डॉ. संतोष पटेल
निदा फ़ाज़ली के शेर बा-
“हर आदमी में होते हैं, दस-बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।”
एकरा के जब कबो पढ़िला त हमरा सोझा नेपाल में भोजपुरी भाषा, साहित्य आ संस्कृति के गंभीर अध्येता डॉ. गोपाल ठाकुर आ जाईं।
हम डॉ. गोपाल ठाकुर जी के भाषाविद् के रूप में देखिला त बूझाला कि विश्व में भोजपुरी भाषा के सामाजिक, सांस्कृतिक भा भाषाई अध्ययन में जेतना विद्वान लोग लागल बानी—मसलन, भारत में डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह होखीं, मॉरीशस में भाषा में दखल राखे वाली भोजपुरी स्पीकिङ यूनियन, मॉरीशस के प्रमुख डॉ. सरिता बुद्ध होखीं भा नेपाल से गोपाल अश्क आ दिनेश गुप्ता जी होखीं—एह सभ लोग में डॉ. गोपाल ठाकुर के योगदान कहीं जादे लमहर बा। चाहे ऊ शब्दकोश के बात होखे, चाहे भोजपुरी व्याकरण के बात होखे, भा भोजपुरी मजमून के बात होखे, भा मौलिक साहित्य में कविता आ गीत के बात होखे, चाहे भोजपुरी गद्य साहित्य के बात होखे—डॉ. गोपाल ठाकुर वन-मैन आर्मी लेखा काम करिले।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. गोपाल ठाकुर जी के योगदान के फेहरिस्त देख सकिला। ‘A Grammar of Bhojpuri’ (अंग्रेजी में), ‘Bhojpuri Analyzed Corpus’ (भोजपुरी-अंग्रेजी में), ‘भोजपुरी व्याकरण’ (जीवंत मजमून के साथे भोजपुरी में) किताब आइल बाड़ी सन।
हमार कहनाम के पाछे तर्क बा। देखीं, भारत में विद्वान लोग भोजपुरी व्याकरण भोजपुरी में लिखले बा, हिंदी में लिखले बा आ कुछ अंग्रेजियो में। बाकिर डॉ. ठाकुर के अंग्रेजी में कइल काम अंतरराष्ट्रीय फलक पर भोजपुरी के ग्लोबल पहचान देवे में सक्षम बन रहल बा। दुनिया देखल चाहत बिया कि आखिर भोजपुरी के व्याकरण का बा, ओकर स्तर का बा।
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भोजपुरी आलोचक डॉ. ब्रजभूषण मिश्र ठाकुर जी के ‘भोजपुरी व्याकरण’ के महत्त्व स्वीकार करत लिखत बानी— “डॉ. ठाकुर, जे अङ्ग्रेजी आ भाषाविज्ञान के विद्वान बानी, के भोजपुरी से जुड़ल कई एक काम अङ्ग्रेजी आ नेपाली भाषा में बा। ई वैज्ञानिक ढंग से सहआर व्याकरण शोधार्थी लोग खातिर काम के लायक बा।” साँचों, जेतना श्रमसाध्य काम ठाकुर जी कइले बानी, ऊ रेधिआवे जोग बा।
वर्धा से भोजपुरी के अद्यतन शब्दकोश प्रकाशित भइल बा। ओकरा पहिलहूँ बहुत भोजपुरी शब्दकोश भारत में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, आ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, भारत आ मॉरीशस से प्रकाशित भइल बा। बाकिर नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित भोजपुरी शब्दकोश विश्वकोश के रूप में हमनी के सामने आवेला, जवन भोजपुरी-भोजपुरी, नेपाली आ अंग्रेजी में बा, जे में डॉ. गोपाल ठाकुर के जाबर ठेठपना के महक बा। औपचारिक रूप में भी उहाँका एह शब्दकोश के संपादक मंडल के संयोजक बानी।
डॉ. गोपाल ठाकुर के व्यक्तित्व के कई गो रंग बा। कवि, गीतकार, संगीतकार, रेडियो-कर्मी आ संजीदा सोझ-बक मनई, जेकरा हिरदय में हरहमेशा वंचित समाज के पक्ष में न्याय, सम्मान आ बराबरी खातिर ज्वाला धधकत रहेला।
जनता के गीत गावत रहे वाला गोपाल ठाकुर के लिखल भोजपुरी कविता-संकलन उहाँ के नेपाल के जनकवि बना देला। त बुझाला कि अइसन आदमी के लोग संसद में सांसद के रूप में भेज के लोकतंत्र के ऊपर उपकार कइले बा। सांसद के रूप में गोपाल ठाकुर के आपन भाषा, साहित्य आ संस्कृति के प्रति अनुराग अजगुत बा। अइसन राजनेता अब कम बाड़न, जे एह तरह से आपन भाषा से प्यार करस। भारत में भोजपुरी से बनल तीन गो सांसद बाड़न, बाकिर ओह लोग में भोजपुरी के प्रति अनुराग दूर-दूर ले नइखे। ऊ लोग भोजपुरी के यूज कइले बा, बाकिर डॉ. ठाकुर भोजपुरी खातिर अपना के यूज कइले बानी। रउआ उत्पीड़ित लोगन के आवाज बननी, मेहनतकश जनता के समस्या के निदान खातिर मजबूती से आपन बात रखनी। उहाँ के दूगो काव्य-संकलन ‘भविष्य निधि’ (१९८४) आ ‘जय किसान’ (१९९०) के विश्लेषण करब त पाइब कि एकरा में दर्ज कविता में कवि हमार बात कहत बानी, तोहार बात कहत बानी, मतलब हम सभनी के बात करत बानी। इहे बात डॉ. गोपाल ठाकुर के जनकवि बना देला।
डॉ. गोपाल ठाकुर के एगो सजग गद्यकार के रूप हमरा सामने आइल बा। हमरा लगे ‘उत्पीड़ित मधेश आ भोजपुरी’ के मसौदा आइल बा। एकरा में सात गो लमहर शोध-आलेख संकलित बा। डॉ. गोपाल ठाकुर के पहचान एक शोधकर्ता के रूप में दर्ज बा। उहाँ के स्वभाव हमरा उनका के मुरीद बना देला।
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आपन बात तथ्य आ तर्क से प्रस्तुत करिला, देश-काल के महीनता आ बारीकी से देखिला आ आपन आलेख में जगह देनी। उहाँ के निगाह मधेश के जनता के समस्या, समाज के विद्रूपता, सामंती शक्ति के कारगुजारी पर गड़ल रहेला आ उहाँ के सबके समाजशास्त्रीय, सांस्कृतिक आ भाषाई पड़ताल करत ओकरा के इम्पिरिकल डेटा से सपोर्ट देनी।
एह भोजपुरी गद्य-पुस्तक में बड़हन-बड़हन शोध-आलेख बाड़ी सन। विविधता से परिपूर्ण एह कुल आलेख में पहिला आलेख में नेपाल स्थित मधेश पर भाषिक-सांस्कृतिक उत्पीड़न के समस्या के भाषिक आ सांस्कृतिक पक्ष के विस्तारपूर्वक चर्चा बा।
भाषा के सामंतवादी प्रवृत्ति कई देश में देखे के मिलेला। उत्तर-औपनिवेशिक काल में कई गो देश, जवन आजाद भइल, उहाँ के भाषा के औपनिवेशिक सरकार दोयम दर्जा के घोषित कर देलस। इहे काम राजसत्ता करेला। जवन भाषा के राज्यसत्ता के संपोषण मिलेला, ऊ आपन मातहत दोसर भाषा के हीन समझेला आ ओकरा के बोलेवाला समाज के छोट। नेपाल में मधेशी लोग के भाषा भोजपुरी से इहे भइल आ हो रहल बा।
नेपाली साहित्य में भोजपुरी भाषी मधेशी लोगन के संगे अमानवीय व्यवहार के बहुत उदाहरण मिल जाई। डॉ. गोपाल ठाकुर नेपाली साहित्यकार ध्रुवचंद्र गौतम के नेपाली उपन्यास ‘अलिखित’ में दर्ज मधेशी लोगन खातिर जइसन बात लिखल बा, ओकरा के परत-दर-परत उधेड़त बानी आ नेपाल के सामंतवादी मानसिकता के उजागर करत बानी। साँच के स्वाद कड़ुआ होखेला, पढ़त-पढ़त मन माहूर हो जाता।
हर समाज में दूगो परंपरा बा। एंथ्रोपोलॉजी के विद्वान रॉबर्ट रेडफील्ड (मेक्सिको) कहेलन कि समाज में दू तरह के परंपरा बा। एगो लिटिल ट्रेडिशन आ एगो ग्रेट ट्रेडिशन। एंटोनियो ग्राम्शी के मुताबिक, जे एलिट बा ऊ अपना के ग्रेट ट्रेडिशन से जोड़ेला आ जे सबाल्टर्न बा, ऊ अपना के लिटिल ट्रेडिशन से। यानी समाज में एगो अभिजात्य वर्ग रहेला त दोसर हाशिए के समाज।
रेमंड विलियम्स समाज में दूगो कल्चर देखेलन—एगो हाई कल्चर, दोसरका लो कल्चर, जबकि रोलां बार्थ मास कल्चर आ पॉपुलर कल्चर के बात बतावेलन। कल्चर भा मास कल्चर के रिप्रेजेंटेसन करेला। दरअसल, भोजपुरी भारत-नेपाल समेत हर देश में जहाँ बा, ऊ लिटिल ट्रेडिशन भा लो कल्चर के प्रतिनिधित्व करेला।
हर समाज के अभिजात्य वर्ग आपन धन, बल, सत्ता, शक्ति आ व्यवहार से हाशिए के समाज के नीचा दिखावे के कोसिस करेला, जबकि इहे लिटिल ट्रेडिशन, लो कल्चर भा मास कल्चर हर तरह से प्रोडक्टिव रहल बा। तबे त कीनिया के साहित्यकार ‘Decolonisation of the Mind’ में आपन भाषा में काम करे के सीख देलें। न्गुगी वा थ्योंगो अंग्रेजी भाषा छोड़के स्वाहिली भाषा में लिखे लगलें।
डॉ. ठाकुर नेपाली उपन्यास ‘अलिखित’ में दर्ज नेपाली मानसिकता के पोल खोल देले बानी। ई आलेख जेतना जरूरी नेपाल में बा, ओतने भारत में, काहे कि दुनू जगह जवन अभिजात्य समाज बा, ऊ भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति आ समाज के हमेशा घृणा के आँख से देखेला। भोजपुरी भाषा के प्रति दुश्मन भावना से ग्रसित होके ओकरा के नीच बतावे के कोसिस करेला।
हमनी सभे के जाने के चाहीं कि भारत के बाद नेपाल में भोजपुरी सभसे मजबूत संख्या-बल के साथ खड़ा बिया। भारत से अलग, उहाँ बोली ना, बलुक भाषा के रूप में मान्यता राखत बिया। इहे कारण बा कि एह किताब में नेपाल के भोजपुरी भाषा के रूपरेखा के विस्तार से एगो अलग लेख बा। ओकरा पढ़ला पर जानल जा सकेला कि भोजपुरी के का हाल बा।
चउथा आलेख ‘भोजपुरी के आदिम धरोहर’ बा, जवन गंभीर अध्ययन से निकसल आलेख बा। एकरा में ठाकुर जी के दावा बा कि “विद्यापति के पदावली रचना, जे अवहट्ठ में बा, मैथिली ना होके भोजपुरी के शैशवकालीन रचना होखे के चाहीं।” ओकरा खातिर ठाकुर जी कुछ प्रमाण आ कुछ तथ्य के उल्लेख करत बानी। बाकिर ई आलेख बिरनी के खोंता के खोदला नियर बा। एकरा से मैथिली समर्थक गोपाल ठाकुर के पीछे हाथ धोके पड़ जाई लोग। बाकिर लिखल के जवाब लिखल से दीं, अच्छा रही, काहे कि मैथिल लोग शास्त्रार्थ में बहुत विश्वास करेलें। फेर अच्छा इहे होई कि फतवा ना देके गोपाल ठाकुर जी के बात प्रमाण आ तथ्य के साथ काटल जाओ।
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‘भोजपुरी लोकगायन : सामर्थ्य आ चुनौती’ नामक आलेख में भोजपुरी लोकगायन, भोजपुरी लोकगाथा, लोकगीत, समयबद्ध लोकगीत, पहरबद्ध लोकगीत, ऋतुबद्ध लोकगीत, व्रतबद्ध लोकगीत के अंतरा में समाइल अलग-अलग सांस्कृतिक पहलू के अन्वेषण फरका-फरकाके कइल बा।
फ्रांस के दार्शनिक देरिदा ‘विखंडनवाद’ में मानत रहे कि विखंडन पढ़े के प्रक्रिया ह। पाठक पाठ से बंधल रहेला। पाठ में सब कुछ रहेला, एही से ओकरा फरका-फरकाके पढ़े के चाहीं आ डॉ. गोपाल ठाकुर आपन पाठ के एतना सरिआके रखले बानी, जइसे सजाव दही।
मूल्यन के बचवले रखे के गुहार बा त ‘भोजपुरी रामायण के मार्फत ओम प्रकाश भोजपुरिया लोकवार्ता में गणतंत्र’ नामक आलेख में, जहाँ आपन बातचीत के लोकतांत्रिक जायसवाल द्वारा प्रकाशित मुकुंद आचार्य के भानुभक्तीय रामायण के अनुवाद में डॉ. गोपाल ठाकुर के भाषाई अन्वेषण देखनउक बा।
बहरहाल, एगो गद्यकार के रूप में डॉ. गोपाल ठाकुर जी के स्वागत बा। देख के खुशी हो रहल बा कि भोजपुरी में एतना बढ़िआँ आलेख भोजपुरी के भंडार के भरे में सार्थक सहयोग कर रहल बा। हम गोपाल ठाकुर जी के नेपाल के भोजपुरी के रीढ़ के हड्डी (Spinal Cord of Bhojpuri Language of Nepal) कहिले। समकालीन भोजपुरी भाषा के अंतरराष्ट्रीय भाषाविद् के एह पुस्तक के प्रकाशन पर आपन शुभकामना देत बानी आ निहोरा करत बानी कि उहाँ के कलम चलत रहो! जय भोजपुरी! जय भारत!! जय नेपाल!!!
डॉ. संतोष पटेल, अध्यक्ष, भोजपुरी जन जागरण अभियान, भारत

