आज कमलेश हरिपुरी का जन्मदिन है। Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय संगीत की दुनिया के ऐसे साधक से, जिन्होंने बलिया गांव के छोटे-छोटे मंचों से अपनी संगीत यात्रा शुरू करके देश-विदेश तक अपनी आवाज पहुंचाई। कमलेश उपाध्याय हरिपुरी ने भजन, लोकगीत, आध्यात्मिक संगीत और भोजपुरी ग़ज़ल के क्षेत्र में लंबे समय तक साधना की है। टी-सीरीज और दूसरी प्रतिष्ठित संगीत कंपनियों के साथ काम करने से लेकर देश-विदेश में भजन कार्यक्रम प्रस्तुत करने तक उनकी यात्रा संघर्ष, सीख और निरंतर साधना की कहानी है।
कमलेश हरिपुरी के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, बल्कि साधना है। भजन को वे अपनी आत्मा मानते हैं, वहीं भोजपुरी लोकगीत और ग़ज़ल को अपनी मिट्टी और समाज से जुड़ने का माध्यम। उनकी सबसे खास बात यह है कि भक्ति संगीत में पहचान बनाने के बावजूद उन्होंने भोजपुरी को कभी अपने से दूर नहीं होने दिया।
गांव के माहौल से शुरू हुआ सुरों का सफर
कमलेश हरिपुरी का संगीत से रिश्ता बचपन में ही जुड़ गया था। परिवार और गांव के सांस्कृतिक माहौल ने उनके भीतर संगीत के प्रति रुचि पैदा की। बचपन में ही वे गीत गुनगुनाने और गाने लगे थे।
स्कूल के दिनों में ही उनकी आवाज लोगों का ध्यान खींचने लगी। गांव में होने वाले छोटे-बड़े कार्यक्रमों में गाने से उनकी सार्वजनिक संगीत यात्रा शुरू हुई। उस समय न आज जैसा सोशल मीडिया था और न कलाकारों के लिए प्रचार-प्रसार के इतने साधन। ऐसे समय में अपनी पहचान बनाना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।
लेकिन कमलेश हरिपुरी ने परिस्थितियों को अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया। गांव से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे विधिवत संगीत शिक्षा और बड़े मंचों की ओर बढ़ता गया।

प्रतिभा को साधना में बदला, गुरुओं से सीखी संगीत की बारीकी
कमलेश हरिपुरी ने केवल अपनी स्वाभाविक प्रतिभा पर भरोसा नहीं किया, बल्कि संगीत की विधिवत शिक्षा भी हासिल की। उन्होंने अपने जिले में जाकर पंडित नरेंद्र शर्मा से संगीत की शिक्षा ली और इसके बाद प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से भी संगीत का अध्ययन किया।
उनके संगीत जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब उन्हें भजन की बारीकियां सीखने का अवसर पद्मश्री पुरुषोत्तम दास जलोटा के संरक्षण में मिला। अनूप जलोटा के पिता पुरुषोत्तम दास जलोटा से मिले मार्गदर्शन और आशीर्वाद ने उनके भजन गायन को नई दिशा दी। यहीं से उनकी संगीत साधना को व्यापक मंच मिलने लगा।
गांव से मुंबई तक का संघर्ष
संगीत में आगे बढ़ने के लिए कमलेश हरिपुरी ने अपने परिचित ग्रामीण परिवेश को छोड़कर मुंबई का रुख किया। मुंबई उस दौर में संगीत और फिल्म उद्योग का बड़ा केंद्र था और वहां पहुंचना किसी भी नए कलाकार के लिए आसान नहीं था।
मुंबई में उन्होंने संघर्ष किया, लोगों से मिले, संगीत सीखा और अपनी प्रतिभा को लगातार निखारते रहे। धीरे-धीरे उन्हें बड़े कलाकारों और संगीतकारों के साथ काम करने के अवसर मिलने लगे। उनकी यात्रा इस बात की मिसाल है कि प्रतिभा शुरुआत भर है, उसे मुकाम तक पहुंचाने के लिए वर्षों की साधना और धैर्य चाहिए।
टी-सीरीज से जुड़ी बड़ी उपलब्धि
कमलेश हरिपुरी की संगीत यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में टी-सीरीज के लिए गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ का अखंड गायन शामिल है। उन्होंने रामचरितमानस को अखंड रूप में स्वर देने का महत्वपूर्ण काम किया। उनके लिए यह केवल रिकॉर्डिंग नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और संगीत साधना का विषय था। इसके अलावा उन्होंने अलग-अलग संगीत कंपनियों के लिए भी भक्ति संगीत रिकॉर्ड किया।
कमलेश हरिपुरी का संगीत संसार केवल पारंपरिक भजनों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य को भी अपनी आवाज दी। उनके प्रमुख संगीत कार्यों में रामचरितमानस का अखंड गायन, हनुमान चालीसा, श्रीमद्भागवत गीता-संस्कृत एवं अर्थ सहित, कबीर के दोहे, कबीर की उलटबांसियां, विभिन्न भजन एल्बम, भोजपुरी लोकगीत, भोजपुरी ग़ज़ल, जैसे कार्य उल्लेखनीय हैं। उन्होंने वीनस और अल्ट्रा म्यूजिक जैसी संगीत कंपनियों के लिए भी काम किया है।
कबीर की वाणी को आवाज देने का प्रयास
कमलेश हरिपुरी की संगीत यात्रा में कबीर का विशेष स्थान दिखाई देता है। उन्होंने कबीर के दोहों और उलटबांसियों को अपनी आवाज में प्रस्तुत किया। कबीर की रचनाओं में मौजूद सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक प्रश्न और जीवन-दर्शन को संगीत के माध्यम से श्रोताओं तक पहुंचाना उनके रचनात्मक काम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। यह उनके संगीत की उस दिशा को सामने लाता है जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ विचार और आत्मचिंतन भी मौजूद है।
देश-विदेश तक पहुंची भक्ति संगीत की आवाज
भक्ति संगीत में पहचान बनने के बाद कमलेश हरिपुरी को भारत के विभिन्न शहरों के साथ-साथ विदेशों में भी कार्यक्रम प्रस्तुत करने के अवसर मिले। मुंबई से लेकर दिल्ली और दूसरे शहरों तक वे भजन कार्यक्रम करते रहे हैं। विदेशों में भी उनके भक्ति संगीत के कार्यक्रम हुए हैं। उनकी आवाज की खासियत यह है कि उसमें शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के साथ लोकभावना और भक्ति का सहज मेल दिखाई देता है।
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संगीत और आध्यात्मिक क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कमलेश हरिपुरी को विभिन्न संस्थाओं और सरकारों की ओर से सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनके उल्लेखनीय सम्मानों में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक द्वारा सम्मान, महाराष्ट्र सरकार द्वारा सम्मान तथा रामलीला उत्सव समिति, वडाला द्वारा वर्ष 2017 में गोस्वामी तुलसीदास सम्मान शामिल हैं। इसके अलावा विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि भी प्रदान की गई। इन सम्मानों को वे अपनी यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं बल्कि आगे और बेहतर काम करने की प्रेरणा मानते हैं।

भजन मेरी आत्मा है, लेकिन भोजपुरी मेरी मिट्टी
कमलेश हरिपुरी की संगीत यात्रा का सबसे खूबसूरत पक्ष यह है कि भक्ति संगीत में ऊंची पहचान बनाने के बावजूद उन्होंने भोजपुरी को नहीं छोड़ा। उनका स्पष्ट मानना है कि भजन उनकी आत्मा है, लेकिन भोजपुरी लोकगीत और भोजपुरी ग़ज़ल उनकी जड़ों से जुड़े हैं। इसीलिए वे आज भोजपुरी ग़ज़ल पर भी विशेष काम कर रहे हैं। उनकी कोशिश है कि भोजपुरी में ऐसा संगीत तैयार हो जिसे परिवार के लोग साथ बैठकर सुन सकें और जिसमें प्रेम, संवेदना, जीवन और समाज की बात हो।
भोजपुरी ग़ज़ल को लेकर नई सोच
कमलेश हरिपुरी भोजपुरी ग़ज़ल को केवल प्रेम और मनोरंजन तक सीमित नहीं देखना चाहते। वे इसमें जीवन के अनुभव, रिश्तों की संवेदना और सामाजिक सरोकारों को भी जगह देना चाहते हैं। उनकी यह सोच उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है जब भोजपुरी संगीत को लेकर अक्सर गुणवत्ता और प्रस्तुति पर सवाल उठते रहते हैं। वे मानते हैं कि आज की लोकप्रियता और इतिहास में बची रहने वाली लोकप्रियता एक जैसी नहीं होती। भीड़ किसी गीत को कुछ समय के लिए पसंद कर सकती है, लेकिन समय वही रचना बचाता है जिसमें कुछ स्थायी मूल्य हो।
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भोजपुरी में अश्लीलता नहीं, संस्कार और साहित्य की जरूरत
कमलेश हरिपुरी भोजपुरी संगीत में स्वस्थ और पारिवारिक गीतों के पक्षधर हैं। उनका मानना है कि भोजपुरी संगीत को अपनी समृद्ध लोक परंपरा, साहित्य और संस्कृति से जुड़ना चाहिए। उनके विचार में भिखारी ठाकुर जैसे कलाकारों की लोकप्रियता का कारण केवल मनोरंजन नहीं था। उनकी रचनाएं अपने समय के समाज और परिवेश से गहराई से जुड़ी थीं। यही कारण है कि आज भी लोग भिखारी ठाकुर को सुनते और याद करते हैं। कमलेश हरिपुरी का सवाल भी यही है कि आज जो चीज भीड़ को पसंद आ रही है, क्या वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहेगी?
आज के कलाकारों के लिए सोशल मीडिया सबसे बड़ा मंच
कमलेश हरिपुरी का युवाओं के लिए संदेश बेहद महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार पहले कलाकारों को बड़े म्यूजिक लेबल और कंपनियों के दरवाजे खटखटाने पड़ते थे। किसी बड़ी कंपनी में मौका मिलना ही बड़ी उपलब्धि माना जाता था। लेकिन आज परिस्थिति बदल चुकी है। आज कलाकार के हाथ में अपना मंच है। वे युवाओं से कहते हैं कि अपनी तैयारी करें, अपनी कला को रिकॉर्ड करें और सोशल मीडिया के माध्यम से सीधे लोगों तक पहुंचाएं। फिर जनता खुद तय करेगी कि उसे क्या पसंद है। यह सोच उन युवाओं के लिए खास तौर पर प्रेरणादायक है जो संसाधनों की कमी के कारण अपनी प्रतिभा को सामने नहीं ला पाते।

संघर्ष से मिली सबसे बड़ी सीख
कमलेश हरिपुरी की जिंदगी की सबसे बड़ी सीख यही है कि सफलता अचानक नहीं आती। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, असफलताओं से सीखना और अपने लक्ष्य के प्रति लगातार ईमानदार रहना पड़ता है। गांव के छोटे मंच से शुरुआत करके संगीत की विधिवत शिक्षा हासिल करना, मुंबई पहुंचना, बड़े गुरुओं का सानिध्य पाना, प्रतिष्ठित कंपनियों के लिए रिकॉर्डिंग करना और फिर देश-विदेश के मंचों तक पहुंचना उनकी लंबी साधना का परिणाम है। उनकी कहानी बताती है कि अगर कलाकार अपने हुनर पर भरोसा रखे और सीखना कभी बंद न करे तो रास्ते धीरे-धीरे खुद खुलते जाते हैं।
लोकप्रियता से ज्यादा जरूरी है विरासत
कमलेश हरिपुरी के विचारों में एक कलाकार की दूरदृष्टि दिखाई देती है। वे केवल आज की लोकप्रियता की चिंता नहीं करते, बल्कि यह भी सोचते हैं कि उनकी कला आने वाले समय में किस रूप में याद की जाएगी। इसीलिए भक्ति संगीत के साथ वे भोजपुरी लोकगीत और ग़ज़ल की ओर भी लौट रहे हैं। उनकी कोशिश है कि भोजपुरी संगीत में ऐसी रचनाएं सामने आएं जिनमें माटी की खुशबू, समाज की सच्चाई, प्रेम की संवेदना और भाषा का संस्कार मौजूद हो।
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क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
कमलेश हरिपुरी को ‘भोजपुरी धुरंधर’ इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने भोजपुरी और भारतीय भक्ति संगीत—दोनों धाराओं को अपनी साधना से जोड़ा है। एक ओर उन्होंने रामचरितमानस, हनुमान चालीसा, गीता और कबीर की वाणी को स्वर देकर आध्यात्मिक संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाया, वहीं दूसरी ओर भोजपुरी लोकगीत और ग़ज़ल को भी अपने संगीत जीवन का हिस्सा बनाए रखा। गांव से निकलकर मुंबई तक का संघर्ष, गुरुओं से मिली शिक्षा, देश-विदेश में कार्यक्रम, प्रतिष्ठित संगीत कंपनियों के लिए रिकॉर्डिंग और आज के दौर में भोजपुरी ग़ज़ल को नई दिशा देने का प्रयास-कमलेश हरिपुरी की यात्रा को खास बनाता है। उनकी कहानी केवल एक गायक की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस कलाकार की कहानी है जिसने समय के साथ अपने संगीत को बदला, लेकिन अपनी मिट्टी और अपनी भाषा को नहीं छोड़ा। भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में कमलेश हरिपुरी उस संगीत साधक के रूप में दर्ज हैं, जिनके लिए भजन आत्मा है, लोकगीत जड़ों की आवाज है और भोजपुरी ग़ज़ल भविष्य की एक नई संभावना।

