Bhojpuri Folk Songs: Not Just Entertainment, but Life’s Living Records भोजपुरी लोकगीत भारतीय लोकसंस्कृति की उन अमूल्य धरोहरों में से हैं, जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप में जीवित हैं। ये गीत केवल गाने भर नहीं हैं, बल्कि समाज की भावनाओं, परंपराओं और जीवन शैली का जीवंत दस्तावेज हैं।
कुशीनगर के लोकसंस्कृति विशेषज्ञ और गीतकार चंदेश्वर परवाना के अनुसार, ‘भोजपुरी लोकगीतों में वह सब कुछ है, जो किसी समाज को समझने के लिए जरूरी होता है इतिहास, रिश्ते, धर्म, संघर्ष और खुशियां।’
लोकगीतों की छह प्रमुख श्रेणियां, लोकगीतों का वैज्ञानिक वर्गीकरण
भोजपुरी लोकगीतों को व्यापक रूप से छह प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है. इसमें संस्कार, ऋतु, व्रत, देवता, जाति और श्रम संबंधी गीत हैं। यह वर्गीकरण न केवल इनके विषय को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी बताता है कि भोजपुरी समाज में हर परिस्थिति के लिए अलग-अलग गीतों की परंपरा रही है। परवाना जी कहते हैं कि यह वर्गीकरण दर्शाता है कि लोकगीत हमारे जीवन के हर पहलू से जुड़े हुए हैं।

संस्कार गीत: जन्म से विवाह तक का भावनात्मक सफर
संस्कार संबंधी गीत भोजपुरी लोकगीतों की सबसे समृद्ध श्रेणी मानी जाती है। इसमें जन्म, मुंडन और विवाह जैसे महत्वपूर्ण अवसर शामिल होते हैं। सोहर (जन्म गीत) में जहां खुशी की लहर होती है, वहीं विवाह गीतों में रस्मों की विविधता और भावनाओं का गहरा रंग दिखाई देता है। बेटी की विदाई के समय गाए जाने वाले गीतों में करुणा का चरम रूप देखने को मिलता है।

विवाह गीतों की विविधता: रस्मों का पूरा संसार
भोजपुरी विवाह गीत अपने आप में एक विस्तृत परंपरा हैं। इसमें कजरी, हिंडोला, गवना (विदाई) जैसे कई उप-गीत शामिल होते हैं। हर रस्म के लिए अलग गीत होता है हल्दी, मेहंदी, बारात आगमन, विदाई हर चरण पर संगीत का अलग रंग होता है। परवाना जी बताते हैं कि भोजपुरी विवाह गीतों में रिश्तों की मिठास और सामाजिक संरचना की झलक साफ दिखती है।
ऋतु गीत: मौसम के साथ बदलता संगीत
भोजपुरी अंचल में ऋतुओं का विशेष महत्व है और इसका प्रभाव लोकगीतों में भी दिखाई देता है। सावन-भादो में गाए जाने वाले कजरी गीत और झूले पर गाए जाने वाले हिंडोला गीत प्रकृति और प्रेम का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं। होली के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में उमंग, रंग और उत्सव की झलक मिलती है।
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व्रत और पर्व गीत: आस्था की गूंज
व्रत संबंधी गीतों में धार्मिक आस्था और लोकविश्वास की गहराई देखने को मिलती है। छठ, नाग पंचमी, गोवर्धन पूजा, हरितालिका तीज जैसे पर्वों पर विशेष गीत गाए जाते हैं। परवाना जी के अनुसार इन गीतों में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक होती है और इनके जरिए आस्था और संस्कृति का संरक्षण होता है।
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देवता संबंधी गीत यानी भक्ति और लोकविश्वास का संगम
भोजपुरी लोकगीतों में देवी-देवताओं की स्तुति का विशेष स्थान है। राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, पार्वती और हनुमान से जुड़े गीत धार्मिक चेतना को मजबूत करते हैं। ये गीत केवल पूजा का हिस्सा नहीं, बल्कि लोककथाओं और धार्मिक परंपराओं को भी जीवित रखते हैं।
जाति आधारित गीत: सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब
भोजपुरी समाज की विविधता जाति आधारित गीतों में स्पष्ट दिखाई देती है। अहीर, दुसाध, चमार, गोंड़, कहार जैसे समुदायों के अपने-अपने गीत हैं, जो उनके जीवन, पेशे और परंपराओं को दर्शाते हैं। चंदेश्वर परवाना कहते हैं कि ये गीत सामाजिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
श्रम गीत: काम को उत्सव में बदलने की कला
श्रम संबंधी गीत भोजपुरी संस्कृति की सबसे जीवंत परंपराओं में से एक हैं। रोपनी (धान रोपाई), सोहनी, जंतसार (चक्की), चरखा और कोल्हू जैसे कार्यों के दौरान गाए जाने वाले गीत श्रम को हल्का और आनंदमय बनाते हैं। इन गीतों में सामूहिकता और श्रमिक जीवन की ताकत झलकती है।
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महिलाओं की आवाज यानी लोकगीतों की आत्मा
भोजपुरी लोकगीतों की सबसे खास बात यह है कि इनमें महिलाओं की आवाज प्रमुख होती है। घर-परिवार, रिश्ते, पीड़ा, खुशी हर भावना को महिलाएं अपने गीतों के जरिए व्यक्त करती हैं। परवाना जी कहते हैं कि अगर भोजपुरी लोकगीतों को समझना है, तो महिलाओं की आवाज को समझना जरूरी है।
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परंपरा पर आधुनिकता का प्रभाव
आज के डिजिटल और फिल्मी दौर में भोजपुरी लोकगीतों की परंपरा प्रभावित हो रही है। रीमिक्स और फिल्मी गानों के बढ़ते प्रभाव के कारण पारंपरिक लोकगीत धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी का जुड़ाव भी पहले की तुलना में कम हो रहा है, जो चिंता का विषय है। भोजपुरी लोकगीतों को बचाने के लिए जरूरी है कि इन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म, शिक्षा और शोध से जोड़ा जाए। लोक कलाकारों को प्रोत्साहन और मंच देना भी बेहद जरूरी है। चंदेश्वर परवाना कहते हैं कि अगर हम इन गीतों को सही तरीके से संरक्षित करें, तो यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर बनी रहेगी।
जब तक गूंजेंगे लोकगीत, जीवित रहेगी संस्कृति
भोजपुरी लोकगीत केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का संगीत हैं। इनमें जन्म की खुशी, विवाह का उल्लास, श्रम की थकान, आस्था की शक्ति और विदाई का दर्द आदि यह सभी एक साथ समाहित है। परवाना जी के शब्दों में,’भोजपुरी लोकगीतों में हमारी संस्कृति की सांस बसती है। जब तक ये गीत गूंजते रहेंगे, तब तक हमारी पहचान भी जीवित रहेगी।’


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