पटना/गोरखपुर: भोजपुरी अंचल की मिट्टी में जितनी गहराई है, उतनी ही उसकी परंपराओं में आत्मीयता और सौंदर्य भी समाया हुआ है। इन्हीं परंपराओं में एक अनूठी और कम चर्चित लोककला है पिड़िया। यह सिर्फ एक व्रत या रस्म नहीं, बल्कि बहनों के स्नेह, विश्वास और कलात्मक अभिव्यक्ति का ऐसा संगम है, जो पीढ़ियों से गांवों की दीवारों पर जीवित है। पिड़िया की परंपरा का कोई लिखित, औपचारिक इतिहास भले उपलब्ध न हो, लेकिन इसकी जड़ें भारतीय लोकजीवन की बेहद प्राचीन परंपराओं में गहराई तक समाई हुई हैं। विशेष रूप से भोजपुरी क्षेत्र बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुछ हिस्सों में यह परंपरा सदियों से मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। कई स्थानों पर पिड़िया को लोकदेवियों या गृहदेवता की कृपा से भी जोड़ा जाता है। दीवार पर बनाए गए चित्रों को केवल कला नहीं, बल्कि एक प्रकार का आमंत्रण और पूजन स्थल माना जाता है, जहां सकारात्मक ऊर्जा और आशीर्वाद का वास होता है।
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व्रत, कला और भावनाओं का संगम
पिड़िया को आप भोजपुरी लोकचित्रकला का एक जीवंत रूप कह सकते हैं। यह परंपरा मुख्य रूप से बहनों द्वारा अपने भाइयों की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए निभाई जाती है। लगभग 16 दिनों तक चलने वाली इस प्रक्रिया में रोजाना गोबर से पांच पिड़िया (छोटे गोल आकार) बनाकर दीवार पर चिपकाई जाती हैं। इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि पिड़िया की संख्या भाईयों की संख्या के अनुसार तय होती है यानी जितने भाई, उतनी पिड़िया। यह गणना भी इस परंपरा को व्यक्तिगत और भावनात्मक बना देती है।

स्त्री-शक्ति और व्रत परंपरा
भारतीय संस्कृति में व्रत और अनुष्ठानों के माध्यम से महिलाओं द्वारा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करना एक प्राचीन परंपरा रही है। जैसे करवा चौथ, तीज, छठ, भैया दूज, उसी क्रम में पिड़िया भी एक लोक-व्रत है, जहां बहनें अपने भाई की लंबी आयु और रक्षा के लिए तप, संयम और श्रद्धा के साथ यह अनुष्ठान करती हैं। यह स्त्री-शक्ति की संरक्षक और सृजनकर्ता दोनों रूपों को दर्शाता है। पिड़िया सिर्फ एक दिन का अनुष्ठान नहीं, बल्कि लगातार 16 दिनों तक चलने वाली एक सुसंगठित और भावनात्मक प्रक्रिया है। हर दिन का अपना महत्व, नियम और सांस्कृतिक अर्थ होता है। आइए इसे दिन-दर-दिन समझते हैं-

दिन 1: शुरुआत (आरंभ का संकल्प)
पहले दिन बहनें स्नान-ध्यान के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं। दीवार को साफ करके गोबर से पहली बार पिड़िया (छोटे गोल आकार) चिपकाई जाती है। इसी दिन से गीत-गवनई की शुरुआत होती है।
दिन 2 से 5: निरंतरता और समर्पण
इन दिनों हर रोज़ पांच-पांच पिड़िया बनाई और दीवार पर लगाई जाती हैं। बहनें समूह में इकट्ठा होकर गीत गाती हैं और माहौल धीरे-धीरे उत्सवमय होने लगता है।
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दिन 6 से 10: कला का विस्तार
अब दीवार पर पिड़िया की संख्या बढ़ने लगती है और साथ ही चित्रांकन भी शुरू हो जाता है। चावल के घोल से रेखाएं बनाई जाती हैं और पारंपरिक आकृतियां उभरने लगती हैं।
दिन 11 से 13: भावनात्मक चरम
इन दिनों गीतों में भावनात्मक गहराई बढ़ जाती है। बहनें भाई के सुख, समृद्धि और लंबी उम्र के लिए विशेष गीत गाती हैं। सामूहिकता और जुड़ाव अपने चरम पर होता है।
दिन 14-15: पूर्णता की तैयारी
अब तक दीवार पूरी तरह पिड़िया और चित्रों से भर जाती है। अंतिम रूप दिया जाता है—डिज़ाइन को सजाया जाता है, आकृतियों को स्पष्ट किया जाता है और माहौल पूरी तरह उत्सव में बदल जाता है।
दिन 16: सोरहइया पिड़िया (समापन और उत्सव)
यह सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन विशेष ‘सोरहइया पिड़िया’ लगाई जाती है। गीत, संगीत और उत्सव के साथ व्रत का समापन होता है। बहनें भाई की लंबी आयु के लिए आशीर्वाद देती हैं और यह परंपरा पूर्ण होती है।
गीतों में झलकता स्नेह और संवाद
पिड़िया की सबसे मोहक विशेषता है इसके साथ गाए जाने वाले लोकगीत। बहनें समूह में बैठकर गीत गाती हैं, जिनमें भाई के प्रति प्रेम, अपेक्षा और आशीर्वाद झलकता है।
बहन का स्नेह-
भुखल बाड़ी कवन हो बहिनी,
पिड़िया हो बरतियां।
ले आवS अपन हो भईआ,
गुड़हा हो मिठाईयां।।
भाई का सादगी भरा जवाब-
काहे के भुखलु हो बहीनी,
पिड़िया हो बरतियां।
काहावा से लईबो हो बहीनी,
गुड़हा हो मिठाईयां।।
ये गीत सिर्फ संवाद नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास और ग्रामीण जीवन की सहजता का दस्तावेज हैं।
सोरहइया पिड़िया के दिन माहौल पूरी तरह उत्सव में बदल जाता है। गीत, संगीत और रंगों के बीच यह परंपरा अपने चरम पर पहुंचती है। इसी दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र के लिए यह आशीष गाती हैं-
कवन भईआ चलेले अहेरीआ,
कवन बहिनी देली आशिष हो ना।
जिअसS ओ मोरे भईआ,
जिअS भईआ लाखो बरिस हो ना।।
गोबर से कैनवास तक भाई बहन के प्रेम तक
पिड़िया सिर्फ धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक विकसित और समृद्ध कला पद्धति भी है, जिसकी तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है। इसके लिए सबसे पहले दीवार को सेम के पत्तों के लेप से तैयार किया जाता है, ताकि चित्रांकन के लिए एक मजबूत और चिकना आधार मिल सके। इसके बाद चावल को बारीक पीसकर सफेद रंग तैयार किया जाता है, जो इस लोकचित्रकला की मुख्य पहचान होता है। चित्र बनाने के लिए बांस की पतली कुची यानी पारंपरिक ब्रश का उपयोग किया जाता है, जिससे कलाकार महिलाएं बेहद सूक्ष्म और सुंदर आकृतियां उकेरती हैं।

कृषि संस्कृति और लोकजीवन का प्रभाव
पिड़िया की संरचना और इसमें उपयोग होने वाली सामग्री जैसे गोबर, चावल, पत्तों का लेप यह स्पष्ट संकेत देती है कि यह परंपरा पूरी तरह कृषि आधारित जीवनशैली से जुड़ी हुई है। गांवों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए कला और आस्था का यह संगम तैयार हुआ। चित्रों में उकेरे गए उपकरण ढेंकुल, जांत, ओखली, सिलबट्टा भी उसी कृषि और घरेलू जीवन के प्रतीक हैं।इन चित्रों में ग्रामीण जीवन के लगभग हर पहलू को स्थान मिलता है ढेंकुल, जांत, ओखली, सिलबट्टा, पालकी, चिड़िया, इंसान, डलिया, मउनी यानी पूरा लोकजीवन इन दीवारों पर जीवंत हो उठता है, मानो गांव की सांसें ही इन आकृतियों में बस गई हों।
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मान्यताएं और रहस्यमय परंपरा की अपनी दुनिया
पिड़िया से जुड़ी एक रोचक और गहरी मान्यता यह है कि जिस घर में यह चित्र बनाया जाता है, वहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित माना जाता है। इसके पीछे केवल आस्था ही नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक कारण भी जुड़ा हुआ है। दरअसल, पिड़िया पूरी तरह महिलाओं द्वारा निभाई जाने वाली परंपरा है, जिसमें बहनें सामूहिक रूप से एकाग्रता, पवित्रता और भावनात्मक जुड़ाव के साथ यह व्रत करती हैं। ऐसे में पुरुषों की अनुपस्थिति इस प्रक्रिया को एक निजी, सुरक्षित और निर्बाध स्त्री-परिसर प्रदान करती है, जहां वे बिना किसी संकोच के गीत, अनुष्ठान और चित्रकला में पूरी तरह डूबी रह सकें।
साथ ही यह भी माना जाता है कि यह व्रत भाई की लंबी आयु और रक्षा से जुड़ा है, इसलिए इसकी पवित्रता बनाए रखना जरूरी है। इसी विश्वास के चलते यह धारणा बनी कि यदि कोई पुरुष इस चित्र को देख ले, तो व्रत की सिद्धि पर असर पड़ सकता है। इस तरह आस्था, अनुशासन और सामाजिक संरचना के मिश्रण से यह परंपरा और भी रहस्यमय, विशिष्ट और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बन जाती है।
पहचान की तलाश में एक लोककला
भोजपुरी अंचल के गांवों में आज भी पिड़िया अपनी पूरी मौलिकता, आत्मीयता और सांस्कृतिक गहराई के साथ जीवित है, लेकिन विडंबना यह है कि इतनी समृद्ध लोककला होने के बावजूद इसे वह व्यापक पहचान नहीं मिल सकी, जिसकी यह सच्ची हकदार है। पिड़िया केवल एक परंपरा या व्रत नहीं, बल्कि ग्रामीण स्त्रियों की सृजनशीलता, उनके संवेदनशील मन और समाज में उनकी सक्रिय भूमिका का जीवंत दस्तावेज है। दीवारों पर उकेरे गए ये चित्र दरअसल उस लोकजीवन की कहानी कहते हैं, जो किताबों में नहीं, बल्कि अनुभवों और रिश्तों में बसता है।
आज समय की मांग है कि इस अनमोल धरोहर को सिर्फ परंपरा मानकर छोड़ न दिया जाए, बल्कि इसे सम्मान और पहचान दिलाने की दिशा में ठोस पहल की जाए। सबसे पहले, पिड़िया रचने वाली महिलाओं को लोक कलाकार के रूप में सामाजिक और संस्थागत पहचान मिलनी चाहिए, ताकि उनके हुनर को उचित मंच और सम्मान प्राप्त हो सके। इसके साथ ही इस कला का व्यवस्थित डॉक्यूमेंटेशन और प्रमोशन जरूरी है चाहे वह डिजिटल प्लेटफॉर्म हो, प्रदर्शनी हो या अकादमिक अध्ययन ताकि इसकी पहुंच गांव की दीवारों से निकलकर देश-दुनिया तक हो सके।
सबसे अहम कड़ी है नई पीढ़ी। यदि बच्चों और युवाओं को इस परंपरा से जोड़ा जाएगा, उन्हें इसकी प्रक्रिया, महत्व और सौंदर्य से परिचित कराया जाएगा, तभी पिड़िया आने वाले समय में भी जीवित और प्रासंगिक बनी रह सकेगी। दरअसल, पिड़िया केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक पहचान भी बन सकती है जरूरत है तो बस इसे समझने, सहेजने और आगे बढ़ाने की।

