‘डुबि गइल गाँव-घर-बधार…’ बाढ़ की त्रासदी और किसान के दर्द का मर्मस्पर्शी दस्तावेज

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राजेश भोजपुरिया, जमशेदपुर

वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व पत्रकार दिनेश्वर प्रसाद सिंह ‘दिनेश’ द्वारा रचित गीत ‘डुबि गइल गाँव-घर-बधार’ बाढ़ की विभीषिका और उससे तबाह होते ग्रामीण जीवन की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करता है। यह केवल बाढ़ का वर्णन करने वाला गीत नहीं, बल्कि किसान की लाचारी, टूटते सपनों, उजड़ते घर-परिवार और व्यवस्था के प्रति गहरे सवालों को स्वर देने वाली संवेदनशील रचना है।

गीत की शुरुआत ही बाढ़ से हुई व्यापक तबाही के दृश्य से होती है-

“डुबी गइल गाँव घर बधार
सपनवां सभ टूटल हो
भइया, आइल किसनवन प काल
विधाता आजु रूठल हो।”

‘गाँव’, ‘घर’ और ‘बधार’ का डूबना महज भौगोलिक विनाश नहीं, बल्कि किसान की पूरी दुनिया के उजड़ जाने का प्रतीक है। खेत-खलिहान के साथ उसके वर्षों के सपने भी पानी में बह जाते हैं। ‘विधाता आजु रूठल हो’ की अभिव्यक्ति इस असहाय मनःस्थिति को और गहरा कर देती है।

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गीत में किसान की पीड़ा को अत्यंत सहज लेकिन प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया गया है-

“छतिया पिटत ई किसान भाई
लोरवा पोछत कहे हो,
भइया, कवन कसूर हम कइली
कि भाग मोर फूटल हो।”

यहाँ किसान प्रकृति से ही नहीं, अपने भाग्य से भी सवाल करता दिखाई देता है। उसकी मेहनत, उम्मीद और जीवन-भर की कमाई एक झटके में बर्बाद हो जाती है।

गीत का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि कवि केवल फसल के नुकसान तक सीमित नहीं रहते। बाढ़ के साथ जन्मस्थान, घर-द्वार, देव-पितर और पीढ़ियों की संचित पूँजी के उजड़ने की पीड़ा भी सामने आती है-

“छुटी गइल जन्म-स्थान
आ देव-पितर छूटल हो,
भइया, जनम-जनम के कमाई
कि सभे आजु डुबल हो।”

इन पंक्तियों में विस्थापन का दर्द बेहद गहराई से उभरता है। किसान के लिए जमीन केवल खेती का साधन नहीं, बल्कि उसकी पहचान, स्मृति और पूर्वजों की विरासत भी है।

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गीत में स्त्री की पीड़ा भी उतनी ही मार्मिक है। असहनीय दुख के बीच बहन का यह कहना-

“कइसे सहाई दुख अपार
कि बहिनी सिसकी कहे हो,
भइया, लाइ द जहर एक चुटकी
कि खाइ हम मरबि हो।”

बाढ़ के आर्थिक नुकसान से आगे बढ़कर उस मानसिक त्रासदी को सामने लाता है, जिसमें पूरा परिवार टूटने की कगार पर पहुँच जाता है। गीत की सबसे तीखी सामाजिक टिप्पणी इन पंक्तियों में दिखाई देती है-

“हाय हो विधाता कइसन हाल
किसानवन के कइल तू हो,
भइया, जेकर कमाई जग खाए
कि उहे आजु भूखल हो।”

यहाँ कवि किसान की विडंबना को व्यवस्था के सामने प्रश्न की तरह रखते हैं। जो किसान पूरे समाज का पेट भरता है, वही आपदा के समय भूख और अभाव से जूझने को मजबूर हो जाता है। यही पंक्तियाँ गीत को महज करुण रचना न रहने देकर सामाजिक सरोकार वाला गीत बना देती हैं।

हालाँकि गीत का अंत निराशा में नहीं होता। कवि किसान को धैर्य रखने और भविष्य की उम्मीद बनाए रखने का संदेश देते हैं-

“धीरज धर तू किसान भाई
छतिया पाथर कर हो,
भइया, एही रे धरतिया के आस
कि इहे दिनवा फेरत हो।”

यही आशा इस गीत को विशेष बनाती है। त्रासदी के बीच भी धरती पर भरोसा और बेहतर दिनों की उम्मीद बची रहती है।

भाषा की दृष्टि से भी ‘डुबि गइल गाँव-घर-बधार’ भोजपुरी लोकजीवन के बेहद निकट है। ‘गाँव-घर-बधार’, ‘छतिया पिटत’, ‘लोरवा’, ‘जनम-जनम के कमाई’ जैसे शब्द और मुहावरे गीत को सहज लोकधर्मी स्वर प्रदान करते हैं। इसमें करुणा है, आक्रोश है, सामाजिक प्रश्न है और सबसे बढ़कर किसान के प्रति गहरी संवेदना है।

कुल मिलाकर, दिनेश्वर प्रसाद सिंह ‘दिनेश’ का यह गीत बाढ़ में डूबे खेतों और घरों के साथ-साथ किसान के टूटे हुए मन की कहानी भी कहता है। यह आपदा की खबर नहीं, बल्कि आपदा के भीतर छिपे मानवीय दर्द का काव्यात्मक दस्तावेज है। भोजपुरी लोकभाषा की सहजता और मानवीय संवेदना के कारण यह गीत पाठक-श्रोता के मन में देर तक अपनी छाप छोड़ता है।

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