भोजपुर की पिड़िया पेंटिंग को मिला GI टैग, भोजपुरी लोककला को मिली नई पहचान

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आरा/भोजपुरी24 डेस्क। बिहार के भोजपुर जिले की पारंपरिक पिड़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिलने से पूरे भोजपुरी अंचल में खुशी की लहर है। सदियों पुरानी इस लोककला को अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान मिल गई है। कला और संस्कृति से जुड़े लोगों का मानना है कि यह उपलब्धि न केवल भोजपुरी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को मजबूती देगी, बल्कि स्थानीय कलाकारों के लिए नए अवसर भी लेकर आएगी।

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पिड़िया पेंटिंग का संबंध भोजपुर क्षेत्र में मनाए जाने वाले पिड़िया पर्व से है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और पारिवारिक रिश्तों का प्रतीक माना जाता है। लोक परंपरा के अनुसार गोवर्धन पूजा के बाद इस पर्व की शुरुआत होती है और लगभग एक माह तक इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां चलती हैं। इस दौरान महिलाएं और युवतियां घरों की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक शैली में चित्र बनाती हैं। इन चित्रों में लोकजीवन, देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, प्रकृति और सामाजिक संबंधों के विभिन्न स्वरूप दिखाई देते हैं।

लोकजीवन और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज

पिड़िया पेंटिंग केवल एक कला नहीं, बल्कि भोजपुर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का जीवंत दस्तावेज है। इसमें ग्रामीण जीवन की झलक, पारिवारिक मूल्यों और लोक आस्थाओं को बेहद सहज रूप में चित्रित किया जाता है। समय के साथ आधुनिकता के प्रभाव से कई पारंपरिक कलाएं विलुप्त होने लगीं, लेकिन पिड़िया पेंटिंग आज भी गांवों में अपनी मौलिकता के साथ जीवित है। यही कारण है कि इस कला को संरक्षित करने और व्यापक पहचान दिलाने की मांग लंबे समय से उठ रही थी।

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GI टैग से कलाकारों को मिलेगा लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने के बाद पिड़िया पेंटिंग को कानूनी संरक्षण मिलेगा और इसकी मौलिकता सुरक्षित रहेगी। इससे स्थानीय कलाकारों को अपने उत्पादों के बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी। साथ ही, देश-विदेश में इस कला की मांग बढ़ने से रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। कला प्रेमियों का कहना है कि GI टैग भोजपुरी अंचल की सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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भोजपुरी संस्कृति के लिए गर्व का क्षण

पिड़िया पेंटिंग को GI टैग मिलना भोजपुरी समाज के लिए गर्व का विषय है। यह उपलब्धि बताती है कि भोजपुरी क्षेत्र केवल भाषा और लोकगीतों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध लोककलाओं के लिए भी विशेष पहचान रखता है। सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि इस मान्यता से नई पीढ़ी का रुझान अपनी पारंपरिक कलाओं और विरासत की ओर बढ़ेगा। साथ ही, यह कदम भोजपुरी संस्कृति को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर और अधिक सम्मान दिलाने में सहायक होगा।

भोजपुर की पिड़िया पेंटिंग को मिला यह सम्मान भारतीय लोककलाओं की समृद्ध परंपरा और भोजपुरी संस्कृति की जीवंतता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। आने वाले समय में यह कला न केवल दीवारों पर, बल्कि देश-दुनिया के सांस्कृतिक मंचों पर भी अपनी अलग पहचान बनाएगी।

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