे सोलह कलाओं से पूर्ण हैं। योगेश्वर हैं। कर्मयोग के प्रणेता हैं। गीता के वक्ता हैं और विष्णु के अवतार हैं। लेकिन बचपन में इन परिचयों की जरूरत नहीं थी।

लोक भी कृष्ण को इसी तरह पहले पहचानता है। वह उन्हें नंद का लाल कहता है, लाला कहता है, कन्हैया कहता है। इन संबोधनों में शास्त्र से अधिक अपनापन है। कृष्ण जितने विराट हैं, लोक में उतने ही घर के हैं। दादी की कथा में बैठते हैं। माँ की लोरी में सोते हैं। आँगन की मटकी के नीचे खड़े मिलते हैं। गायों के साथ लौटते हैं। बच्चे की शरारत में मुस्कराते हैं। भगवान होने के बाद भी घर के बच्चे बने रहना शायद कृष्ण की सबसे बड़ी लोकलीला है।

भोजपुरी लोक के कंठ में बसल कन्हैया

भोजपुरी लोक ने इस कन्हैया को अपने गीतों में सँभालकर रखा है। कृष्ण के जन्म की कथा वहाँ सोहर बन जाती है, बधैया बन जाती है। नंद का घर अपना घर हो जाता है। स्त्रियाँ जुटती हैं। ढोलक बजती है। गीत उठता है। जन्माष्टमी की रात जैसे किसी दूर के युग से चलकर भोजपुरी के किसी घर के आँगन में आ जाती है।

सोहर में कृष्ण का जन्म किसी पुरानी कथा की तरह नहीं, बल्कि अपने घर में लाला के जन्म की तरह घटता है-

“ललना, रोहिनी नक्षत्र तिथि अष्टमी,
जनमें बनवारी हो…”

इन पंक्तियों में भोजपुरी लोक की पूरी आत्मीयता बसी है। रोहिणी नक्षत्र है, अष्टमी तिथि है और बनवारी जन्मे हैं। मगर यह जन्म केवल मथुरा या गोकुल का नहीं रह जाता। गीत गाने वाली स्त्री अपने ही आँगन में उस जन्म को घटते हुए देखती है।

देवकी का पुत्र उसके कंठ में यशोदा का लाला हो जाता है। नंद का घर अपना घर लगता है। कृष्ण देवता रहते हुए भी घर के बच्चे हो जाते हैं।

यही भोजपुरी लोक का ढंग है। वह अपने प्रिय देवता को दूर नहीं रखता। उसे अपनी बोली देता है, अपना आँगन देता है, अपनी हँसी देता है और अपने गीत देता है।

इसलिए भोजपुरी में कृष्ण का जन्म केवल धार्मिक स्मरण नहीं है। वह घर में आए बच्चे का उत्सव है। सोहर की हर पंक्ति के साथ नंद का आँगन फैलता जाता है। उसमें हर वह घर शामिल हो जाता है, जहाँ बच्चे के जन्म पर स्त्रियाँ जुटती हैं और गीत उठता है।

जन्माष्टमी आती है तो बनवारी फिर जन्म लेते हैं। कन्हैया फिर घर के हो जाते हैं। उस क्षण नंद का आँगन किसी एक कथा का आँगन नहीं रहता। वह हर उस घर का आँगन बन जाता है, जहाँ बच्चे के जन्म पर सोहर गूँजता है।

बाँसुरी वाला कन्हैया आ कुरुक्षेत्र के सारथी

पर यही लाला एक दिन कुरुक्षेत्र में खड़ा मिलता है। हाथ में बाँसुरी नहीं, रथ की लगाम है। सामने अर्जुन है। उसके मन में मोह है और जीवन का कठिन प्रश्न है।

कृष्ण वहाँ जीवन से दूर खड़े होकर उत्तर नहीं देते। वे उसके बीच उतरते हैं। कर्म की बात करते हैं। कर्तव्य की बात करते हैं। मनुष्य को उसके भीतर के संशय से बाहर लाते हैं।

यही कृष्ण की विलक्षणता है। उनके भीतर बालक भी है और योगेश्वर भी। वृंदावन भी है और कुरुक्षेत्र भी। माखन की हाँड़ी भी है और गीता भी।

इसलिए लोक का कन्हैया और शास्त्र का कृष्ण अलग नहीं हैं। वे एक ही जीवन की दो दिशाएँ हैं। एक दिशा मन को जीना सिखाती है, दूसरी उसे संभालना।

स्मृति में अबहियो उहे कृष्ण

आज साधन बदल गए हैं। अब कृष्ण देखने के लिए बैटरी लेकर किसी मित्र के घर जाने की जरूरत नहीं। मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन पर वृंदावन आ जाता है। कथा कभी भी सुनी जा सकती है। तस्वीर कभी भी सामने आ सकती है।

मगर बचपन की वह शाम वहीं है-अमित का घर, टीवी के सामने बैठे बच्चे, बिजली का अनिश्चित भरोसा, दस रुपये में चार्ज हुई बैटरी और सामने कृष्ण। तब नहीं जानता था कि कोई दृश्य जीवन भर साथ चल सकता है। आज समझ आता है कि स्मृति भी एक तरह का मंदिर है। उसमें आरती नहीं होती। बस कुछ चेहरे सुरक्षित रहते हैं, कुछ आवाजें और कुछ शामें। मेरे लिए कृष्ण की पहली छवि उसी सुरक्षित जगह में है।

भोजपुरी के आँगन में आजो जनमेलन बनवारी

आज जन्माष्टमी है। कहीं झाँकियाँ सज रही होंगी। कहीं बाल-गोपाल पालने में झूल रहे होंगे। कहीं आधी रात के जन्म की प्रतीक्षा होगी। और किसी भोजपुरी घर में सोहर उठ रहा होगा। बधैया गाई जा रही होगी। किसी माँ के स्वर में नंद के घर लाला फिर पैदा होंगे।

यही भोजपुरी की ताकत है। वह बड़े से बड़े देवता को अपने घर का बना लेती है। शास्त्र का कृष्ण पूर्ण है, लोक का कृष्ण अपना। एक ही कृष्ण-एक ओर विष्णु का अवतार, दूसरी ओर नंद का लाल; एक ओर योगेश्वर, दूसरी ओर कन्हैया।

शायद कृष्ण की पूर्णता इसी में है कि वे सबके हो सकते हैं। मेरे लिए वे उस बच्चे की आँखों में बसे हैं, जो कभी अमित के घर टीवी के सामने बैठा था। उसे तब कृष्ण का विराट रूप मालूम नहीं था। उसे केवल इतना मालूम था कि सामने कोई अपना है। इतने वर्षों बाद भी उस पहचान में कोई कमी नहीं आई।  शायद कृष्ण को जानने की पहली सीढ़ी यही है-उन्हें पहले अपना मान लेना। और भोजपुरी लोक ने तो उन्हें सदियों से अपना मान ही लिया है। इसीलिए जन्माष्टमी पर जब भोजपुरी के किसी आँगन में सोहर उठता है-

“ललना, रोहिनी नक्षत्र तिथि अष्टमी,
जनमें बनवारी हो…”

तो लगता है, कृष्ण कहीं दूर नहीं जन्म ले रहे। हमरे ही घर में लाला बनके जनमल बाड़ें।

डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी

मूलतः देवरिया जिले के हरपुर गाँव के निवासी हैं। पेशेवर पत्रकारिता से मीडिया शोध और अकादमिक क्षेत्र में आए। उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से जनसंचार में एम.फिल. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। ‘द संडे इंडियन’ (भोजपुरी) से पत्रकारिता की शुरुआत की और ‘दैनिक भास्कर’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘अमर उजाला’ सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया। भोजपुरी भाषा-साहित्य, लोक संस्कृति, भोजपुरी डायस्पोरा, भारतीय ज्ञान परंपरा और आध्यात्मिक संचार में विशेष रुचि रखते हैं। उनकी प्रमुख संपादित पुस्तकों में ‘भोजपुरी की सांविधानिक मान्यता’, ‘गीत गगन’, ‘मितवा’ और ‘कसौटी पर जौहर’ शामिल हैं।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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