भोजपुरी साहित्य के हर विधा के सजग प्रहरी हैं कनक किशोर

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Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज पढ़िए कनक किशोर के बारे में। ‘रामकहानी आपन-आपन’ जैसे ऐतिहासिक आत्मकथा-संकलन से लेकर ‘जोहार भोजपुरिया माटी’ के संपादन, कविता, आलोचना, कहानी, अनुवाद और भोजपुरी साहित्य की अमूल्य धरोहरों के संरक्षण तक, उन्होंने अपनी लेखनी और संपादकीय दृष्टि से भोजपुरी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भोजपुरी भाषा की पहचान केवल लोकगीत, बिरहा, सोहर, कजरी या नौटंकी तक सीमित नहीं रही। पिछले कुछ दशकों में इस भाषा ने गंभीर साहित्य की दुनिया में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। आत्मकथा, आलोचना, शोध, संस्मरण, ललित निबंध, कथा, कविता और साहित्यिक पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में भोजपुरी ने उल्लेखनीय विस्तार किया है। इस साहित्यिक यात्रा में कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने स्वयं लिखने के साथ-साथ पूरी पीढ़ी को लिखने की प्रेरणा दी। कनक किशोर उन्हीं विरले साहित्यकारों में शामिल हैं।

कनक किशोर केवल एक लेखक नहीं हैं। वे संपादक, कवि, आलोचक, अनुवादक, पर्यावरणविद् और साहित्यिक धरोहरों के संरक्षक भी हैं। उन्होंने भोजपुरी साहित्य को केवल नई पुस्तकें नहीं दीं, बल्कि उसकी जड़ों को भी मजबूत किया। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी साहित्य को प्रसिद्धि का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसे समाज और मातृभाषा की सेवा का साधन माना।

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साहित्यिक विरासत से मिला संस्कार, जंगलों ने सिखाई संवेदनशीलता

29 मई 1961 को बिहार के भोजपुर जिले के पीरो प्रखंड के नोनार गांव में जन्मे कनक किशोर ऐसे परिवार में पले-बढ़े, जहां साहित्य जीवन का हिस्सा था। उनके पिता स्वर्गीय चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह भोजपुरी के प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। घर में भाषा, लोकसंस्कृति और साहित्य पर होने वाली चर्चाओं ने बचपन से ही उनके भीतर रचनात्मक चेतना जगाई।

उच्च शिक्षा के बाद उन्होंने वानिकी (Forestry) में स्नातकोत्तर किया और वन विभाग में वन प्रमंडल पदाधिकारी (DFO) बने। वर्षों तक जंगलों, वन्यजीवों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े रहने के कारण प्रकृति उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गई। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में खेत, जंगल, नदी, पेड़, ऋतुएं और ग्रामीण जीवन केवल दृश्य नहीं, बल्कि जीवंत पात्र बनकर सामने आते हैं।

  जब मातृभाषा बन गई जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी

कनक किशोर ने प्रारंभिक दौर में हिन्दी और भोजपुरी दोनों भाषाओं में लेखन किया। लेकिन समय के साथ उन्हें एहसास हुआ कि भोजपुरी केवल उनकी मातृभाषा नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान भी है। इसके बाद उन्होंने लगभग पूरी तरह भोजपुरी साहित्य को समर्पित होकर काम करना शुरू किया।

उन्होंने कविता, गीत, गजल, कहानी, संस्मरण, आलोचना, कथेतर साहित्य, ललित निबंध, अनुवाद और संपादन जैसी लगभग सभी साहित्यिक विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी चर्चित पुस्तकों में ‘हरियरी रोपत हथेली’, ‘रंग-बिरंग’ (तीन खंड), ‘रामकहानी आपन-आपन’, ‘आलोचना के चौपाल’, ‘कठपुतरी’ और ‘ठाकुर जी के मठिया’ प्रमुख हैं।

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उनकी लेखनी की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहजता है। वे कठिन बातों को भी लोकभाषा की सरलता में कह देते हैं। उनकी रचनाओं में गांव की मिट्टी की महक, किसानों का संघर्ष, बदलते सामाजिक मूल्य और मानवीय संवेदनाएं पूरी आत्मीयता के साथ दिखाई देती हैं।

‘रामकहानी आपन-आपन’ ने खोला भोजपुरी साहित्य का नया अध्याय

कनक किशोर की संपादित पुस्तक ‘रामकहानी आपन-आपन’ भोजपुरी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है। यह आत्मकथात्मक लेखन का ऐसा संग्रह है जिसने भोजपुरी साहित्य में एक नई विधा को मजबूती दी।

इस पुस्तक में अनेक साहित्यकारों ने अपने जीवन के संघर्ष, अनुभव, सामाजिक बदलाव और सांस्कृतिक परिवेश को स्वयं की दृष्टि से दर्ज किया है। यह केवल संस्मरणों का संग्रह नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की बदलती तस्वीर का प्रामाणिक दस्तावेज भी है।

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आज जब क्षेत्रीय भाषाओं में आत्मकथा लेखन अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, तब यह कृति भोजपुरी साहित्य को नई दिशा देने वाली रचना के रूप में देखी जाती है।

संपादक के रूप में तैयार की नई पीढ़ी

किसी भाषा का विकास केवल लेखक नहीं करते, अच्छे संपादक भी करते हैं। कनक किशोर ने यह भूमिका भी पूरी जिम्मेदारी से निभाई। उनके संपादन में प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘जोहार भोजपुरिया माटी’ आज भोजपुरी जगत में एक सम्मानित मंच मानी जाती है।

इस पत्रिका के विशेषांकों में उन्होंने भोजपुरी साहित्य की लगभग हर विधा को स्थान दिया। आलोचना, लोकसंस्कृति, लोककला, किसान जीवन, इतिहास, संगीत और समकालीन साहित्य जैसे विषयों पर गंभीर सामग्री प्रकाशित कर उन्होंने शोधकर्ताओं और पाठकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किए।

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उन्होंने अनेक नए रचनाकारों को मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से भोजपुरी के गंभीर पाठक वर्ग का विस्तार किया।

पिता की साहित्यिक धरोहर को बचाने का ऐतिहासिक प्रयास

कनक किशोर का सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में एक है अपने पिता चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह की समस्त प्रकाशित और अप्रकाशित रचनाओं को संकलित कर रचनावली के रूप में प्रकाशित कराना।

आज जब अनेक साहित्यकारों की पांडुलिपियां समय के साथ नष्ट हो जाती हैं, ऐसे समय में यह कार्य केवल पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भोजपुरी साहित्य की विरासत को सुरक्षित रखने का ऐतिहासिक प्रयास है।

पर्यावरण और साहित्य का अद्भुत संगम

वन अधिकारी के रूप में बिताए गए वर्षों का प्रभाव उनके साहित्य पर स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी कविताओं और गद्य में प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का आधार है।

वे मानते हैं कि भाषा और पर्यावरण दोनों समाज की पहचान हैं। यदि जंगल खत्म होंगे तो संस्कृति भी कमजोर होगी और यदि मातृभाषा उपेक्षित होगी तो समाज अपनी जड़ों से कट जाएगा। यही सोच उनकी रचनाओं को अन्य साहित्यकारों से अलग पहचान देती है।

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सम्मान मिले अनेक, लेकिन लक्ष्य रहा केवल साहित्य

कनक किशोर को भारत गौरव, माटी के लाल, अक्षर सम्मान, दीप नारायण मिश्र अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मान, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन सहित अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं।

लेकिन उन्हें जानने वाले बताते हैं कि पुरस्कारों से कहीं अधिक उन्हें इस बात की खुशी होती है कि कोई युवा पहली बार भोजपुरी में कविता लिखे या कोई शोधार्थी भोजपुरी साहित्य पर गंभीर अध्ययन करे।

क्यों जरूरी हैं कनक किशोर जैसे साहित्यकार?

आज भोजपुरी विश्व के कई देशों में बोली जाती है। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग भी लगातार तेज हो रही है। ऐसे समय में भाषा को केवल भावनात्मक नारों की नहीं, बल्कि गंभीर साहित्य, शोध, संपादन और दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है।

कनक किशोर ने यही काम किया है। उन्होंने यह साबित किया कि भोजपुरी केवल मनोरंजन की भाषा नहीं, बल्कि विचार, विमर्श और बौद्धिक संवाद की भी समर्थ भाषा है। उन्होंने साहित्य की लगभग हर विधा में काम कर यह संदेश दिया कि भाषा का भविष्य तभी सुरक्षित होगा, जब उसकी जड़ों को भी मजबूत किया जाएगा और नई पीढ़ी को भी उससे जोड़ा जाएगा।

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