विश्व मंच पर बुलंद भोजपुरी, संविधान में अब भी क्यों नहीं मिली जगह?

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– डॉ. संतोष पटेल, अध्यक्ष, भोजपुरी जन जागरण अभियान, नई दिल्ली

भोजपुरी भाषा केवल एक बोली नहीं, बल्कि पांच करोड़ ( सरकारी आंकड़े से) जबकि सच्चाई यह है कि भोजपुरी भाषी 20-25 करोड़ से अधिक लोगों की जीवंत संस्कृति, अस्मिता और संवेदनाओं का संवाहक है। आज जब दुनिया भर में वैश्वीकरण और बड़े मीडिया तंत्रों के दबाव में अनेक भाषाई विविधताएँ सिमट रही हैं, भोजपुरी अपनी सिनेमाई शक्ति, इंटरनेट पर बढ़ती उपस्थिति और प्रवासी समुदायों के जुड़ाव के कारण एक प्रतिरोधी और सशक्त भाषा के रूप में उभरी है।
शिकागो विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर व्हिटनी कॉक्स ने अपनी पुस्तक ‘Language: Key Concepts of Modern Indian Studies’ में रेखांकित किया है कि कैसे वैश्विक पूंजीवाद के युग में भोजपुरी सिनेमा और इंटरनेट के माध्यम से भोजपुरी ने अपनी एक विशिष्ट वैश्विक पहचान बनाई है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और जन-जागरण

भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के आंदोलन की जड़ें आज़ादी से पूर्व के नव-जागरण काल में निहित हैं। 1930 के दशक से ही महापंडित राहुल सांकृत्यायन, पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी, डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल और डॉ. उदय नारायण तिवारी जैसे मनीषियों ने भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण का बीड़ा उठाया था। 1947 में सिवान में आयोजित पहला ‘भोजपुरी प्रांतीय साहित्य सम्मेलन’ इस दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर था। उस दौर में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन और मातृभाषा में शिक्षा की मांग जोर पकड़ रही थी।

प्रो. पपिया घोष के अनुसार, भोजपुरी का यह आंदोलन मूलतः एक गैर-राजनीतिक और सांस्कृतिक आन्दोलन रहा है। समय के साथ इसने विभिन्न मंचों से अपनी बात रखी, जिसमें ‘अखिल भोजपुरी प्रांतीय साहित्य सम्मेलन’ से लेकर वर्तमान ‘भोजपुरी जन जागरण अभियान’ तक की एक लंबी यात्रा शामिल है।

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संवैधानिक मान्यता का पेच: कमिटी बनाम वास्तविकता

संवैधानिक मान्यता की मांग एक ऐसी पहेली बन गई है, जिसमें सरकारें कमिटी पर कमिटी बनाती रही हैं। 1996 की अशोक पावहा कमिटी हो या 2003 की सीताकान्त महापात्रा कमिटी, दोनों की सिफारिशों के बावजूद भोजपुरी आज भी संविधान की आठवीं अनुसूची से बाहर है।
तर्क यह दिया जाता है कि भाषा और बोली के बीच का अंतर स्पष्ट करना कठिन है। लेकिन भारत के भाषाई इतिहास को देखें तो 1967 में सिंधी, 1992 में कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली और 2004 में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को मान्यता देते समय किसी भी जटिल मापदंड की बाधा नहीं आई थी। फिर भोजपुरी के साथ यह दोहरी नीति क्यों? भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पास 38 भाषाओं के प्रस्ताव लंबित हैं, जिसमें भोजपुरी की दावेदारी सबसे मजबूत है।

क्या भोजपुरी हिंदी के विस्तार का साधन है?

जनगणना के आंकड़ों पर गौर करें तो 2001 से 2011 के बीच भोजपुरी भाषियों की संख्या में लगभग 1.27 करोड़ की वृद्धि हुई है। 2011 की रपट के अनुसार, 5 करोड़ से अधिक लोग भोजपुरी बोलते हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या का 4.18% है। यह संख्या कई ऐसी भाषाओं से अधिक है जो पहले से ही आठवीं अनुसूची में शामिल हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या भोजपुरी को केवल हिंदी का एक उप-संस्थान या उसका विस्तार मात्र मानकर उसे संवैधानिक उपेक्षा का शिकार बनाया जा रहा है? यदि राजस्थानी जैसी भाषाओं को और मैथिली जैसी क्षेत्र आधारित भाषाओं को संवैधानिक सम्मान मिल सकता है, तो भोजपुरी के साथ यह ‘संवैधानिक छुआछूत’ क्यों है?

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वैश्विक परिप्रेक्ष्य और सॉफ्ट पावर

भोजपुरी की ताकत केवल भारत तक सीमित नहीं है। 1834 के बाद से गिरमिटिया मजदूरों के साथ यह भाषा मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो, गयाना और फिजी जैसे देशों तक पहुँची। मॉरीशस की ‘गीत गवाई’ को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में जगह मिली है, जो भोजपुरी की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। जब कोई भाषा देश की सीमाओं को पार कर अन्य देशों में भी प्रमुखता से बोली जाती है, तो वह भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का बड़ा हिस्सा बन जाती है।

हाल ही में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक नए मापदंड की ओर इशारा किया है- ‘ऐसी कोई भाषा जो भारत के अलावा अन्य देशों में प्रमुखता से बोली जाती हो और वहाँ उसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो, तो उसे आठवीं अनुसूची में प्राथमिकता दी जाएगी।’ यदि इस मापदंड को आधार माना जाए, तो भोजपुरी पूर्णतः योग्य है।

उम्मीद और भविष्य की दिशा

आज के दौर में भोजपुरी केवल ‘लोक’ की भाषा नहीं, बल्कि बाजार, डिजिटल माध्यम और सिनेमा की बड़ी शक्ति बन चुकी है। 19 प्राइवेट मेंबर बिल संसद में लाए गए, लेकिन नतीजा अभी भी प्रतीक्षित है। आंदोलनकारियों और भाषा प्रेमियों का मानना है कि यदि 2021 की जनगणना के आंकड़े और अधिक प्रभावी रूप से सामने आते हैं, तो सरकार को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना ही होगा।
भोजपुरी की लड़ाई हार और जीत की नहीं, बल्कि अपनी पहचान और सम्मान को अक्षुण्ण रखने की है। संविधान के अनुच्छेद 347 के तहत भाषा को वह स्थान मिलना चाहिए जिसकी वह हकदार है। भोजपुरी भाषी समाज अपनी माई-भाषा के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरूक है और उसे विश्वास है कि लोकतंत्र में जन-आकांक्षाओं की जीत देर-सबेर अवश्य होती है। भोजपुरी का संवैधानिक समावेश भारत की भाषाई विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों को ही सुदृढ़ करेगा।

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