आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ से विशेष बातचीत
सावन की पहली फुहार के साथ भोजपुरी अंचल में कजरी की गूंज सुनाई देने लगती है। लेकिन क्या कजरी केवल सावन में गाया जाने वाला लोकगीत है? क्या इसका संबंध केवल झूले और विरह से है? या फिर इसकी जड़ें भारतीय शक्ति उपासना और सांस्कृतिक इतिहास में कहीं अधिक गहरी हैं?
भोजपुरी, संस्कृत और हिंदी के विद्वान आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ का मानना है कि कजरी का जन्म मां विंध्यवासिनी की स्तुति और आराधना के रूप में हुआ। प्रारंभिक दौर में यह गाई नहीं जाती थी, बल्कि इसे ‘खेला’ जाता था। बाद में यह लोकगीत के रूप में विकसित हुई। प्रस्तुत है उनसे हुई विशेष बातचीत के प्रमुख अंश-
प्रश्न : आखिर कजरी क्या है?
कजरी को केवल सावन में गाया जाने वाला लोकगीत मान लेना उसके साथ अन्याय होगा। यह हमारी लोक संस्कृति, आस्था और सांस्कृतिक स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज है। इसका संबंध केवल संगीत से नहीं, बल्कि शक्ति उपासना, भारतीय दर्शन और लोकजीवन से भी है। भोजपुरी समाज में सावन की कल्पना कजरी के बिना अधूरी है।
प्रश्न : कजरी का जन्म कैसे हुआ?
कजरी का जन्म मां विंध्यवासिनी की स्तुति और उनकी आराधना के रूप में हुआ। विंध्याचल एक सिद्धपीठ है, जहां मां विंध्यवासिनी, मां काली और मां भुवनेश्वरी तीनों शक्ति स्वरूपों की आराधना होती है। इन्हीं की स्तुति से कजरी की शुरुआत मानी जाती है।
दरअसल, पहले कजरी गाई नहीं जाती थी, बल्कि इसे खेला जाता था। सावन की पहली बारिश के बाद गांवों में महिलाएं और युवतियां झूला झूलते हुए देवी की स्तुति करती थीं। यह एक सामूहिक सांस्कृतिक अनुष्ठान था, जो बाद में लोकगायन का स्वरूप बन गया।
ये भी पढ़ें-भोजपुरी गीत-संगीत का संकट या बदलाव? अश्लील बनाम श्लील की नई बहस
प्रश्न : क्या कजरी नाम के पीछे भी कोई कथा है?
कजरी की उत्पत्ति को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय जो कन्या कंस के हाथों से छूटकर विंध्याचल पहुंची थीं, वे मां विंध्यवासिनी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। उनका वर्ण श्याम माना गया है। ‘काजल’ और ‘काला’ शब्दों से भी ‘कजरी’ शब्द की व्युत्पत्ति को जोड़ा जाता है।
इस दृष्टि से कजरी का संबंध केवल लोकगीत से नहीं, बल्कि देवी की उपासना और भारतीय शक्ति परंपरा से भी है।
प्रश्न : कजरी में भगवान शिव और भगवान कृष्ण का क्या स्थान है?
मैं मानता हूं कि कजरी की इष्ट देवी मां विंध्यवासिनी हैं, उनके स्वामी भगवान शिव हैं और इसके नायक भगवान श्रीकृष्ण हैं। भगवान शिव नटराज हैं और श्रीकृष्ण रसराज। यही कारण है कि कजरी में भक्ति, श्रृंगार और विरह तीनों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
कहीं नायिका अपने प्रियतम के साथ झूला झूल रही होती है, तो कहीं वह सावन की बूंदों के साथ अपने विरह को स्वर दे रही होती है।
‘कजरी पहले गाई नहीं जाती थी, बल्कि खेली जाती थी। यह मां विंध्यवासिनी की आराधना का लोक अनुष्ठान था, जो समय के साथ लोकगीत के रूप में विकसित हुआ।’ –आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’
प्रश्न : कजरी और सावन के झूलों का क्या संबंध है?
भोजपुरी अंचल में सावन की पहली बारिश के साथ ही गांवों में झूले पड़ जाते थे। कुंवारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं झूला झूलते हुए सबसे पहले आदिशक्ति का स्मरण करती थीं। कजरी की शुरुआत देवी वंदना से होती थी।
ये भी पढ़ें- मॉरीशस में भोजपुरी का गला किसने घोंटा?
लोक परंपरा में एक पंक्ति आती है- पोखर पीड़िया, पोखर पीड़िया, तिजिया भरतिया लावे ले…
यहां ‘पीड़िया’ का अर्थ देवी की पिंडी से है। प्राचीन काल में देवी की पूजा मूर्ति के बजाय पिंडी स्वरूप में ही होती थी। आज भी वैष्णो देवी और विंध्याचल में यह परंपरा जीवित है। इससे स्पष्ट होता है कि कजरी मूलतः शक्ति आराधना का लोक उत्सव है।
प्रश्न : कजरी की उत्पत्ति से जुड़ी ऐतिहासिक कथा क्या है?
कजरी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कथा मिर्जापुर के राजा कज्जल राय या जदुराय से संबंधित है। कहा जाता है कि उन्होंने मुगल शासकों के विरुद्ध संघर्ष किया था। वीरगति प्राप्त करने के बाद उनके वियोग में महिलाओं द्वारा गाए गए गीत लोक परंपरा का हिस्सा बन गए।
लोक में आज भी यह पंक्ति सुनाई देती है-‘कहां गए जदुरैया, बिन घर सूना रे हरी…’
यह केवल शोकगीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान और लोकभावना की अभिव्यक्ति है।
प्रश्न : कजरी का इतिहास कितना पुराना माना जाता है?
वर्तमान स्वरूप में कजरी का विकास लगभग 15वीं और 16वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। तुलसीदास ने अपनी ‘विनय पत्रिका’ में इसी छंद का प्रयोग किया है। ‘रे हरी’, ‘अरे रामा’ और ‘रे सांवरिया’ जैसे पदों ने इसे अत्यंत मधुर और गेय बनाया है।
प्रश्न : कजरी को विरह का सबसे मार्मिक लोकगीत क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसमें स्त्री मन की सबसे सहज और सच्ची अभिव्यक्ति मिलती है। सावन जहां प्रकृति के उत्सव का प्रतीक है, वहीं अपने प्रिय से दूर स्त्री के लिए यह विरह का मौसम भी है।
कजरी में नायिका बादलों से संवाद करती है, कोयल को संदेशवाहक बनाती है और झूले पर बैठकर अपने मन की व्यथा व्यक्त करती है। यही कारण है कि इसे स्त्री मन का लोक साहित्य भी कहा जाता है।
प्रश्न : समय के साथ कजरी में क्या परिवर्तन आए हैं?
प्रारंभ में कजरी देवी आराधना और विरह के गीतों तक सीमित थी। बाद में इसमें श्रृंगार, भक्ति, सामाजिक सरोकार और लोकजीवन के अनेक रंग शामिल होते गए।
आज बनारस घराने की कजरी विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। महान शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी ने इसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भोजपुरी लोकसंगीत और फिल्मों में भी इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं।
ये भी पढ़ें- भोजपुरी के शेक्सपियर क्यों कहलाए भिखारी ठाकुर?
प्रश्न : कजरी कितने प्रकार की होती है?
कजरी के अनेक रूप मिलते हैं, जिन्हें उसके गायन, क्षेत्र और भाव के आधार पर अलग-अलग वर्गों में देखा जाता है। प्रमुख रूप से कजरी के निम्न प्रकार माने जाते हैं—
- मिर्जापुरी कजरी – इसे कजरी का मूल और सबसे प्राचीन रूप माना जाता है। इसमें लोकजीवन, सावन और देवी आराधना का सुंदर समन्वय मिलता है।
- बनारसी कजरी – यह शास्त्रीय संगीत से प्रभावित कजरी है। बनारस घराने के कलाकारों ने इसे देश-विदेश में पहचान दिलाई। गिरिजा देवी जैसी महान गायिकाओं ने इसे लोकप्रिय बनाया।
- भोजपुरी कजरी – भोजपुरी अंचल में गाई जाने वाली कजरियों में विरह, प्रेम, परिवार, सामाजिक संबंध और लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
- ठुमरी अंग की कजरी – शास्त्रीय संगीत की शैली में गाई जाने वाली कजरी, जिसमें श्रृंगार और भावाभिव्यक्ति का विशेष महत्व होता है।
- लोक कजरी (झूला कजरी) – सावन के महीने में झूला झूलते हुए महिलाओं द्वारा समूह में गाई जाने वाली कजरी। यह गांवों की सबसे लोकप्रिय परंपरा रही है।
- विरह कजरी – इसमें पति या प्रियतम के बिछोह की पीड़ा को स्वर दिया जाता है। सावन का उल्लास यहां विरह की संवेदना में बदल जाता है।
- देवी कजरी – मां विंध्यवासिनी और आदिशक्ति की स्तुति में गाई जाने वाली कजरियां, जिन्हें कजरी का प्रारंभिक स्वरूप माना जाता है।
प्रश्न : क्या आज कजरी की परंपरा कमजोर पड़ रही है?
हां, यह चिंता का विषय है। पहले सावन आते ही गांवों के हर आंगन और बाग-बगीचों में झूले पड़ते थे और महिलाएं समूह में कजरी गाती थीं। अब यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
डिजिटल युग में नई पीढ़ी लोक परंपराओं से दूर हो रही है। आवश्यकता इस बात की है कि कजरी जैसी सांस्कृतिक धरोहर को शोध, शिक्षा और डिजिटल माध्यमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।

