एक व्रत, सभी एकादशियों का पुण्य; जानिए भीमसेन से जुड़ी कथा और धार्मिक महत्व

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गोरखपुर के ज्योतिषाचार्य शशांक शास्त्री के अनुसार, निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, दान, सेवा और भगवान विष्णु की भक्ति का महापर्व है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करने से वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। वर्ष भर आने वाली 24 एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का विशेष स्थान है। इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस व्रत को अत्यंत फलदायी और मोक्षदायक माना गया है।

गर्ग संहिता में बताया गया है व्रत का महत्व

धार्मिक ग्रंथ गर्ग संहिता में निर्जला एकादशी के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि प्रभास, कुरुक्षेत्र, केदारनाथ, बदरीनाथ, काशी और सूकरक्षेत्र जैसे पवित्र तीर्थों में सूर्य या चंद्र ग्रहण के अवसर पर किए गए दान का पुण्य भी एकादशी व्रत की महिमा के सामने बहुत छोटा है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की उपासना, उपवास और रात्रि जागरण करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा साधक को आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

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भीमसेन से जुड़ी है निर्जला एकादशी की कथा

महाभारत के अनुसार पांडवों में भीमसेन अत्यंत बलशाली थे, लेकिन उन्हें अत्यधिक भूख लगती थी। इसलिए वे अन्य एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा जिससे सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो सके।

तब वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन जल का भी त्याग कर निर्जल व्रत रखने का उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि यदि इस एक दिन का व्रत पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ किया जाए, तो वर्ष भर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। इसी कारण यह व्रत भीमसेनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कैसे करें निर्जला एकादशी का व्रत?

धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रती को दशमी तिथि से ही सात्विक भोजन करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान श्रीविष्णु की पूजा करें और यथाशक्ति निर्जल व्रत रखें। दिनभर विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता तथा ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है। रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण करने की भी परंपरा है।

द्वादशी तिथि को स्नान के बाद विधिपूर्वक पारण करें तथा ब्राह्मण, गौ और जरूरतमंद लोगों को यथाशक्ति दान दें। इस दिन जल से भरा कलश, छाता, पंखा, वस्त्र, फल और अन्न का दान विशेष पुण्यदायक माना गया है।

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स्वास्थ्य का भी रखें ध्यान

धर्मशास्त्रों में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है, लेकिन स्वास्थ्य को भी समान रूप से आवश्यक माना गया है। यदि किसी व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य या चिकित्सकीय स्थिति ऐसी है कि वह निर्जल व्रत नहीं रख सकता, तो उसे अपने गुरु, आचार्य या चिकित्सक की सलाह लेकर फलाहार अथवा जल ग्रहण करना चाहिए। सनातन धर्म का मूल संदेश है ‘आत्म रक्षा परमो धर्मः’, अर्थात शरीर की रक्षा करना भी सर्वोच्च धर्म है।

आस्था और आत्मसंयम का पर्व

पद्मपुराण में कहा गया है कि जो श्रद्धालु विधिपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे सभी एकादशियों के व्रत के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह पर्व केवल उपवास का नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा, दान और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का भी संदेश देता है। यही कारण है कि देशभर में लाखों श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर सुख, समृद्धि और मोक्ष की कामना करते हैं। (संदर्भ: गर्ग संहिता, पद्मपुराण, महाभारत, विष्णु पुराण एवं पारंपरिक धर्मशास्त्रीय मान्यताएं)

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