भोजपुरी24 विशेष | लोकसंगीत एवं लोकसंस्कृति
भोजपुरी लोकसंगीत की दुनिया में ‘दुगोला’ सिर्फ दो गायकों के बीच गाने की प्रतियोगिता नहीं है। यह ऐसी लोकपरंपरा है, जिसमें गायकी, तर्क, स्मरणशक्ति, काव्य-कौशल और तत्काल जवाब देने की क्षमता एक साथ परखी जाती है। एक कलाकार गीत के माध्यम से बात या चुनौती रखता है और दूसरा उसी मंच पर अपने गीत से उसका उत्तर देता है। यही सवाल-जवाब दुगोला को सामान्य लोकगायन से अलग पहचान देता है। आज भी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के कई इलाकों में इसके आयोजन होते हैं।
दुगोला की जड़ें: लोकमंच से निकली सवाल-जवाब की परंपरा
दुगोला की ठीक शुरुआत किस वर्ष, किस गांव या किस कलाकार से हुई, इसका प्रमाणित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसके जन्मस्थान या आरंभ की कोई एक निश्चित तारीख बताना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
हालांकि उपलब्ध सामग्री से इतना स्पष्ट है कि भोजपुरी समाज में दुगोला की परंपरा काफी पुरानी है और यह लोकगायन की मौखिक परंपरा से विकसित हुई। इसमें दो पक्षों के गायक आमने-सामने बैठते और गीतों के जरिए एक-दूसरे को जवाब देते थे। पुराने दुगोला में तत्काल गीत रचने और सामने वाले के कथन का जवाब देने की कला को विशेष महत्व मिलता था। ‘दुगोला’ नाम को भी इसी दो-पक्षीय मुकाबले के स्वरूप से जोड़कर समझा जाता है, हालांकि इसके नाम की प्रमाणित व्युत्पत्ति पर अलग से भाषावैज्ञानिक शोध की जरूरत है।
‘व्यास’ कौन होते हैं और उनका क्या महत्व है?
दुगोला के मुख्य कलाकारों को आमतौर पर ‘व्यास’ कहा जाता है। व्यास की भूमिका केवल गायक की नहीं होती। वह अपने पक्ष का प्रतिनिधि, कथाकार, तर्क प्रस्तुत करने वाला और तत्काल गीत गढ़ने वाला कलाकार होता है।
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मंच पर उसकी परीक्षा कई स्तर पर होती है। उसे सुर और ताल के साथ-साथ भोजपुरी के मुहावरों, लोककथाओं, धार्मिक आख्यानों और सामाजिक प्रसंगों का ज्ञान होना चाहिए। सामने वाले व्यास ने जिस विषय को उठाया, उसका अर्थ समझकर उसी लय और शैली में जवाब देना उसकी सबसे बड़ी कला मानी जाती है। यही वजह है कि पुराने दुगोला को कई लोग ‘संगीत का दंगल’ भी मानते रहे हैं।इस परंपरा से जुड़े कलाकारों में गायत्री ठाकुर और वीरेंद्र सिंह धुरान जैसे नामों का उल्लेख मिलता है।
जंग बहादुर सिंह, दुगोला के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी
दुगोला की पुरानी परंपरा को समझने के लिए भोजपुरी लोकगायक जंग बहादुर सिंह की कहानी बेहद महत्वपूर्ण है। 10 दिसंबर 1920 को बिहार के सिवान जिले में जन्मे जंग बहादुर सिंह पहले पहलवान थे। बाद में आसनसोल और झरिया क्षेत्र में रहते हुए उन्होंने भोजपुरी गायन में अपनी पहचान बनाई। उपलब्ध संस्मरणों के अनुसार, एक दुगोला कार्यक्रम में उन्होंने देखा कि तीन गायक मिलकर एक गायक के खिलाफ मुकाबला कर रहे थे। दर्शक के रूप में मौजूद जंग बहादुर ने इसका विरोध किया। इसी घटना ने उन्हें गायकी की ओर आकर्षित किया और आगे चलकर वे स्वयं दुगोला के चर्चित कलाकार बने।
उनकी गायकी का दायरा केवल मुकाबले तक सीमित नहीं था। वे रामायण-महाभारत के पात्रों, वीर योद्धाओं और देशभक्ति के विषयों पर भी गाते थे। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, उन्होंने बंगाल, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी गायकी से पहचान बनाई।
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मुन्ना सिंह व्यास के अनुसार, जंग बहादुर सिंह एक समय तीन-तीन गायकों के साथ दुगोला मुकाबला करने के लिए प्रसिद्ध थे और लगभग 15–20 वर्षों तक बिहार, बंगाल और झारखंड के इलाके में उनका विशेष प्रभाव रहा।
दुगोला में सिर्फ गीत नहीं, दिमाग भी लड़ता था
दुगोला की असली खूबी तत्काल जवाब में थी। एक व्यास कोई पंक्ति, कथा, सवाल या तर्क गीत में रखता था। दूसरे व्यास को उसी समय उसका जवाब देना पड़ता था। इस जवाब में तुक, लय और विषय-तीनों का संतुलन बनाए रखना होता था।
यही कारण है कि पुराने कलाकारों के पास लोककथाओं, धार्मिक आख्यानों, कहावतों और कवित्त का विशाल भंडार होता था। उन्हें बहुत कुछ कंठस्थ रहता था और जरूरत पड़ने पर वे उसी सामग्री को नए संदर्भ में इस्तेमाल कर देते थे।
दुगोला में पूर्वी, बिरहा, चैता और अन्य लोकगायन शैलियों के प्रभाव दिखाई देते हैं। आज भी चैता दुगोला में दो व्यास लोकगीतों के माध्यम से प्रश्न-उत्तर और तर्क-वितर्क करते हैं और कार्यक्रम कई बार पूरी रात चलता है।
यानी यह सिर्फ सुरों की लड़ाई नहीं थीयह लोकभाषा में बुद्धि और रचनात्मकता की प्रतियोगिता भी थी।
समय के साथ बदला दुगोला, लेकिन परंपरा अभी जीवित है
समय के साथ दुगोला का स्वरूप भी बदला है। पहले इसका केंद्र गांवों के सांस्कृतिक आयोजन और स्थानीय मंच होते थे। आज धार्मिक पर्वों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी दुगोला आयोजित होता है। 2025 में जहानाबाद में महाशिवरात्रि के अवसर पर दुगोला कार्यक्रम हुआ, वहीं झारखंड में चैता दुगोला मुकाबलों में बिहार और झारखंड के व्यास आमने-सामने आते रहे हैं।
लेकिन इस बदलाव के साथ इसकी आलोचना भी हुई है। कुछ लेखकों और कलाकारों ने चिंता जताई है कि आधुनिक दुगोला के कुछ आयोजनों में अश्लीलता और जातिगत तंज ने पुराने स्वस्थ सवाल-जवाब और लोकबुद्धि वाले स्वरूप को कमजोर किया है। यही आज दुगोला के सामने सबसे बड़ी चुनौती है-लोकपरंपरा को आधुनिक मंच देना, लेकिन उसकी गरिमा और रचनात्मकता को बचाए रखना।
दुगोला को केवल ‘गायकों की लड़ाई’ कह देना इसके इतिहास और महत्व को छोटा करना होगा। यह भोजपुरी लोकसमाज की उस मौखिक परंपरा का हिस्सा है, जहां कविता, संगीत, तर्क, हास्य, कथा और तत्काल रचना एक ही मंच पर मिलते हैं।
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इसकी शुरुआती तारीख या किसी एक व्यक्ति को इसका जन्मदाता बताने के लिए अभी पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन जंग बहादुर सिंह जैसे कलाकारों की जीवन-कथाएं और आज भी होते दुगोला आयोजन यह जरूर दिखाते हैं कि यह परंपरा कई दशकों से भोजपुरी लोकजीवन में गहरी मौजूद रही है। दुगोला की असली पहचान है-सवाल गीत में उठता है, जवाब भी गीत में मिलता है और जीत सिर्फ आवाज की नहीं, बल्कि तत्काल सोच और लोकभाषा पर पकड़ की होती है।
अरविंद सिंह ‘अभियंता’ ने दुगोला को दी नई पहचान
भोजपुरी दुगोला की समकालीन परंपरा में अरविंद सिंह ‘अभियंता’ चर्चित व्यासों में शामिल हैं। गोपालगंज से जुड़े अरविंद सिंह की पहचान खास तौर पर चैता और दुगोला गायन से बनी है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में उनके दुगोला मुकाबले आयोजित होते रहे हैं। कमलबास कुंवर, बूढ़ा व्यास जैसे कलाकारों के साथ उनके मुकाबले काफी चर्चित रहे। उनकी गायकी में सवाल-जवाब, तुकबंदी और तत्काल प्रतिक्रिया की खास शैली देखने को मिलती है। अरविंद सिंह ‘अभियंता’ आज भोजपुरी की पारंपरिक दुगोला और चैता गायन परंपरा को आगे बढ़ाने वाले समकालीन कलाकारों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।


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