पल्लवी कश्यप की रिपोर्ट
Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय भोजपुरी साहित्य के उस पुरोधा का, जिन्होंने अपनी लेखनी से हास्य और व्यंग्य को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। भोजपुरी के समादृत कवि, कथाकार, नाटककार, ग़ज़लकार और उपन्यासकार सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ उन चुनिंदा साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने लोकभाषा को समाज की विसंगतियों पर प्रहार करने का सशक्त माध्यम बनाया। आज उनका जन्मदिन भी है. आप सभी उनको बधाई भी दे सकते हैं।
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ ने अपने साहित्य के माध्यम से यह सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल लोकगीतों की भाषा नहीं, बल्कि गंभीर चिंतन, सामाजिक चेतना और साहित्यिक अभिव्यक्ति की भी समर्थ भाषा है। उनकी रचनाएँ पाठकों को हँसाती भी हैं और भीतर तक झकझोरती भी हैं।
सीवान की माटी से निकला भोजपुरी साहित्य का व्यंग्यकार
23 जुलाई 1943 को बिहार के वर्तमान सीवान जिले के बगौरा गाँव में जन्मे सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ का बचपन ग्रामीण परिवेश और लोक संस्कृति के बीच बीता। गाँव के जीवन, लोकगीतों, मानवीय रिश्तों और सामाजिक संघर्षों ने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को आकार दिया।
उन्होंने हिन्दी, संस्कृत और भोजपुरी का गंभीर अध्ययन किया तथा साहित्य को जीवन साधना बना लिया। भोजपुरी समाज के सुख-दुख, राजनीतिक विडंबनाओं, सामाजिक विसंगतियों और बदलते सांस्कृतिक मूल्यों को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया।
हास्य-व्यंग्य को बनाया सामाजिक चेतना का माध्यम
भोजपुरी साहित्य में हास्य और व्यंग्य की परंपरा पहले से मौजूद थी, लेकिन सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ ने उसे नई ऊँचाई प्रदान की। उन्होंने व्यंग्य को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज परिवर्तन का सशक्त हथियार बनाया।
उनकी लेखनी भ्रष्टाचार पर प्रहार करती है, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है और सामाजिक पाखंड को बेनकाब करती है। यही कारण है कि उन्हें भोजपुरी साहित्य में ‘व्यंग्य के शिखर पुरुष’ के रूप में सम्मान प्राप्त है।
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उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें कटुता नहीं, बल्कि लोकजीवन की सहजता और सामाजिक सरोकारों की गहरी संवेदना दिखाई देती है।
गद्य और पद्य की हर विधा में सशक्त उपस्थिति
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ उन विरले साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने गद्य और पद्य दोनों की लगभग हर विधा में लेखन किया। कविता, ग़ज़ल, कहानी, नाटक, उपन्यास, व्यंग्य और आलोचना आदि हर क्षेत्र में उनकी लेखनी ने अपनी अलग पहचान बनाई।
उनकी रचनाओं में भोजपुरी भाषा का सहज, सरल और साहित्यिक रूप देखने को मिलता है। उन्होंने साबित किया कि भोजपुरी में गंभीर साहित्य सृजन की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं।
भोजपुरी साहित्य को मिली नई दृष्टि
पराग जी केवल साहित्यकार नहीं थे, बल्कि भोजपुरी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर सक्रिय सांस्कृतिक कर्मी भी थे। उन्होंने साहित्यिक गोष्ठियों, सम्मेलनों और मंचों के माध्यम से भोजपुरी को सम्मानजनक साहित्यिक पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
उन्होंने नई पीढ़ी के साहित्यकारों और शोधार्थियों को प्रेरित किया। भोजपुरी भाषा और साहित्य पर कार्य करने वाले अनेक विद्यार्थियों के लिए वे मार्गदर्शक की भूमिका निभाते रहे।
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प्रमुख कृतियाँ और साहित्यिक योगदान
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ की सबसे चर्चित कृति “श्रीहीरो चरित मानस” भोजपुरी हास्य-व्यंग्य साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। इस खंडकाव्य में उन्होंने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक विसंगतियों और बदलते मूल्यों पर तीखा व्यंग्य किया है।
उनकी अन्य चर्चित कृतियों और गीतों में शामिल हैं-
ना अइलऽ बरिसात में
तरकुल के छाँव में
दिल के भीतर बनजारा दिन
भोजपुरिया बनल रहे विश्वास
चंदन के गंध तार-तार मसक गइल
कहाँ गइल हम हईं भोजपुरिया
समय के अहेरिया
उनकी भोजपुरी ग़ज़लें भी साहित्य प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय रही हैं। उनकी कुछ चर्चित ग़ज़लों के शीर्षक हैं-
काहे उनका अभी
कतहीं चइता कतहीं जर रहल बा गाँव
अतना गुमान काहे
कही का, करी का
प्रीत के पाहुन
प्यार जग के सार
तू याद-झरोखे आ जा
दरदे अबले उपहार
बढ़त चान पर तक
नाव-नदी संयोग
घुट-घुट मरत बा
इन रचनाओं में भोजपुरी समाज का बदलता स्वरूप, लोकजीवन की पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
ग़ज़ल
हमरा के कोई का कही तनिको ना गम रहल,
जेकरा जिया में जे रहल अपने मने कहल।
अनुकूल राह देखि के बढ़लीं बिना हिचक,
कबहीं बइठि के ना बनवलीं हवा महल।
जवने मिलल से पाइ के जियरा जुड़ा गइल,
दोसरा के देख के ना डहुरलीं चहल-पहल।
दुनियाँ प्रपंच बुद्धि से आगे निकल गइल,
इंसानियत के हाथ पीड़ा पड़ गइल सहल।
एह जुग में मेहनते के कीमत गिरत गइल,
एही से कुरसीधारी लोगन के बा लहल।
खूनी हथेली देख के डोलत करेज बा,
बकिर नजर पड़ल कहाँ आँसू जवन, बहल।
का बा ‘पराग’ के कि कुछ केहू के दे सकस,
महलन का बीच में बा पलानी गिरल-ढहल।
गीत और ग़ज़लों में लोकजीवन की संवेदना
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ केवल हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील गीतकार और ग़ज़लकार भी रहे हैं। उनकी रचनाओं में भोजपुरी लोकजीवन की मिट्टी की खुशबू, मानवीय भावनाओं की गहराई और समय के बदलते सामाजिक सरोकारों की स्पष्ट झलक मिलती है। उनके गीतों में प्रेम, विरह, स्मृति और भोजपुरिया अस्मिता के स्वर सहज रूप से अभिव्यक्त होते हैं।
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उनके चर्चित गीत ‘ना अइलऽ बरिसात में’ में प्रतीक्षा, अकेलेपन और जीवन की उदासी का भाव दिखाई देता है—
‘ना अइलऽ बरिसात में,
तरकुल के छाँव में…’
वहीं ‘दिल के भीतर बनजारा दिन’, ‘भोजपुरिया बनल रहे विश्वास’, ‘चंदन के गंध तार-तार मसक गइल’ और ‘कहाँ गइल हम हईं भोजपुरिया’ जैसे गीतों में अपनी माटी, संस्कृति और बदलते सामाजिक परिवेश के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है।
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ की ग़ज़लें भी जीवन के विविध रंगों को समेटे हुए हैं। उनकी ग़ज़लों में प्रेम की कोमलता, समाज की पीड़ा और रिश्तों की संवेदनशीलता का अद्भुत मेल मिलता है।
‘कतहीं चइता कतहीं जर रहल बा गाँव’ जैसी पंक्तियां ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं और बदलते समय की कसक को सामने लाती हैं। वहीं-
‘प्रीत के पाहुन,
प्यार जग के सार…’
जैसी अभिव्यक्तियां प्रेम और मानवीय रिश्तों की सुंदरता को रेखांकित करती हैं।
चन्दन के गंध
चन्दन के गंध
बसाईं मन में
कहीं रहीं-
घर में चाहे वन में।
काटीं बिरवा बीख के
पनके ना
आग कहीं
अनचितले धनके ना
भूलीं मत
अपना अभिनन्दन के !
कर्म पथ पर
आगे बढ़त रहीं
आपन इतिहास
रोज गढ़त रहीं
उलझीं मत
व्यर्थ चरन-वन्दन में।
काल शकुनी
फेंक रहल पासा
छाँव पर चढ़ल
सभकर आसा
स्वार्थ समाइल बाटे
कन-कन में।
धीरज के डोर
कहीं छूटे ना
प्रेम के कलश
कबहीं फूटे ना
दिल के सम्बन्ध
बँधक छन्दन में !
उनके गीत और ग़ज़लें केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि भोजपुरी समाज के जीवन, संघर्ष, संस्कृति और संवेदनाओं का साहित्यिक दस्तावेज हैं। लोकभाषा की सहजता और साहित्यिक गहराई के कारण सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ की रचनाएं आज भी पाठकों के मन को छूती हैं।
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आकाशवाणी और साहित्यिक मंचों के लोकप्रिय साहित्यकार
उनकी अनेक रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी और विभिन्न साहित्यिक मंचों के माध्यम से हुआ। उनकी कविताएँ और ग़ज़लें साहित्यिक गोष्ठियों में आज भी बड़े सम्मान के साथ पढ़ी और उद्धृत की जाती हैं।
वे उन साहित्यकारों में शामिल हैं जिन्होंने भोजपुरी साहित्य को जनमानस से जोड़े रखा और साहित्य को समाज की आवाज बनाया।
समाज के लिए उनका योगदान
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ का साहित्य केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया। आम जनजीवन की समस्याओं को साहित्य का विषय बनाया। भोजपुरी भाषियों में भाषाई गौरव की भावना जगाई। नई पीढ़ी को मातृभाषा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। भोजपुरी साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हास्य और व्यंग्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।
‘सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ भोजपुरी के उन चुनिंदा निबंधकारों में हैं, जिन्होंने निबंध विधा को समृद्ध और गरिमामय बनाया। समग्रता में देखें तो उन्होंने भोजपुरी साहित्य में संस्कृत के शास्त्रीय छंदों का अत्यंत सफल और स्वाभाविक प्रयोग किया है। उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो ये छंद भोजपुरी के अपने मूल छंद हों। भोजपुरी अस्मिता आंदोलन में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इसके साथ ही उन्होंने भोजपुरी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन के माध्यम से भाषा और साहित्य की निरंतर सेवा की है।’
–डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी
संपादक, ‘सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ संचयन’ (पराग जी का भोजपुरी समग्र)
सम्मान-पुरस्कार और साहित्यिक विशेषताएँ
भोजपुरी भाषा और साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2023 में उन्हें प्रतिष्ठित “सत्तन सम्मान” से सम्मानित किया गया। साहित्यिक जगत में उन्हें भोजपुरी की अमूल्य धरोहर के रूप में स्वीकार किया जाता है।
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ की रचनाओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं-
सरल और प्रभावशाली भाषा
हास्य और व्यंग्य का संतुलित प्रयोग
लोकजीवन का यथार्थ चित्रण
सामाजिक चेतना
मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति
भोजपुरी संस्कृति और परंपरा के प्रति गहरा लगाव
लोकभाषा की सहजता और साहित्यिक गरिमा का अद्भुत समन्वय
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी साहित्य में हास्य-व्यंग्य को नई ऊँचाई प्रदान की। उनकी लेखनी ने समाज की विडंबनाओं को मुस्कुराते हुए उजागर किया और साहित्य को जनचेतना का माध्यम बनाया।
भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ उस साहित्य पुरोधा के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने शब्दों को केवल हास्य का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उन्हें समाज का दर्पण और परिवर्तन का उपकरण बनाया। उन्होंने भोजपुरी को हँसी की भाषा नहीं, बल्कि संवेदना, विचार और सामाजिक प्रतिबद्धता की भाषा के रूप में स्थापित किया।
सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि भोजपुरी व्यंग्य साहित्य की वह ऊँची शिखर-चोटी हैं, जहाँ से समाज को देखने की एक नई दृष्टि मिलती है।





