GI टैग से चमकी बिहार की सांस्कृतिक विरासत, तीन नई कलाओं को मिली वैश्विक पहचान

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700 से अधिक GI उत्पादों वाले भारत में बिहार की हिस्सेदारी बढ़ी, बावन बूटी, पत्थरकट्टी और पिड़िया पेंटिंग बनीं नई पहचान। पढ़ें Bhojpuri24.com में पल्ल्वी कश्यप की विशेष रिपोर्ट

पटना: बिहार एक ऐसा राज्य है जिसकी पहचान केवल उसके राजनीतिक इतिहास, प्राचीन विश्वविद्यालयों या धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है। यह राज्य सदियों से कला, संस्कृति, शिल्प और लोक परंपराओं का भी एक विशाल केंद्र रहा है। यहां की मिट्टी में इतिहास बसता है, यहां के गांवों में परंपराएं सांस लेती हैं और यहां के कारीगरों के हाथों में सदियों पुरानी विरासत जीवित रहती है।

इसी सांस्कृतिक समृद्धि को एक नई पहचान तब मिली जब नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला और भोजपुर की पिड़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया। यह उपलब्धि केवल तीन उत्पादों या कलाओं को मिला एक कानूनी दर्जा नहीं है, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक अस्मिता, लोककला और कारीगर समुदाय की मेहनत का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बिहार की पारंपरिक कलाओं को वैश्विक मंच पर स्थापित करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे न केवल इन कलाओं का संरक्षण होगा बल्कि हजारों कलाकारों और कारीगरों के जीवन में आर्थिक बदलाव की नई संभावनाएं भी पैदा होंगी।

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GI टैग क्या है और इसका महत्व क्यों बढ़ रहा है?
वैश्वीकरण के दौर में जब बाजारों में एक जैसे उत्पादों की भरमार है, तब किसी उत्पाद की विशिष्ट पहचान बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे समय में GI टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के आधार पर कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।

GI अर्थात Geographical Indication एक ऐसा प्रमाणपत्र है जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई विशेष उत्पाद किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ा हुआ है और उसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषता उसी क्षेत्र के कारण है।

जब किसी उत्पाद को GI टैग मिलता है, तब उस नाम का उपयोग केवल उसी क्षेत्र के उत्पादक कर सकते हैं। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है और असली कारीगरों को उचित पहचान तथा आर्थिक लाभ मिलता है।

भारत में दार्जिलिंग चाय, बनारसी साड़ी, कांचीपुरम सिल्क, कश्मीर केसर और मैसूर सिल्क जैसे कई प्रसिद्ध उत्पाद GI टैग प्राप्त कर चुके हैं। अब बिहार की तीन नई धरोहरें भी इस सूची में शामिल हो गई हैं।

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नालंदा की बावन बूटी, करघे पर बुनी गई सभ्यता

नालंदा का नाम सुनते ही विश्वविख्यात प्राचीन विश्वविद्यालय और बौद्ध संस्कृति की याद आती है। लेकिन अब नालंदा की पहचान उसकी अनूठी वस्त्र कला ‘बावन बूटी’ से भी जुड़ चुकी है। बावन बूटी वस्त्रकला बिहार की सबसे विशिष्ट बुनाई परंपराओं में से एक मानी जाती है। इसमें कपड़े पर 52 प्रकार की छोटी-छोटी आकृतियां या डिजाइन बुनी जाती हैं। यही कारण है कि इसे ‘बावन बूटी’ कहा जाता है। इस कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके डिजाइनों में बिहार की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत झलकती है। धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, कमल, मछली, स्तूप और अन्य पारंपरिक प्रतीक इस कला की पहचान हैं।
नालंदा जिले के बसवन बिगहा और आसपास के गांवों में यह कला पीढ़ियों से जीवित है। यहां के बुनकर अपने हाथों से महीनों की मेहनत करके एक साड़ी या वस्त्र तैयार करते हैं।
हालांकि पिछले कुछ दशकों में मशीन से बने सस्ते कपड़ों और बाजार की बदलती मांग के कारण इस कला पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। युवा पीढ़ी भी इस पेशे से दूर होती जा रही थी क्योंकि मेहनत अधिक और आय अपेक्षाकृत कम थी। GI टैग मिलने के बाद अब उम्मीद है कि बावन बूटी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी। इससे बुनकरों को बेहतर मूल्य प्राप्त होगा और इस पारंपरिक कला का भविष्य अधिक सुरक्षित हो सकेगा।

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गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला, पत्थरों में जीवंत होती आस्था

यदि कोई व्यक्ति गया जिले के पत्थरकट्टी गांव में जाए तो उसे महसूस होगा कि यहां पत्थर केवल पत्थर नहीं हैं, बल्कि उनमें कला, श्रद्धा और इतिहास की सांसें बसती हैं। पत्थरकट्टी शिल्पकला बिहार की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित शिल्प परंपराओं में से एक है। यहां विशेष प्रकार के काले ग्रेनाइट पत्थरों पर अत्यंत बारीक नक्काशी की जाती है।
माना जाता है कि कई शताब्दियों पहले राजस्थान से आए मूर्तिकारों ने इस कला की नींव रखी थी। समय के साथ यह गांव मूर्तिकला का एक प्रमुख केंद्र बन गया। यहां भगवान बुद्ध, गणेश, विष्णु, दुर्गा, शिव और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां तैयार की जाती हैं। इन मूर्तियों की मांग केवल बिहार या भारत तक सीमित नहीं है बल्कि विदेशों तक पहुंचती है। एक मूर्ति को तैयार करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है। सबसे पहले पत्थर का चयन किया जाता है। इसके बाद उसे काटकर प्रारंभिक आकार दिया जाता है। फिर महीनों तक हथौड़ी और छेनी की सहायता से बारीक नक्काशी की जाती है। अंत में पॉलिशिंग और अंतिम सज्जा का कार्य होता है।
कारीगर बताते हैं कि कई बार एक बड़ी प्रतिमा को पूरा करने में छह महीने से लेकर एक वर्ष तक का समय लग जाता है। आज आधुनिक मशीनों के युग में भी यहां के कलाकार पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करते हैं। यही कारण है कि उनकी कृतियों में मानवीय स्पर्श और कलात्मक गहराई दिखाई देती है।
GI टैग मिलने से इस शिल्पकला को एक नई पहचान मिली है। इससे विदेशी बाजारों में मांग बढ़ने की संभावना है और स्थानीय कारीगरों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।

भोजपुर की पिड़िया पेंटिंग, लोकजीवन का रंगीन दस्तावेज

जब बिहार की लोककलाओं की चर्चा होती है तो अक्सर मधुबनी पेंटिंग का नाम सामने आता है। लेकिन भोजपुर क्षेत्र की पिड़िया पेंटिंग भी उतनी ही समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कला है। पिड़िया पेंटिंग मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाओं द्वारा बनाई जाती है। यह कला लोक परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। गांवों में त्योहारों, विवाह समारोहों और विशेष धार्मिक अवसरों पर महिलाएं दीवारों, आंगनों और पूजा स्थलों पर पिड़िया चित्र बनाती हैं।
इन चित्रों में प्रकृति, पशु-पक्षी, देवी-देवता, सूर्य, चंद्रमा और ग्रामीण जीवन के विभिन्न दृश्य दर्शाए जाते हैं। रंगों के लिए पारंपरिक प्राकृतिक साधनों का उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार पिड़िया पेंटिंग केवल कला नहीं बल्कि लोक समाज का सांस्कृतिक अभिलेख है। इसके माध्यम से पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं और सामाजिक मूल्य सुरक्षित रहे हैं। GI टैग मिलने से इस कला को वह पहचान मिली है जिसकी वह लंबे समय से हकदार थी। इससे महिला कलाकारों को नया मंच मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है।

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बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

किसी भी राज्य की सांस्कृतिक पहचान उसके आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज दुनिया भर में हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। लोग मशीनों से बने सामानों की तुलना में हस्तनिर्मित और सांस्कृतिक महत्व वाले उत्पादों को अधिक महत्व देने लगे हैं। ऐसे में GI टैग प्राप्त उत्पाद वैश्विक बाजार में विशेष आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। बिहार के हजारों परिवार सीधे तौर पर इन कलाओं से जुड़े हुए हैं। यदि सरकार, निजी क्षेत्र और निर्यात एजेंसियां मिलकर उचित विपणन रणनीति अपनाएं तो इन उत्पादों का कारोबार कई गुना बढ़ सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा, पलायन कम होगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

पर्यटन को भी मिलेगा लाभ

GI टैग का प्रभाव केवल उत्पादों तक सीमित नहीं रहता। यह पर्यटन को भी बढ़ावा देता है। नालंदा आने वाले पर्यटक अब बावन बूटी बुनाई केंद्रों को देखने में रुचि दिखा सकते हैं। गया आने वाले श्रद्धालु पत्थरकट्टी गांव की शिल्प परंपरा को नजदीक से देख सकते हैं। वहीं भोजपुर क्षेत्र की पिड़िया पेंटिंग सांस्कृतिक पर्यटन का नया आकर्षण बन सकती है। यदि इन स्थानों को पर्यटन मानचित्र पर प्रभावी ढंग से विकसित किया जाए तो स्थानीय लोगों के लिए आय के नए स्रोत पैदा हो सकते हैं।

चुनौतियां अभी भी बरकरार

हालांकि GI टैग एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन केवल टैग मिलने भर से समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं। कारीगरों को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें आधुनिक बाजार तक पहुंच, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी, वित्तीय सहायता की कमी और युवा पीढ़ी की घटती रुचि प्रमुख हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन कलाओं को वास्तव में वैश्विक स्तर पर स्थापित करना है तो प्रशिक्षण, विपणन और तकनीकी सहायता पर विशेष ध्यान देना होगा।

बिहार की बदलती पहचान

एक समय था जब बिहार को केवल पिछड़ेपन और पलायन के संदर्भ में देखा जाता था। लेकिन आज स्थिति बदल रही है। मखाना, शाही लीची, जर्दालु आम, कतरनी चावल, सिलाव खाजा और मधुबनी पेंटिंग जैसे उत्पाद पहले ही बिहार को नई पहचान दिला चुके हैं। अब बावन बूटी, पत्थरकट्टी शिल्पकला और पिड़िया पेंटिंग का GI टैग प्राप्त करना इस बात का प्रमाण है कि बिहार की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक विरासत और लोककला में निहित है।

बिहार के GI टैग प्राप्त प्रमुख उत्पाद
कृषि एवं खाद्य उत्पाद
शाही लीची (मुजफ्फरपुर)
जर्दालु आम (भागलपुर)
कतरनी चावल (भागलपुर-बांका)
मगही पान
मखाना
सिलाव का खाजा

हस्तशिल्प एवं कला
मधुबनी पेंटिंग
सिक्की घास शिल्प
मंजूषा कला
बावन बूटी
पत्थरकट्टी शिल्पकला
पिड़िया पेंटिंग

सर्वाधिक GI टैग वाले राज्य
राज्य GI उत्पाद
उत्तर प्रदेश    80+
तमिलनाडु     70+
कर्नाटक       60+
महाराष्ट्र       50+
पश्चिम बंगाल  30+
बिहार       20+

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