Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज प्रस्तुत हैं भोजपुरी भाषा-साहित्य के ऐसे मनीषी, जिनका नाम आते ही शोध, आलोचना, संगठन और साहित्यिक नेतृत्व की एक लंबी परंपरा आँखों के सामने जीवंत हो उठती है। डॉ. ब्रज भूषण मिश्र भोजपुरी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने केवल रचनाएँ नहीं लिखीं, बल्कि भोजपुरी साहित्य के इतिहास को संजोया, उसे अकादमिक आधार दिया और नई पीढ़ी के लिए ज्ञान का स्थायी भंडार तैयार किया। यही कारण है कि साहित्यिक जगत उन्हें प्रेम से ‘भोजपुरी इनसाइक्लोपीडिया’ कहता है।
लगभग पाँच दशकों से अधिक समय से वे भोजपुरी भाषा की सेवा में निरंतर सक्रिय हैं। कवि, आलोचक, संपादक, शोधकर्ता, शिक्षक, संगठनकर्ता और साहित्यिक मार्गदर्शक के रूप में उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने भोजपुरी साहित्य को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि बौद्धिक और अकादमिक आधार भी प्रदान किया। आज भोजपुरी साहित्य पर गंभीर चर्चा हो और डॉ. ब्रज भूषण मिश्र का उल्लेख न हो, यह लगभग असंभव है।
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शोध से शुरू हुआ साहित्य साधना का सफर
2 जून 1952 को बिहार के मुजफ्फरपुर में जन्मे डॉ. ब्रज भूषण मिश्र ने प्रारंभ से ही साहित्य को अपना जीवनधर्म बना लिया। उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से ‘भोजपुरी प्रबंधकाव्य : वस्तु और शिल्प’ विषय पर हिन्दी में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उस समय भोजपुरी में गंभीर अकादमिक शोध अपेक्षाकृत कम हो रहे थे। ऐसे दौर में उनका शोध भोजपुरी साहित्य को विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक पहुँचाने वाला महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध हुआ।

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उनका मानना रहा कि किसी भाषा का भविष्य केवल लोकप्रचलन से नहीं, बल्कि उसके शोध, आलोचना और प्रलेखन से तय होता है। यही सोच आगे चलकर उनकी समूची साहित्य साधना की आधारशिला बनी।
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हर विधा में रचा साहित्य, हर पीढ़ी को दिया मार्गदर्शन
डॉ. मिश्र की साहित्यिक यात्रा किसी एक विधा तक सीमित नहीं रही। कविता, ग़ज़ल, आलोचना, समीक्षा, गाथा, काव्यशास्त्र, शब्दकोश, संपादन, जनशिक्षा, अकादमिक लेखन और शोध-लगभग हर क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान है।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘दू रंग’, ‘अचके कहा गइल’, ‘महावीर जी सदा सहाय’, ‘खरकत जमीन बजरत आसमान’, ‘भोजपुरी काव्य में अलंकार-रस-छंद’, ‘कसौटी पर भोजपुरी कविता’ जैसी पुस्तकें शामिल हैं। इन कृतियों ने भोजपुरी साहित्य को नई आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान की।
हाल के वर्षों में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘भोजपुरी कविता के इतिहास’ को भोजपुरी साहित्य का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है। मैथिली भोजपुरी अकादमी द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक भोजपुरी कविता की हजारों वर्षों की यात्रा को लोककाव्य, भक्ति आंदोलन, आधुनिक चेतना और समकालीन साहित्य के संदर्भ में क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत करती है। शोधार्थियों और साहित्य के विद्यार्थियों के लिए यह पुस्तक संदर्भ ग्रंथ के रूप में तेजी से प्रतिष्ठित हो रही है।
भोजपुरी कविता के इतिहास, एक युगदृष्टा की कृति
भोजपुरी साहित्य में इतिहास लेखन का कार्य हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। विभिन्न स्रोतों में बिखरी सामग्री को एक साथ लाकर प्रमाणिक रूप में प्रस्तुत करना आसान नहीं था। डॉ. ब्रज भूषण मिश्र ने इस कठिन कार्य को अपनी पुस्तक ‘भोजपुरी कविता के इतिहास’ के माध्यम से संभव बनाया। 
इस पुस्तक में केवल कवियों की सूची नहीं है, बल्कि भोजपुरी कविता के विकासक्रम का गंभीर विश्लेषण है। इसमें लोकगीत, बिरहा, निर्गुण, भक्ति काव्य, रीति परंपरा, आधुनिक कविता और समकालीन कवियों की रचनात्मक भूमिका को ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
यह पुस्तक बताती है कि भोजपुरी कविता केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही, बल्कि उसने समाज, संस्कृति, संघर्ष, प्रवास, किसान, स्त्री और लोकजीवन की संवेदनाओं को सदैव स्वर दिया है।
संगठन निर्माण में भी रहे अग्रणी
डॉ. ब्रज भूषण मिश्र की पहचान केवल लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक सफल संगठनकर्ता के रूप में भी रही है। वे वर्षों तक अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के महामंत्री रहे और बाद में सम्मेलन के 27वें राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
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यह वही ऐतिहासिक संस्था है, जिसका नेतृत्व कभी डॉ. उदय नारायण तिवारी, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा, डॉ. विवेकी राय, डॉ. प्रभुनाथ सिंह और डॉ. रिपुसूदन श्रीवास्तव जैसे महान विद्वानों ने किया था। इस गौरवशाली परंपरा में डॉ. मिश्र का शामिल होना उनके साहित्यिक कद का प्रमाण है।
उनके अध्यक्ष बनने पर प्रसिद्ध साहित्यकार मनोज भावुक ने कहा था कि ‘डॉ. मिश्र जैसे सरल, विद्वान, कर्मठ और भोजपुरी को जीने वाले साहित्य साधक को यह दायित्व मिलना भोजपुरी के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करता है।’
नई पीढ़ी के लिए ज्ञान का खुला विश्वविद्यालय
डॉ. मिश्र को ‘भोजपुरी इनसाइक्लोपीडिया’ यूँ ही नहीं कहा जाता। भोजपुरी साहित्य का ऐसा शायद ही कोई पक्ष हो जिस पर उन्होंने अध्ययन, लेखन या संपादन न किया हो। नई पीढ़ी के शोधार्थियों के लिए वे चलते-फिरते पुस्तकालय की तरह हैं।

भोजपुरी लोकगीत के परियोजना पर काम करे वाला शोधकर्ताओं के साथ
उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, सैकड़ों लेखकों को मंच दिया और भोजपुरी साहित्य को नई प्रतिभाएँ प्रदान कीं। उनका विश्वास रहा कि भाषा का विकास तभी संभव है, जब वरिष्ठ पीढ़ी नए रचनाकारों को अवसर और मार्गदर्शन दोनों दे।
आज भी देशभर में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठियों, विश्वविद्यालयों और अकादमिक मंचों पर उनकी उपस्थिति शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनती है।
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भोजपुरी धरोहर के सजग प्रहरी
डॉ. ब्रज भूषण मिश्र का पूरा जीवन इस विचार का उदाहरण है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक स्मृति होती है। उन्होंने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग का लगातार समर्थन किया और यह भी कहा कि भोजपुरी का भविष्य उसके साहित्य, शिक्षा और वैश्विक विस्तार से जुड़ा हुआ है।

नेपाल में नेपाल भोजपुरी फाउंडेशन द्वारा सम्मानित होते हुए।
उनकी रचनाएँ, शोध और संगठनात्मक कार्य यह सिद्ध करते हैं कि उन्होंने भोजपुरी साहित्य को केवल समृद्ध नहीं किया, बल्कि उसे राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने का भी महत्वपूर्ण प्रयास किया।
आज जब भोजपुरी डिजिटल युग में तेजी से आगे बढ़ रही है, तब डॉ. ब्रज भूषण मिश्र जैसे साहित्यपुरुषों का योगदान और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनकी लेखनी आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक है और उनका व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि समर्पण, अध्ययन और निरंतर साधना किसी भी भाषा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है।


डॉ० ब्रजभूषण मिश्र जी का भोजपुरी भाषा के साहित्य के क्षेत्र में किया गया कार्य प्रेरणास्पद है। भोजपुरी भाषा की प्रतिष्ठा-वृद्धि और साहित्य की समृद्धि में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है।
सार्थक प्रस्तुति के लिए भोजपुरी-२४ के दल को धन्यवाद!