डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ लोकधुनों के महागाथाकार, जिन्होंने बिरहा-कजरी को विश्व मंच तक पहुंचाया

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Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय उस लोक संस्कृति साधक का, जिन्होंने भोजपुरी लोकसंगीत को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे शोध, साहित्य, अकादमिक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ भोजपुरी लोकगायन की उन विरल विभूतियों में हैं, जिन्होंने बिरहा, कजरी, लोरिकी, चैता और आल्हा जैसी लोक विधाओं को नई प्रतिष्ठा दिलाई है।

वे लोकगायक हैं, शोधकर्ता हैं, लेखक हैं, शिक्षाविद हैं और सबसे बढ़कर भोजपुरी लोक संस्कृति के संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण के लिए समर्पित सांस्कृतिक कर्मी हैं। उनकी पुस्तकें ‘बिरहा दर्शन’ और ‘कजरी मीमांसा’ आज लोकसंगीत के शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती हैं। लोक संस्कृति की इस लंबी साधना ने उन्हें भोजपुरी लोक परंपरा का एक सशक्त प्रतिनिधि बना दिया है।

मिर्जापुर की माटी से निकला लोक संस्कृति का साधक

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद के चुनार तहसील अंतर्गत ग्राम काशीपुर में 1 जून 1972 को जन्मे डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ का बचपन लोक संस्कृति की समृद्ध परंपराओं के बीच बीता। उनके पिता श्री रम्मन यादव और माता श्रीमती गुलाब देवी ने उन्हें भारतीय लोकजीवन के संस्कार दिए। गांव के मेलों, अखाड़ों और लोकगायन की परंपराओं ने बचपन से ही उनके भीतर भोजपुरी लोकधुनों के प्रति गहरा लगाव पैदा किया।

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यही लगाव आगे चलकर उनके जीवन का उद्देश्य बन गया। आज उनकी पहचान केवल एक लोकगायक के रूप में नहीं, बल्कि भोजपुरी लोक संस्कृति के गंभीर अध्येता और संवाहक के रूप में स्थापित हो चुकी है।

शिक्षा और लोकसंगीत का अद्भुत संगम

डॉ. मन्नू यादव उन चुनिंदा लोक कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने लोकसंगीत को अकादमिक अध्ययन और शोध से जोड़ा। उन्होंने एम.कॉम., एलएलबी, एमएड, लोक संगीत में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधियां प्राप्त की हैं। उनकी शैक्षणिक यात्रा इस बात का प्रमाण है कि लोक संस्कृति और उच्च शिक्षा एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भोजपुरी लोक विधाओं पर गंभीर शोध और अकादमिक अध्ययन की असीम संभावनाएं हैं। उनकी दृष्टि में लोक संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक स्मृति और ज्ञान की महत्वपूर्ण धरोहर है।

बिरहा को दिया साहित्य और शोध का सम्मान

भोजपुरी लोकसंगीत की सबसे लोकप्रिय विधाओं में शामिल बिरहा को लंबे समय तक केवल लोक मनोरंजन का माध्यम माना जाता रहा। डॉ. मन्नू यादव ने इस धारणा को बदलने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने बिरहा के इतिहास, स्वरूप और सांस्कृतिक महत्व पर गंभीर अध्ययन किया और उसे साहित्य तथा शोध का विषय बनाया।

उनकी चर्चित पुस्तक ‘बिरहा दर्शन’ को बिरहा लोकगायन के दस्तावेजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जाता है। वहीं ‘कजरी मीमांसा’ भोजपुरी लोकसंगीत की परंपराओं को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण शोधपरक कृति है। इस पुस्तक के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रतिष्ठित पंडित रामनरेश त्रिपाठी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियां ‘लोरिक काव्य खंड’, ‘लालिमा’ और ‘उत्तर भारतीय लोक संगीत’ प्रकाशनाधीन हैं, जो भविष्य में लोक साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली मानी जा रही हैं।

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लोक विधाओं के बहुआयामी साधक

डॉ. मन्नू यादव की गायन शैली केवल बिरहा तक सीमित नहीं है। वे भोजपुरी लोकसंगीत की अनेक विधाओं के सिद्धहस्त कलाकार हैं। उनकी प्रमुख गायन विधाओं में पारंपरिक बिरहा, लोरिकी, चन्दैनी, आल्हा, कजरी और चैता शामिल हैं। उनकी प्रस्तुतियों में पूर्वांचल की सांस्कृतिक चेतना, भारतीय दर्शन, लोकजीवन की संवेदनाएं और सामाजिक सरोकार सहज रूप से दिखाई देते हैं। यही कारण है कि उन्हें लोक परंपरा और शास्त्रीय दृष्टि का अद्भुत संगम माना जाता है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत सांस्कृतिक यात्रा

डॉ. मन्नू यादव के सांस्कृतिक योगदान को अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं ने सम्मानित किया है। उन्हें वर्ष 2007 के लिए संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ राष्ट्रीय युवा पुरस्कार प्रदान किया गया, जो उन्हें 29 अप्रैल 2008 को प्रदान किया गया। यह सम्मान भारतीय लोक और शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं को दिया जाने वाला देश का प्रतिष्ठित पुरस्कार है। वर्ष 2013 में उन्हें उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें उत्तर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल के हाथों प्राप्त हुआ।

उनकी पुस्तक ‘कजरी मीमांसा’ के लिए वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने उन्हें पंडित रामनरेश त्रिपाठी पुरस्कार प्रदान किया। इसके अतिरिक्त वर्ष 2009-10 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित लोक संगीत प्रतियोगिता में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया।

उन्हें बिलासा कला सम्मान (छत्तीसगढ़ सरकार), कैमूर अलंकरण सम्मान (पूर्वांचल क्लब, सोनभद्र) तथा मॉरीशस तकनीकी विश्वविद्यालय द्वारा लोक भूषण सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।

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वर्ष 2025 में राष्ट्रीय युवा महोत्सव में उन्हें निर्णायक मंडल (जूरी) के रूप में आमंत्रित किया गया। वर्ष 2024-25 में वे काशी सांसद सांस्कृतिक प्रतियोगिता के प्रमुख निर्णायक मंडल के सदस्य भी रहे हैं।

देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में दिया व्याख्यान

डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, आईआईटी कानपुर, आईआईटी बिहटा (पटना), एमएएनआईटी भोपाल, दिल्ली विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय (प्रयागराज), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा), असम विश्वविद्यालय, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (मुंबई) तथा केंद्रीय भाषा संस्थान, अहमदाबाद सहित देश के अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में भोजपुरी लोक संस्कृति पर शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने इन संस्थानों में लोकसंगीत पर व्याख्यान और गायन प्रस्तुतियां भी दी हैं।

फिल्मों और डिजिटल माध्यमों में भी छोड़ी अमिट छाप

डॉ. मन्नू यादव भारत सरकार के आकाशवाणी केंद्र, वाराणसी के ‘ए’ ग्रेड कलाकार हैं। लोकसंगीत की दुनिया में यह उपलब्धि अत्यंत प्रतिष्ठित मानी जाती है। वे उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज तथा संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली से भी जुड़े रहे हैं। उनकी प्रस्तुतियां अनेक राष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा रही हैं और उन्होंने देशभर में भोजपुरी लोकधुनों को नई पहचान दिलाई है।

लोक संस्कृति को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने के उद्देश्य से डॉ. मन्नू यादव ने फिल्मों और डिजिटल माध्यमों में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने हिंदी फिल्म ‘मुहल्ला अस्सी’ में बिरहा शैली में पार्श्व गायन किया, जिसमें उनका गाया निर्गुण भी शामिल किया गया है। भोजपुरी फिल्म ‘रखवाला’ में उन्होंने सह-अभिनेता की भूमिका निभाई।

इसके अलावा उन्होंने ‘काशी गाथा’, ‘वीर लोरिक पत्थर’, ‘जिंदा शहीद’ तथा देशभक्ति और वीर रस से जुड़े अनेक गीतों का सृजन एवं प्रस्तुतीकरण किया है। श्रीमद्भागवत गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित करने की मांग पर आधारित उनके गीत भी विशेष रूप से चर्चित रहे हैं।

विश्व मंच पर गूंजी भोजपुरी की लोकधुन

डॉ. मन्नू यादव ने भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हुए मॉरीशस (2012), भूटान (2016) और दुबई (2021) में भोजपुरी लोकसंगीत की प्रस्तुतियां दी हैं। वे कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में भी व्याख्यान दे चुके हैं।

वर्ष 2026 में उन्होंने मॉरीशस के प्रधानमंत्री डॉ. नवीन चंद्र रामगुलाम के समक्ष प्रत्यक्ष चौताल गायन प्रस्तुत कर भारतीय लोक संस्कृति को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। उनके कार्यक्रमों ने प्रवासी भारतीयों और वैश्विक दर्शकों को भोजपुरी की सांस्कृतिक समृद्धि से परिचित कराया है।

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुति

वर्ष 2007 में 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर उन्होंने लाल किले की प्राचीर से प्रथम बिरहा गायक के रूप में वीर कुंवर सिंह पर आधारित वीर रस बिरहा की प्रस्तुति तत्कालीन राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्ष दी। इसके अतिरिक्त उन्होंने चंडीगढ़ में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक सभाओं में लगभग आधा दर्जन अवसरों पर लोकगायन प्रस्तुत किया है।

लोक संगीत के दिग्गजों के साथ मंच साझा

डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ ने पद्म विभूषण तीजन बाई, पद्मश्री मालिनी अवस्थी, पद्म भूषण छन्नूलाल मिश्र, पद्म भूषण प्रह्लाद टिपाणिया तथा पद्मश्री भैरव सिंह चौहान जैसी महान विभूतियों के साथ मंच साझा किया है। उनकी प्रस्तुतियां भारतीय लोक संगीत की समृद्ध परंपरा और भोजपुरी संस्कृति की प्रतिष्ठा को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करती हैं।

डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ पारी (PARI) और अनहद फाउंडेशन के साथ मिलकर 51 लोकगीतों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में डिजिटल आर्काइव तैयार कर रहे हैं। यह प्रयास लोक संस्कृति के संरक्षण और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राष्ट्रीय बिरहा अकादमी के संस्थापक अध्यक्ष

डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ केवल एक लोकगायक और शोधकर्ता ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति के सच्चे संरक्षक भी हैं। उन्होंने बिना किसी सरकारी आर्थिक सहयोग के अपनी निजी भूमि पर ‘राष्ट्रीय बिरहा अकादमी परिसर’ का निर्माण कराया है। यह परिसर आज भोजपुरी और पूर्वांचल की लोक परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

वे यहां कुल 51 लोक विधाओं का निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। उनका उद्देश्य केवल कलाकार तैयार करना नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की उस अमूल्य विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, जो तेजी से आधुनिकता की दौड़ में कहीं खोती जा रही है।

बिरहा, कजरी, चैता, लोरिकी, चन्दैनी और आल्हा जैसी लोकप्रिय विधाओं के साथ-साथ अनेक दुर्लभ लोक शैलियों का प्रशिक्षण भी यहां दिया जाता है। विशेष बात यह है कि इस अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता।

आज जब अधिकांश सांस्कृतिक संस्थान सरकारी अनुदान और परियोजनाओं पर निर्भर हैं, ऐसे समय में अपनी निजी भूमि पर लोक संस्कृति के लिए एक समर्पित परिसर का निर्माण करना उनकी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता और लोकधर्मिता का अद्वितीय उदाहरण है। राष्ट्रीय बिरहा अकादमी केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि भोजपुरी लोक संस्कृति की जीवंत पाठशाला बन चुकी है, जहां परंपरा और भविष्य का सुंदर संगम दिखाई देता है।

लोक कलाकार होने के साथ-साथ डॉ. मन्नू यादव एक शिक्षाविद भी हैं। वे वर्तमान में मिर्जापुर जनपद के प्राथमिक विद्यालय सरसा, जमालपुर में प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। उनका मानना है कि यदि बच्चों को अपनी लोक संस्कृति से जोड़ दिया जाए, तो सांस्कृतिक विरासत को सहज रूप से संरक्षित किया जा सकता है।

क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?

डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ को भोजपुरी धुरंधर इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने बिरहा और कजरी जैसी लोक विधाओं को गांव की चौपाल से उठाकर शोध, साहित्य, राष्ट्रीय मंचों और विश्व समुदाय तक पहुंचाया है। उन्होंने लोकसंगीत को अकादमिक विमर्श का विषय बनाया, लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय बिरहा अकादमी की स्थापना की, 51 लोक विधाओं के निःशुल्क प्रशिक्षण की व्यवस्था की और भोजपुरी लोकधुनों को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

वे उन विरले लोक साधकों में शामिल हैं, जिन्होंने लोक और शास्त्र के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया है। भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. मन्नू यादव ‘कृष्ण’ उस लोक पुरोधा के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जीवन यात्रा भोजपुरी लोक संस्कृति को समर्पित कर दी। उनकी साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

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