माटी के गंध, गाँव के पीड़ा आ लोकजीवन के सुर हऽ ‘चलऽ चलीं गँउवाँ के ओर’

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समीक्षक: राजेश भोजपुरिया

भोजपुरी साहित्य के समृद्ध परंपरा में गीत विधा के अपना एगो विशिष्ट स्थान बा। लोकजीवन, माटी के गंध, रिश्तन के आत्मीयता, प्रकृति के सौंदर्य आ बदलत सामाजिक परिवेश के अभिव्यक्ति भोजपुरी गीतन के मूल संवेदना रहल बा। एह परंपरा के आगे बढ़ावत कैलाश नाथ शर्मा ‘गाजीपुरी’ के पहिला भोजपुरी गीत-संग्रह ‘चलऽ चलीं गँउवाँ के ओर’ प्रकाशित भइल बा। जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् से प्रकाशित ई संग्रह भोजपुरी लोकजीवन आ संस्कृति के अनेक रंगन के गीतात्मक रूप में प्रस्तुत करेला।

एह संग्रह में कुल 84 काव्य-गीत संकलित बाड़े, जे गीतकार के प्रखर लेखनी, जीवनानुभव आ लोक-संवेदना के परिचायक बाड़े। गीतकार के रचना आ गीत देश भर के अनेक पत्र-पत्रिकन में प्रकाशित होत रहल बा। एकरा अलावा इनके लिखल पाँच गो गीत भोजपुरी फिल्म ‘नजरी पर सईयां जी’ में शामिल भइल बाड़े, जे बेहद लोकप्रिय रहल बाड़े।

गीतकार के साहित्यिक व्यक्तित्व

कैलाश नाथ शर्मा ‘गाजीपुरी’ भोजपुरी साहित्य के एगो स्थापित, सुसंस्कारी आ समर्पित हस्ताक्षर बानी। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला के भीमापार (मंगारी) गाँव के निवासी गाजीपुरी जी वर्तमान में जमशेदपुर में रह के लगातार भोजपुरी भाषा आ साहित्य के सेवा करत बानी।

इनकर स्वभाव अत्यंत विनम्र, शांत आ सुकोमल बा। बाल्यकाल से ही गीत-गवनई आ कविता से जुड़ल रहलें। पारिवारिक जिम्मेवारियन के कारण कुछ समय खातिर लेखन भले प्रभावित भइल, बाकिर इनके भीतर के सृजनधर्मी चेतना लगातार जीवित रहल। इनके रचना, गीत आ आलेख आकाशवाणी जमशेदपुर केंद्र से नियमित रूप से प्रसारित होत रहल बा आ श्रोतागण के बीच सराहल भी गइल बा।

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साहित्य-साधना खातिर गाजीपुरी जी के कई प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित कइल जा चुकल बा। एह में साहित्यकार सम्मान, तुलसी भवन साहित्य सेवी सम्मान, साहित्य सेवक सम्मान, शब्दशिल्पी सम्मान, कला आ संस्कृति सम्मान, छंदमाल्य सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान आ अहिल्या बाई होलकर सम्मान प्रमुख बाड़े।

लोकजीवन आ बदलत संस्कृति के पीड़ा

‘चलऽ चलीं गँउवाँ के ओर’ के गीतन पर नजर डालीं त एह संग्रह के सबसे खास विशेषता गीतन के सहज रवानगी आ लोकजीवन से गहिर जुड़ाव देखाई देला। गीतकार गाँव के माटी, लोक-संस्कृति, रिश्तन, प्रकृति, विरह, प्रेम आ सामाजिक बदलाव के अपना गीतन के केंद्र में रखले बानी।

‘बीतल बात’ शीर्षक गीत (पृष्ठ 25) में पुरान ग्रामीण संस्कृति आ आधुनिकता के कारण धीरे-धीरे विलुप्त होत लोकपरंपरा के बहुत मार्मिक ढंग से उकेरल गइल बा। जाँत-जतसार, ओखरी, मूसर, ढेकी आदि ग्रामीण जीवन के अभिन्न हिस्सा रहल साधन अब इतिहास के हिस्सा बनत जा रहल बाड़े। गीतकार एह बदलाव के केवल देखत नइखन, बल्कि ओकर पीड़ा के महसूस भी करत बानी—

“जात जतसार छूटल, छूटल चक्की ओखरी।
मूसर परईले, ढेकी भइली टुअरी।।

शहर के बियाह में माड़ो सुग्गा हेराइल।
हंसुआ के बियाह में खुरपी के गीत गवाइल।।”

एह पंक्तियन में बदलत समय के साथ लोकजीवन के छूटत प्रतीकन के स्मृति आ ओकर पीड़ा एक साथ दिखाई देला।

विरह आ परदेश के कसक

‘लिलरवा’ (पृष्ठ 37) में परदेश गइल मनई के मन के टीस आ गाँव-घर से जुड़ाव के बेजोड़ अभिव्यक्ति मिलेला। ‘लिलरवा’ में विरह केवल पति-पत्नी के दूरी ना, बल्कि अपन माटी, परिवार आ जड़ से दूर होखे के पीड़ा बन के सामने आवेला—

“जहिया से सइयां मोरा-छूवलें लिलरवा,
जियरवा ना लागे रे नईहरवा।
विधना के खेल-नईहर छोट भइलें।
बाबू माई सगरो से-नाता मोट भइलें।।
जनम के कुल से-भइनी बहरवा।
जियरवा ना लागे….।”

एह गीत में परदेश के पीड़ा आ मायका से टूटत संबंधन के भाव बहुत सहज आ प्रभावशाली ढंग से व्यक्त भइल बा।

राधा-कृष्ण के प्रेम आ लोकभाषा के मिठास

‘लोभाइल बाड़ू’ (पृष्ठ 39) में राधा-कृष्ण के प्रेम के आधार बनावल गइल बा। गीत के संवाद शैली अत्यंत सहज बा आ एहमें भोजपुरी लोक-संस्कृति के मिठास भरपूर दिखाई देला—

“राधा काहे आज-अतना लजाइल बाड़ू।
केकरा पर लोभाइल बाड़ू ना।।
तू त बाड़ू गमखोर-का कवनो मिलल चितचोर।
घरी-घरी जालू जमुना तीरे-बतीया होता चहुंओर।।
आज केकरा पर-अतना धधाइल बाड़ू।
कवना पर लोभाइल…..।”

गीत में प्रेम के लोकधर्मी रूप, चुहल आ संवाद के सुंदर समन्वय देखे के मिलेला।

प्रकृति आ ऋतु-सौंदर्य के चित्रण

‘पावस’ (पृष्ठ 51) प्रकृति आ ऋतु-चित्रण के सुंदर उदाहरण बा। पावस के आगमन के साथ मन में पैदा होखे वाला उल्लास, हरियरी आ ग्रामीण परिवेश के दृश्य गीतकार बहुत जीवंत ढंग से प्रस्तुत कइले बानी—

“मन हरियर हो जाता-पियर देख के।
पियरी में गोरी देख के ना।।
चना मटर गइराइल-महुआ चुये रसबोर।
निमन आम मोजराइल-कोयल गावे चहुंओर।।
मोर नाचता-बसंत नियरे देख के।
पियरी में गोरी…….।।”

प्रकृति के एह चित्रण में रंग, ध्वनि आ लोकजीवन के सहज बिम्ब एक-दूसरा से जुड़त दिखाई देला।

कजरी के लोकसुगंध

भोजपुरी लोकगायन में कजरी के एगो खास महत्व बा। संग्रह के ‘कजरी’ (पृष्ठ 63) में पारंपरिक लोकसुगंध के साथ कृष्ण-राधा के प्रेम-प्रसंग के सुंदर अभिव्यक्ति मिलेला—

“कान्हा कहाँ-गइले लुकाय हो।
राधा ढूँढें-गली-गली सगरी।।
बंसी के धुनवा सुनात आज नाहीं।
घरे नाहीं ना-कदमवाँ के छाहीं।।
कवन सखी-लिहलीं छुपाय हो।
राधा ढूँढें…….।।”

एह गीत में कजरी के पारंपरिक भावभूमि, विरह आ प्रेम के मधुर संगम दिखाई देला।

पलायन आ गाँव के बदलत चेहरा

‘गाँव भइल परदेश’ (पृष्ठ 72) संग्रह के एगो गंभीर आ विचारोत्तेजक गीत बा। गाँव से शहर की ओर बढ़त पलायन, शहर के चकाचौंध आ अपन गाँव से दूर होखे के पीड़ा एह गीत के मूल भाव बा—

“शहर के सपना कइलस धूप अवरी छाँव जी।
छुटी गइले हित-नात, छुटी गइले गाँव जी।।
छुटी गइले हो….

छोड़नी जब घर त इचिको शहर न भावे हो।
छुट्टी पर छुट्टी लिहीं, चलीं जाईं गाँवें हो।।
बनल रहे घरवा अउर पुरखन के नाँव जी।
छुटी गइले हो….
शहर के सपना….।”

एह गीत के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ई बा कि गीतकार शहर के आकर्षण के साथ-साथ गाँव से कटे के मानसिक पीड़ा के भी सामने रखले बानी। एह तरह से ई गीत आज के पलायनवादी समाज के एगो महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाला।

पारिवारिक जीवन के सहज चित्रण

‘ननदिया मोरी हो’ (पृष्ठ 91) में घरेलू जीवन, सास-ननद के नोकझोंक आ पारिवारिक ताना-बाना के सहज रूप से प्रस्तुत कइल गइल बा—

“गइले सउदिया सईयां-उड़ी गइल निंदिया।
ऐ ननदिया मोरी हो।।
भइया राउर गइलें अनकर देश।
ऐ ननदिया……।।”

एह गीत में घरेलू संवेदना के साथ लोकगीतन वाली आत्मीयता आ संवादधर्मिता स्पष्ट रूप से दिखाई देला।

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कैलाश नाथ शर्मा ‘गाजीपुरी’ के पहिलका एकल गीत-संग्रह ‘चलऽ चलीं गँउवाँ के ओर’ भोजपुरी साहित्य में एगो महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आवेला। संग्रह के 84 गीतन में जीवन के अलग-अलग रंग, गाँव के माटी के सोन्हापन, लोक-संस्कृति के अनुराग, प्रेम-विरह, प्रकृति-सौंदर्य, पारिवारिक संबंध आ बदलत सामाजिक परिवेश के विविध रूप देखे के मिलेला।

गाजीपुरी जी के गीतन के सबसे बड़ खूबी इनकर सहज भाषा, लोकधर्मी संवेदना आ गेयता बा। इहाँ के गीत में गाँव के जीवन केवल स्मृति बन के ना आवेला, बल्कि ओकर सुख-दुख, बदलाव आ संकट के साथ जीवंत रूप में उपस्थित रहेला। आधुनिकता के बीच लुप्त होत लोक-संस्कृति के प्रति चिंता आ अपन माटी से जुड़ाव एह संग्रह के विशेष पहचान बा।

जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् द्वारा प्रकाशित ई कृति भोजपुरी गीत-साहित्य के समृद्ध करे वाला सराहनीय प्रयास बा। आशा बा कि ‘चलऽ चलीं गँउवाँ के ओर’ भोजपुरी के पाठक आ लोकगीत-प्रेमियन के बीच आपन विशिष्ट जगह बनाइ। कैलाश नाथ शर्मा ‘गाजीपुरी’ जी के एह सुंदर रचना-संसार खातिर हार्दिक बधाई आ मंगलकामना।

पुस्तक: चलऽ चलीं गँउवाँ के ओर
विधा: भोजपुरी गीत-संग्रह
रचयिता: कैलाश नाथ शर्मा ‘गाजीपुरी’
प्रकाशक: जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद्
संस्करण: प्रथम संस्करण, 2025

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