साहित्य समाज का दर्पण होता है, ऐसा कहा गया है। साहित्यकार जब अपना कलम चलाता है तो वो समाज के संगति व विसंगति दोनो को लिखता है। वो प्रेम भी लिखता है, वरह भी लिखता है। यह भी सत्य है कि लिखने के लिए आचार्य होना या पढ़ा होना जरुरी नहीं है। बिना डिग्री वाले लोग भी बहुत गम्भीर साहित्य लिख जाते हैं। ऐसे ही एक कवि कलाकार, नाटककार हुए लोक कलाकार भिखारी ठाकुर जिन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर भी कहा जाता है।
भिखारी ठाकुर के नाटक विदेसिया में अनेक गीत भरे पड़े हैं। परंतु मैं यहां एक गीत “पियवा गइलन कलकातावा ए सजनी” में स्त्री विमर्श को आपके बीच रख रही हूँ। भिखारी ठाकुर के लिखे गीतों को आप देखेंगे तो आपको कुछ खास अंदाज दिखेगा। वो अपने रचना में स्त्री के मन की बात लक्षणा व व्यंजना के माध्यम से प्रयोग करते हुए दिखेंगे। यह उनकी काव्य रचना की शैली है। ऐसा विरले ही किसी कवि साहित्यकार में मिलता है कि वो अपनी हर रचना में लक्षणा या व्यंजना का प्रयोग करता हो।
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भिखारी ठाकुर जी की नाटक विदेसिया विश्व प्रसिद्ध एवं जन जन की पहुँच वाली नाटक है। इस नाटक की प्रसिद्धि का आलम यह है कि गाँव गिराँव में नाटक का एक विदेसिया शैली भी प्रचलित हो चला। यहां हम देखेंगे कि भिखारी ठाकुर ने विदेसिया नाटक में एक स्त्री की किस किस मनोदशा को दर्शाने की कोशिश की है।
पियवा गइलन कलकातावा ए सजनी !
तूरि दिहलन पति-पत्नी-नातावा ए सजनी,
किरिन भीतरे परातवा ए सजनी ! पिया….
गोड़वा में जूता नइखे, सिरवा पर छातवा ए सजनी,
कइसे चलिहन राहातवा ए सजनी ! पिया….
सोचत-सोचत बीतत बाटे दिन-रातवा ए सजनी,
कतहूँ लागत नइखे पातावा ए सजनी ! पिया….
लिखत ‘भिखारी’ खोजिकर बही-खाताबा ए सजनी,
प्यारी सुन्दरी के बातवा ए सजनी ! पिया….
विरह, अस्मिता एवं संघर्ष के बीच भिखारी ठाकुर के नाटक विदेसिया की ग्रामीण अंचल की स्त्री खड़ी नजर आ रही है। उपरोक्त गीत भी माइग्रेशन के त्रासदी के दौर से गुजर रहे बिहार तथा पूर्वांचल की यथार्थ है।
‘पियवा गइलन कलकातावा ए सजनी ! तूरि दिहलन पति-पत्नी-नातावा ए सजनी…’
गीत के इस पंक्ति को पढ़ने पर पता चलता है कि यहां सिर्फ पति के कलकत्ता जाने का ही जिक्र नहीं है बल्कि उसके आर्थिक लाचारी की पीड़ा जो उस पुरुष को अपनी पत्नी को अकेले घर के भीतर असुरक्षित व भावनात्मक रूप से असहाय छोड़ कर चले जाने पर मजबूर कर देता है। आइए इस गीत में स्त्री विमर्श को देखने की कोशिश करते हैं।
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आर्थिक पराधिनता और स्त्री की अस्मिता
इस गीत में भिखारी ठाकुर की नायिका यह कहती है कि ‘तूरि दिहलन पति-पत्नी नातावा’ मतलब पति पत्नी का नाता टूट सा गया है। अब यहां देखने वाली बात यह है कि भिखारी ठाकुर जी यह बता रहे हैं कि पुरुष प्रधान समाज में किसी स्त्री का अस्तित्व तथा उसकी सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी पुरुष पर ही निर्भर है। फ्रांसीसी दार्शनिक और नारीवादी लेखिका सिमोन द बोवुआर (Simone de Beauvoir) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द सेकेंड सेक्स’ में लिखा था-
’स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है।’
भिखारी ठाकुर का यह गीत इस बात का गवाह है कि समाज में किस तरह से स्त्री को पुरुष के ऊपर आश्रित या दूसरा दर्जा (The Other) बना दिया गया है। उसके पुरुष को छोड़ कर जाते ही उसका पूरा दुनिया उजड़ सा जाता है। वह घर की चारदीवारी के भीतर (किरिन भीतरे परातवा) सूर्य अस्त होने से पहले घुटने को मजबूर है।
विरह, चिंतन तथा करुणा
भिखारी ठाकुर का यह गीत जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है, वैसे वैसे इसकी गंभीरता व विषय भी बढ़ती जा रही है। इस गीत के अगले पंक्ति में भिखारी ठाकुर कहते हैं -‘गोड़वा में जूता नइखे, सिरवा पर छातावा ए सजनी, कइसे चलिहन राहातावा ए सजनी…’
इस पंक्ति में भिखारी ठाकुर की नायिका का बड़प्पन देखिए कि एक ओर जहाँ उसका पति उसे छोड़ कर चला गया है वहीं दूसरी ओर उसको पति पर गुस्सा आने के बजाय पति के तकलीफ (बिना जूता और छाता के राह चलना) की चिंता सता रही है, उसको सोचकर वह तड़प रही है। यह एक भारतीय स्त्री ही कर सकती है। भिखारी ठाकुर ने इस पंक्ति से स्त्री के उस ममता को उभारा है जो अपनी पीड़ा से ऊपर उठकर दूसरे की पीड़ा देख टूट जाती है।
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इसी संदर्भ में महदेवी वर्मा ‘शृंखला की कड़ियाँ’ लिख रही हैं कि – ‘भारयीय स्त्री का जीवन अक्सर दूसरों के लिए त्याग करने में ही बीत जाता है और बदले में उसे केवल अभाव मिलते हैं।’ यहां वर्मा जी ने जिन कड़ियों मतलब बेड़ियों की बात कर रही हैं उसी बेड़ियों को भिखारी ठाकुर अभाव के रूप में देख रहे हैं। पति परदेस में कमाने गया है परंतु उसकी पत्नी को उनके पैर में जुता और सर पर छाता न होने की अभाव को देख रही है। यह भारतीय समाज के स्त्री का पुरुषों के प्रति चिंतन है।
अकेलेपन की त्रासदी और वैश्विक स्त्रीवाद
‘सोचत-सोचत बीतत बाटे दिन-रातवा ए सजनी, कतहूँ लागत नइखे पातावा ए सजनी…’
कोई भी इंसान जब दिन रात किसी सोच में डूबा रहे तो उसकी मानसिक स्थिति खराब हो जानी है और वह अकेलेपन का शिकार हो जाता है। इस गीत की पंक्ति में भिखारी ठाकुर की नायिका का भी यही हाल है। वो अपने पति के लिए चिन्तित है। सही भी है कि जब किसी का पति कमाने के लिए उसे घर में अकेले छोड़ कर परदेस चला जाय तो वह स्त्री ना सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी टूट जाती है। दिन रात उसका चिंतन में ही बीतने लगता है और वह अकेलेपन को जीने लगती है।
अमेरिकी कवयित्री सिल्विया प्लाथ (Sylvia Plath) ने अपनी कविताओं जैसे ‘डैडी’ या ‘लेडी लाजरस’ में स्त्री के इसी मानसिक अकेलेपन, घुटन और पितृसत्तात्मक समाज द्वारा दिए गए घावों को बेहद आक्रामक रूप से व्यक्त किया है। जहाँ सिल्विया प्लाथ का विमर्श विद्रोह की तरफ जाता है, वहीं भिखारी ठाकुर की नायिका लोक-मर्यादा के भीतर रहकर उस घुटन को सहती है।
बही-खाता एवं इतिहास में स्त्री का स्थान
-लिखत ‘भिखारी’ खोजिकर बही-खाताबा ए सजनी, प्यारी सुन्दरी के बातवा ए सजनी…’
इस गीत के अंतिम पंक्ति में भिखारी ठाकुर बही खाता की बात कर रहे हैं। मतलब एक तरह से इतिहास खंगालने का प्रयास कर रहे हैं। यह इतिहास है समाज में दबी कुचली स्त्री की आवाज जो कहां किस रूप में दर्ज है।
प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखिका विर्जिनिया वुल्फ (Virginia Woolf) ने अपने निबंध ‘ए रूम ऑफ वन्स ओन’ (A Room of One’s Own) में कहा था कि इतिहास में स्त्रियों के नाम इसलिए दर्ज नहीं हैं क्योंकि उन्हें कभी लिखने की आजादी या अपना स्थान ही नहीं मिला। वे लिखती हैं कि इतिहास में ‘अनाम’ (Anonymous) लिखे गए अधिकांश लोकगीत और कविताएँ असल में महिलाओं द्वारा ही रची गई होंगी। भिखारी ठाकुर यहाँ उसी ‘अनाम’ ग्रामीण स्त्री (प्यारी सुन्दरी) की पीड़ा को अपने बही-खाते में दर्ज करके उसे इतिहास में अमर कर रहे हैं।
भिखारी ठाकुर रचित यह लोकगीत केवल मनोरंजन मात्र का साधन नहीं है, बल्कि यह मजदूर पलायन का स्त्रीवादी पाठ है।

