भोजपुरी लोक की वह बात, जो रहीम भी जानते थे और दोहे में कह गए

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-डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी

भोजपुरी साहित्य की असल शक्ति या ताकत या विशिष्टता क्या है? उसकी लोक-स्मृति। उसकी जड़ें लोक जीवन में हैं, जो पीढ़ियों से बोलता, गाता और अपनी कथा कहता आया है। भोजपुरी का साहित्य लोक से अलग होकर अपनी पूरी पहचान नहीं बना सकता। उसके गीतों में खेत हैं, खरिहान हैं, आँगन हैं, मेले हैं, पर्व हैं, परदेस है, विरह है, हँसी है और वह अनगिनत जीवन है, जिसे इतिहास की बड़ी किताबें अक्सर छोड़ देती हैं। इसी लोक जीवन की एक अभिव्यक्ति है लोकगीत। इसमें मनई अपने मन की बात सबसे कम शब्दों में कहता है। कोई भोजपुरी स्त्री गाती है,

‘अनकर सुनर वर, पानी के हिलोरा

आपन कुबज वर, ले सुतबि भर कोरा…’

आशय या भाव है, दूसरे का पति कितना भी सुंदर हो, मेरे लिए पानी की लहर सदृश है। अपना पति कुबड़ा भी हो, तो उसे गोद में लेकर सोऊँगी। यह केवल पति के प्रति निष्ठा का गीत नहीं है। यह अपनेपन का गीत है। लोक का अपना दर्शन है। दूसरे की सुंदरता आँख को अच्छी लग सकती है। अपना आदमी मन को भाता है, अच्छा लगता है।

सदियाँ बीत जाती हैं। भाषा बदलती है। राज-पाट बदलते हैं। जीवन की चाल बदलती है। फिर भी मनुष्य के भीतर कुछ बचा रहता है। अपना घर। अपना आदमी। अपना दुख। अपनी खुशी। रहीम के यहाँ इसी भाव का एक अद्भुत रूप मिलता है,

‘कहा करौं बैकुंठ लै, कल्पवृक्ष को छाँह।

रहिमन बबुर सराहिये, जहँ प्रीतम गल-बाँह।।’

बैकुंठ और कल्पवृक्ष भी किस काम के, यदि वहाँ प्रिय की बाँह न हो। बबूल की छाँह ही भली, जहाँ प्रिय गले में बाँह डाले हो। भोजपुरी लोकगीत की वह स्त्री और रहीम का कवि-मन समय के दो छोर पर खड़े हैं। मगर दोनों की इच्छा एक है। सुख का अर्थ अपनेपन के बिना पूरा नहीं होता।

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यहीं से भोजपुरी लोक की दुनिया खुलती है। भोजपुरी को केवल एक भाषा कहना उसके पूरे संसार को छोटा कर देना है। यह एक जीवन-पद्धति की भाषा है। खेत की भाषा। घर की भाषा। बाजार की भाषा। परदेस की भाषा। उत्सव की भाषा। रुलाई की भाषा। प्रेम की भाषा। भोजपुरी साहित्य ने इसी जीवन से अपनी संवेदना पाई है। उसका लोक से रिश्ता केवल विषय का रिश्ता नहीं है। उसकी भाषा, उसकी लय, उसके पात्र और उसकी कथाएँ लोक के बीच से आती हैं। लिखित साहित्य ने लोक की उन आवाजों को जगह दी, जिन्हें लंबे समय तक केवल कंठ ने सँभालकर रखा था। इसीलिए भोजपुरी साहित्य को पढ़ते हुए उसके पीछे खड़े लोक को सुनना जरूरी है। यह भाषा जीवन को दूर से नहीं देखती। वह जीवन के बीच बैठती है।

धान की रोपनी में उसके गीत हैं। कटनी में उसके गीत हैं। विवाह में उसके गीत हैं। जन्म पर सोहर है। सावन में कजरी है। चैता में ऋतु का उल्लास है। बिरहा में बिछोह है। फगुआ में रंग है। देवी-देवताओं के गीत हैं। परदेस गए पति और बेटे की बाट जोहती आवाजें हैं। भोजपुरी लोक का संसार इसलिए एकरसा या एक संसार नहीं है। वह बहुरंगी है। कहीं हँसी है। कहीं रुलाई। कहीं ठिठोली। कहीं मनुहार। कहीं शिकायत। कहीं देह की थकान। कहीं जीवन के प्रति भरोसा।

सच पूछिए, तो लोकगीतों में जीवन का कोई हिस्सा बाहर नहीं रहता। इसीलिए भोजपुरी लोक को समझना हो, तो उसके गीतों को केवल मनोरंजन मानकर नहीं पढ़ा जा सकता। वे जीवन के दस्तावेज हैं। कागज पर लिखे हुए नहीं, लोक-कंठ में रचे-बसे हुए।

भोजपुरी लोक की मौखिक परंपरा का सबसे सुंदर पक्ष यही है। उसका साहित्य लंबे समय तक किताबों से अधिक स्मृति में रहा। दादी ने पोती को सुनाया। माँ ने बेटी को। खेत में काम करती स्त्रियों ने एक-दूसरे से सीखा। बारात में गाने वाले ने आगे बढ़ाया। किसी ने एक पंक्ति जोड़ी। किसी ने एक शब्द बदल दिया। गीत चलता रहा। पीढ़ियों के बीच। इस चलते रहने में ही उसकी असल शक्ति है।

लिखित साहित्य में रचना किसी निश्चित रूप में हमारे सामने आती है। लोकगीत का रूप स्थिर नहीं रहता। वह जगह के साथ बदलता है। समय के साथ बदलता है। गाने वाले के साथ बदलता है। मगर भाव बचा रहता है। शब्द बदल सकते हैं। मन नहीं। यही मौखिक परंपरा का चमत्कार है। लोकगीतों का कोई एक लेखक नहीं होता। किसी ने उन्हें पहली बार कहा होगा। मगर लोक ने उन्हें अपना लिया। फिर वह पंक्ति किसी एक व्यक्ति की नहीं रही। वह सबकी हो गई।

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वस्तुतः भोजपुरी लोक में स्त्रियों की आवाज इस परंपरा को और समृद्ध करती है। घर की चारदीवारी के भीतर उनका एक अलग संसार है। गीत उस संसार की खिड़की खोलते हैं। विवाह गीतों में बेटी का मायका बोलता है। विदाई में माँ का मन बोलता है। ससुराल के गीतों में बहू की शिकायत सुनाई देती है। कजरी में सावन के साथ विरह उतरता है। सोहर में नवजीवन की खुशी आती है। कई बार वह बात, जिसे सीधे कहना संभव नहीं, गीत में कह दी जाती है। इसलिए लोकगीत स्त्री के लिए केवल गीत नहीं रहे। वे उसके मन की जगह रहे।

भोजपुरी लोक में परदेस भी एक बड़ा संसार है। भोजपुरी समाज का आदमी रोजी की तलाश में दूर-दूर तक गया। कलकत्ता गया। बनारस गया। मुंबई गया। असम गया। देश के बाहर गया। जहाँ गया, वहाँ अपने साथ घर की यादें ले गया, अपनी सांस्कृतिक गठरी में, सतुआ-पिसान-अचार के साथ। इसलिए भोजपुरी लोकगीतों में परदेस बार-बार आता है।

एक आदमी घर से बाहर है। एक औरत घर में है। दोनों के बीच दूरी है। उस दूरी के बीच गीत है। परदेस भोजपुरी लोक के लिए केवल भौगोलिक दूरी नहीं। वह मन की कसक है। वह प्रतीक्षा है। वह उस घर की याद है, जहाँ लौटने की इच्छा बनी रहती है। यही कारण है कि भोजपुरी लोक का भूगोल उसकी बोली से कहीं बड़ा है। वह जहाँ-जहाँ भोजपुरी बोलने वाला गया, वहाँ-वहाँ उसकी स्मृति भी गई।

भोजपुरी साहित्य ने इसी लोक से अपना बहुत कुछ पाया। लोक ने उसे शब्द दिए। पात्र दिए। कथाएँ दीं। लय दी। जीवन दिया। भिखारी ठाकुर की रचनाओं में यह रिश्ता बहुत साफ दिखाई देता है। उनका रंगमंच लोक से निकलता है। उसमें गीत है। नाच है। अभिनय है। मगर उसके केंद्र में आम आदमी है। उसका घर है। उसकी गरीबी है। उसका परदेस है। उसका परिवार है। उसकी सामाजिक पीड़ा है। यही वजह है कि उनकी रचनाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं। वे समाज को सामने रखती हैं।

भोजपुरी साहित्य का लोक से रिश्ता इसी अर्थ में गहरा है। लोक वहाँ सजावट नहीं है। वह रचना की माटी-पानी है। और उपजाऊ माटी के बिना कोई वृक्ष बहुत दिनों तक हरा नहीं रह सकता।

पर भोजपुरी लोक को केवल भोजपुरी समाज की सीमा में रखकर देखना भी उचित नहीं होगा। क्योंकि लोक का अनुभव स्थानीय होते हुए भी मनुष्य का अनुभव होता है। माँ का दुख भोजपुरी में हो या मराठी में, उसकी चिंता वही रहती है। प्रेम की प्रतीक्षा भोजपुरी में हो या पंजाबी में, समय उसी तरह लंबा होता है। रोजगार के लिए घर से निकला आदमी बिहार का हो या अफ्रीका का, पीछे छूटे घर की याद में कोई मूलभूत अंतर नहीं होता।

भाषा दुख को अपना रंग देती है। दुख का अस्तित्व भाषा से पहले है। इसी तरह सपना भी भाषा से पहले आता है। दुनिया के किसी कोने में रहने वाला मनुष्य सुख चाहता है। अपने बच्चों के लिए बेहतर जीवन चाहता है। अपने श्रम का सम्मान चाहता है। अपनों की कुशलता चाहता है। प्रेम चाहता है। अपने घर लौटना चाहता है।

इसलिए भोजपुरी का लोकगीत जब अपनेपन की बात करता है, तो वह केवल भोजपुरी समाज की बात नहीं करता। वह मनई की बात करता है। यही लोक की बड़ी खूबी है। वह अपने गाँव से चलता है और दुनिया के दूसरे मनुष्य तक पहुँच जाता है। उसकी मिट्टी अपनी होती है। उसकी बोली अपनी होती है। उसके रीति-रिवाज अपने होते हैं। मगर उसकी संवेदना सबकी होती है। लोक हमें यह भी सिखाता है कि आधुनिक होने का अर्थ स्मृति से मुक्त होना नहीं है।

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आज बहुत कुछ बदल गया है। गाँव बदल रहे हैं। काम बदल रहे हैं। रिश्तों के ढंग बदल रहे हैं। मनोरंजन के साधन बदल गए हैं। अब गीत सुनने के लिए किसी दादी के पास बैठना जरूरी नहीं। एक मोबाइल स्क्रीन पर हजारों गीत मिल जाते हैं। फिर भी उस पारंपरिक गीत की जरूरत खत्म नहीं हुई। क्योंकि साधन बदलने से मनुष्य की जरूरत नहीं बदलती। उसे आज भी कोई अपना चाहिए। आज भी उसे लौटने के लिए एक घर चाहिए। आज भी वह चाहता है कि उसके सुख में कोई प्रसन्न हो और उसके दुख में कोई उसके पास बैठे।

लोक इसी मनुष्य को बचाए रखता है। लोक की सबसे बड़ी चिंता शायद यही है कि मनुष्य अपने मनुष्य से दूर न हो जाए। इसलिए लोकगीतों को बचाना केवल पुराने शब्द बचाना नहीं है। उनके पीछे के जीवन को समझना भी है।

जब कोई बूढ़ी स्त्री सावन में कजरी गाती है, तो केवल एक धुन नहीं बचती। एक समय बचता है। एक स्मृति बचती है। रिश्तों की एक भाषा बचती है। जब विवाह में पुराना गीत गाया जाता है, तो केवल रस्म पूरी नहीं होती। कई पीढ़ियाँ एक साथ आ बैठती हैं। जब परदेस में कोई भोजपुरी गीत सुनकर घर को याद करता है, तो हजारों किलोमीटर की दूरी कुछ देर के लिए छोटी हो जाती है।

लोक इसी तरह दूरी घटाता है। वह मनुष्य को उसके भीतर लौटाता है। और शायद इसी कारण वह कभी पुराना नहीं होता। उसका रूप बदलता है। शब्द बदलते हैं। धुनें बदलती हैं। मगर उसकी मूल आकांक्षा वही रहती है। अपना कोई हो। अपना घर हो। अपना आँगन हो। और उस घर में लौटने पर कोई बाँहें खोलकर खड़ा मिले।

भोजपुरी लोकगीत की स्त्री इसी सुख को जानती है। उसे दूसरे का सुंदर वर नहीं चाहिए। पानी की लहर कितनी ही चमकदार क्यों न हो, वह उसकी नहीं। उसे अपना ‘कुबड़ा’ ही प्यारा है। रहीम भी बैकुंठ छोड़कर बबूल की छाँह चुन लेते हैं। क्योंकि वहाँ प्रीतम गल-बाँह हैं।

शायद मनुष्य की सारी यात्राएँ अंततः इसी जगह आकर रुकती हैं। बहुत दूर जाकर भी वह अपने पास लौटना चाहता है। बहुत कुछ पाकर भी वह किसी अपने को पाना चाहता है। और बहुत कुछ कहकर भी अंत में शायद इतना ही कहना चाहता है-तू अपना है। मैं तेरा हूँ। बस यहीं से लोकगीत जन्म लेता है। और यहीं से वह साहित्य बन जाता है।

डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी

मूलतः देवरिया जिले के हरपुर गाँव के निवासी हैं। पेशेवर पत्रकारिता से मीडिया शोध और अकादमिक क्षेत्र में आए। उन्होंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से जनसंचार में एम.फिल. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। ‘द संडे इंडियन’ (भोजपुरी) से पत्रकारिता की शुरुआत की और ‘दैनिक भास्कर’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘अमर उजाला’ सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया। भोजपुरी भाषा-साहित्य, लोक संस्कृति, भोजपुरी डायस्पोरा, भारतीय ज्ञान परंपरा और आध्यात्मिक संचार में विशेष रुचि रखते हैं। उनकी प्रमुख संपादित पुस्तकों में ‘भोजपुरी की सांविधानिक मान्यता’, ‘गीत गगन’, ‘मितवा’ और ‘कसौटी पर जौहर’ शामिल हैं।

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