मुक्तक
भोजपुरिया अब बोल रहल, माटी ह अनमोल
जहाँ गूँजल बा राजेन्द्र आ जयप्रकाश के बोल
कुंवर के धरती,बुद्ध,गांधी के इहे देखवलस राह
ई धरती पर पैदा भइले, भिखारी जइसन लाल।
भोजपुरी , भोजपुरियत के आपन पहचान
जग के भिखारी देखवलन,मातृभाषा के मान
नाचि के कह गइलन, समाजिक व्यथा सब
लोक से जुड़ल रहल बा,भिखारी के जान।
सुतीं मत सरकार,देखीं आँखि खोलिके आज
डंका के चोटि पर देलन,बेटा बेचवन के लाज
मेहरारूअन के दसा, उघार रखि दिहलन ऊ
प्रवासी के दरद बता,कइलन समाजिक काज।
जनि जरीं देखके अनकर धन,कामे ना आई
जनि तौलीं दोसरा के, रउवा कुछ ना भेंटाई
भिखारी ठाकुर के बतिया,झूठ ना नूं हऽ भाई
धरमे धन ह भाई जी, ऊ त साथहीं नू जाई।
ई दुनिया बाजार ह, इहाँ जे जे बेचब से बेचाई
घर घर के एके लेखा, दूर होत जाता भाई भाई
भिखारी के आँखि प्रेम के भूखल, प्रेम खोजेला
माई के बखरा बँटात बा, ई कलयुग नूं ह भाई
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नाची से बाची
नाच
खाली नाच ना हऽ
संस्कृति के साँच हऽ
उत्सव के आँच हऽ
प्रकृति के बोल हऽ
आत्मिक आनंद के स्रोत हऽ।
नाच
सामाजिक समरसता के साँच हऽ
सामाजिक दर्पण
आ जिनिगी के बाँच हऽ
मनोरंजन के साधन
आ संस्कृति के पहचान हऽ।
नाच
भिखारी के पहचान हऽ
जे प्रमाणित कर गइलन
कि नाच खाली नाच ना हऽ
मानव अस्मिता के साँस हऽ
नाची से बाची
संस्कार आ संस्कृति बचावे खातिर
रउवो नाचीं।
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हाइकु
लोक नायक
नाच के सरताज
मोर भिखारी।
देत संदेश
समाज सुधार के
माई भाषा में।
भजन भाव
देखा गइले राह
नाची से बाची।
भिखारी नांव
गजबे कारिस्तान
नाचे से साँच।
बेटी बेचवा
दहेज अभिसाप
चेत समाज।
नारी विमर्श
भिखारी के नाटक
देखे समाज।
नाच नौटंकी
भिखारी के गायन
लोक साहित्य।
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भिखारी मुअल नइखन
भिखारी मुअल नइखन
मुअबो ना करीहें
जिंदा बाड़े
समाज में
परिवार में
हमनी का भीतर
मु तऽ गइल
उनकर जगावल
जागरण मंत्र
सामाजिक समरसता
के पढ़ावल पाठ
आँखिन के लोर
जे हमनी खातिर हँसत – हँसावत रोअलन,
उनका भीरि रहे का
बाकिर समाज के बहुत कुछ दे गइलन
अब हमनी के संजोवे के बा उनकर सीख
इहे सच्चा श्रद्धांजलि होई उनका प्रति।
प्रवासी के जीवन भोगलन
ओकर दरद बुझलन
आपन अनुभव अनुभूति के
लेके रोवलन ना,
बंगाल के यात्रा देख
आपन जीवन के दिशा बोध लेलन,
अतने ना ऊ जानत रहन
अकेले चना भाड़ ना फोड़े
एही से समाज के सहयोग लेके
मंडली गठन कर
आगे बढ़लन,
पढ़लन किताब के ना
बाकिर आँखिन से समाज के पढ़लन,
पढ़ल सामाजिक विसंगतियन
के दूर करें खातिर
बन्द पड़ल अँखियन पर
परदा हटावे के अथक प्रयास कइलन
जे जियावता उनका के हमनी का भीतर।
एक बात अउर
भिखारी खातिर कतनो काम होई
ऊ कमे होई
ऐहसे खूब होखो
सभे करे
बाकिर ठाकुर जी खातिर
अपना खातिर ना
एह खातिर अपना भीतर झाँकल
जरूरी बा,
हमनी किहाँ पुरान कहाउत ह
” लइका बहाने लरकोरी जियले ”
ऊ ना होखे के चाहीं,
भिखारी आ भोजपुरी जियत रही त
भोजपुरिया जी लिही,
अपना भीतर मुअत
भिखारी आ भोजपुरी के जिआवे के बा।
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काम आई जिनिगी में, लोक बसल आचार।
भिखारी ई कह गइलन,तूहूं तऽ कर बिचार।।
नाच नौटंकी जान हऽ, काम समाज सुधार।
रचलन रचना समय के, ना कइलन बैपार।
जाति धरम का चीज हऽ,दिहलन सीख समाज।
बोल भिखारी सामयिक, खूब सांच बा आज।।
भिखारी भोजपुरी के, दिहलन नया विहान।
जोत जगावत बढ़त चल,उनकर देल निसान।।
नारी आ प्रवासी के, दुख के कथा अनंत।
भिखारी ई कह गइलन ,कहाँ बा एकर अंत।
बइठल कोढ़ समाज में,दिहलन बोल उघार।
ढ़ेर लोग के पचल ना, आजो पिटत कपार।
लोक से पढ़ी बहुत कुछ,दिहलन नया अवाज।
बहुजन के दुख के कथा,बोल भिखारी साज
जय भोजपुरी, जय भिखारी।
कनक किशोर, राँची ( झारखंड)

