डॉ. संतोष पटेल
भारत का बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी ढांचा हमेशा से देश की विविधता और ताकत का प्रतीक रहा है। लेकिन हालिया नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक निर्देशों ने इस मूल भावना पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक ओर असम में चल रही भाषाई जनगणना के दौरान प्रवासियों से अपनी मातृभाषा छोड़कर असमी को मातृभाषा के रूप में दर्ज कराने की अपील की जा रही है, तो दूसरी ओर महाराष्ट्र में कैब और ऑटो चालकों के लिए मराठी की अनिवार्यता तय की गई है। इसका पालन न करने पर लाइसेंस और परमिट रद्द करने की चेतावनी भी दी गई है।
इन दोनों फैसलों का सीधा और सबसे गहरा प्रभाव उत्तर भारत, विशेष रूप से भोजपुरी भाषी आबादी पर पड़ रहा है। विडंबना यह है कि जिन राज्यों में ये नीतियां लागू हो रही हैं और जिन राज्यों से यह आबादी आती है—दोनों ही जगह भाजपा या उसके सहयोगियों की सरकारें हैं। असम में भाजपा शासन है, महाराष्ट्र में महायुति की सरकार है, जबकि भोजपुरी के प्रमुख क्षेत्र बिहार और उत्तर प्रदेश में भी भाजपा या उसके सहयोगियों का शासन है। इसके बावजूद भोजपुरी भाषी समाज एक तरफ अपनी मातृभाषा के अधिकार से बेदखल होने का खतरा झेल रहा है और दूसरी तरफ अपनी रोजी-रोटी से वंचित होने की कगार पर खड़ा है।
असम की भाषाई जनगणना और ‘अदृश्य’ होती पहचान
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल में असम में रह रहे गैर-असमी प्रवासियों, जिनमें बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग बड़ी संख्या में हैं, से अपील की कि वे जनगणना में असमी को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराएं। तर्क दिया जा रहा है कि असमी भाषियों का प्रतिशत लगातार घट रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी नागरिक की स्वाभाविक भाषाई पहचान को प्रशासनिक दबाव या राजनीतिक अपील के जरिए बदला जा सकता है? भोजपुरी जैसी विशाल भाषाई आबादी को जनगणना के कागजों पर अपनी मूल भाषा दर्ज कराने से हतोत्साहित करना भाषाई पहचान को कमजोर करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा सकता है।
महाराष्ट्र का कड़ा फरमान और आजीविका का संकट
महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, 15 अगस्त से कैब और ऑटो चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य की गई है। तीन महीने की मोहलत के बाद यदि चालक नियम का पालन नहीं कर पाते हैं तो उनका लाइसेंस और परमिट रद्द करने की चेतावनी दी गई है।
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मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भोजपुरी भाषी लोग मेहनत-मजदूरी और टैक्सी-ऑटो चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। स्थानीय भाषा का बुनियादी ज्ञान व्यावहारिक सुविधा हो सकता है, लेकिन भाषा के आधार पर आजीविका छीनने की धमकी गंभीर सवाल खड़े करती है।
‘डबल इंजन’ सरकारें और भोजपुरी की अनदेखी
बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों का इस पूरे घटनाक्रम पर अपेक्षाकृत मौन रहना कई सवाल खड़े करता है। अपने ही नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं की निष्क्रियता चिंता का विषय है।
क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय राजनीति का अंतर्विरोध
भाजपा एक ओर ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ और राष्ट्रवाद की बात करती है, लेकिन दूसरी ओर राज्यों के स्तर पर क्षेत्रीय राजनीतिक हितों के लिए भाषाई और क्षेत्रीय भावनाओं को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। असम और महाराष्ट्र में स्थानीय जनभावनाओं को राजनीतिक रूप से साधने के लिए गैर-प्रांतीय लोगों पर नीतिगत दबाव का सवाल इसी अंतर्विरोध को सामने लाता है।
बिहार-यूपी सरकारों की लाचारी
उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा गठबंधन की सरकारें होने के बावजूद, दोनों राज्य अपनी जनता के हितों को लेकर केंद्र या दूसरे राज्यों के सामने प्रभावी आवाज उठाने में संकोच करते दिखाई देते हैं। राजनीतिक समीकरणों के कारण स्थानीय नेतृत्व अपने नागरिकों से जुड़े ऐसे मुद्दों पर मुखर होने से बचता है, तो यह लोकतांत्रिक राजनीति के लिए गंभीर सवाल है।
संविधान की आठवीं अनुसूची की उपेक्षा
भोजपुरी एक समृद्ध भाषा है और लंबे समय से इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग होती रही है। चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से इसके समर्थन में आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद यह मांग अक्सर ठंडे बस्ते में चली जाती है। भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता मिलने से उसकी भाषाई पहचान, शिक्षा, साहित्य और प्रशासनिक उपयोग को मजबूती मिल सकती है।
आर्थिक मजबूरी और पलायन का दुचक्र
भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर पलायन का एक प्रमुख कारण स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसरों का अभाव है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के युवा आज भी काम की तलाश में मुंबई, गुवाहाटी, दिल्ली और गुजरात जैसे शहरों की ओर जाने को मजबूर हैं।
ये श्रमिक दूसरे राज्यों के आर्थिक विकास में अपनी मेहनत से महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसके बावजूद उन्हें कई बार ‘बाहरी’ बताकर राजनीतिक बहस का हिस्सा बना दिया जाता है। एक तरफ वे अपने गृह राज्य में रोजगार की कमी के कारण पलायन करते हैं और दूसरी तरफ गंतव्य राज्यों में भाषाई तथा क्षेत्रीय दबाव का सामना करते हैं।
समाधान का रास्ता: समावेशी नीति की आवश्यकता
भाषाई विविधता भारत की ताकत और सुंदरता है, विवाद का कारण नहीं। इस समस्या का समाधान केवल विरोध से नहीं, बल्कि नीतिगत सुधार और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से संभव है।
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केंद्र सरकार को भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। इससे भाषा को संवैधानिक पहचान और संस्थागत समर्थन मिल सकेगा तथा इसके संरक्षण और विकास के नए रास्ते खुलेंगे।
बिहार और यूपी में रोजगार के अवसर बढ़ें
बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। जब युवाओं को अपनी माटी पर बेहतर रोजगार मिलेगा, तो उन्हें रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में असुरक्षित परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
केंद्र सरकार को ऐसी प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जो प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों, भाषाई स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा की रक्षा कर सके। राज्यों के बीच काम करने वाले श्रमिकों के साथ भेदभाव रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जरूरी हैं।
जनगणना में पारदर्शिता
यदि किसी राज्य में काम करने के लिए स्थानीय भाषा का ज्ञान आवश्यक है, तो दंडात्मक कार्रवाई के बजाय मुफ्त और सुलभ भाषा प्रशिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए। डर और दंड की जगह संवाद और सहयोग को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। जनगणना अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक नागरिक अपनी वास्तविक मातृभाषा स्वतंत्र रूप से दर्ज करा सके। किसी भी प्रकार के राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
भाषा जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, तोड़ने का नहीं। भारत का संविधान नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में रहने और काम करने की स्वतंत्रता देता है। साथ ही अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना का हिस्सा है।
असम और महाराष्ट्र से जुड़े भाषाई नीतिगत विवाद तथा बिहार-उत्तर प्रदेश की सरकारों की निष्क्रियता कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि भाषाई पहचान और आजीविका के अधिकारों को राजनीतिक हितों के अधीन कर दिया गया, तो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना कमजोर होगी।
राजनीतिक दलों को अल्पकालिक चुनावी लाभ से ऊपर उठकर देश के श्रमबल, भाषाई विविधता और नागरिक अधिकारों का सम्मान करना होगा। भोजपुरी की पहचान केवल एक भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की संस्कृति, अस्मिता और विरासत का प्रश्न है।

