पटना/गोरखपुर: 19वीं शताब्दी के अंत में पटना के एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने भोजपुरी बोलना सीख लिया। वे न सिर्फ बोलते थे, बल्कि लोकगीत संकलित करते, व्याकरण लिखते और भोजपुरी को ‘व्यावहारिक भाषा एक ऊर्जावान जाति की’ कहकर गौरवान्वित करते थे। ये थे सर जॉर्ज अब्राहम ग्रीअरसन (1851-1941) ब्रिटिश भारत के सबसे बड़े भाषाविद्, जिन्होंने लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (1903-1928) जैसे ऐतिहासिक काम का सूत्रधार बनकर भारतीय भाषाओं को वैज्ञानिक पहचान दी। लौंडा नाच 11वीं सदी में शुरू हुआ था, भिखारी ठाकुर ने पहुँचाया था जन जन तक
भोजपुरी भाषा के प्रति ग्रीअरसन का लगाव गहरा और वैज्ञानिक था। उन्होंने इसे बिहारी भाषा समूह (मैथिली, मगही और भोजपुरी) का महत्वपूर्ण अंग माना और हिंदी से पूरी तरह अलग बताया था। उनकी रचनाओं में भोजपुरी को ‘practical language of an energetic race’ कहा गया था कि ‘एक ऊर्जावान जाति की व्यावहारिक भाषा, जो परिस्थितियों के अनुकूल खुद को ढालने को सदा तैयार रहती है और जिसका प्रभाव पूरे भारत में फैला हुआ है’।
ग्रीअरसन का जीवन और भारत से लगाव
आयरलैंड में जन्मे ग्रीअरसन 1873 में भारतीय सिविल सेवा में शामिल हुए। पटना, भागलपुर और अन्य बिहार के जिलों में कलेक्टर-मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात रहे। 1880 के दशक में उन्होंने बिहार की बोलियों का गहन अध्ययन शुरू किया। 1883-1887 के बीच उन्होंने Seven Grammars of the Dialects and Subdialects of the Bihári Language लिखी। इसमें भोजपुरी का अलग से व्याकरण (Part II) शामिल था। यह भोजपुरी का पहला व्यवस्थित व्याकरण माना जाता है।
1884 में उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों का संकलन Some Bhojpuri Songs प्रकाशित किया। 1885 में Bihar Peasant Life लिखा, इसमें भोजपुरी बोलने वाले किसानों की जीवनशैली, बोली और लोककथाओं का विस्तृत वर्णन है। ग्रीअरसन ने कैथी लिपि में भोजपुरी लिखने का भी समर्थन किया था। भोजपुरी की ‘खोई हुई’ लिखावट थी कैथी और फिर धीरे धीरे मर गई
भाषा सर्वेक्षण और भोजपुरी का वैज्ञानिक वर्गीकरण
1898 में ग्रीअरसन को लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया का सुपरिंटेंडेंट बनाया गया। 11 खंडों (19 भागों) में 8,000 पृष्ठों का यह सर्वेक्षण 179 भाषाओं और 544 उपभाषाओं का अध्ययन था। इसमें खंड V, भाग II (1903) विशेष रूप से बिहारी और उड़िया भाषाओं पर केंद्रित है।
उन्होंने भोजपुरी को बिहारी समूह की ‘पूर्वी’ (Purbi) बोली माना। मगही को ‘अशुद्ध’ बताते हुए उन्होंने भोजपुरी की तुलना में इसे सरल, व्यावहारिक और अनुकूलनीय बताया था। ग्रीअरसन ने स्पष्ट किया कि बिहार की मूल भाषाएं (भोजपुरी सहित) हिंदी से उतनी ही अलग हैं जितनी फ्रेंच इटैलियन से। 1893 में एक पत्र में उन्होंने लिखा था कि ‘बिहार के हर व्यक्ति की मातृभाषा (बड़े शहरों में जन्मे-पालन-पोषण वाले को छोड़कर) हिंदी से उतनी अलग है जितनी फ्रेंच इटैलियन से। अदालती और किताबी हिंदी बिहारियों के लिए विदेशी भाषा है।’
भोजपुरी को अलग पहचान देने का महत्व करोड़ों बोलते हैं, फिर भी ‘भाषा’ नहीं भोजपुरी
ग्रीअरसन से पहले भोजपुरी को अक्सर ‘हिंदी की बोली’ या ‘पूर्वी हिंदी’ माना जाता था। उन्होंने वैज्ञानिक आधार पर इसे स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिया। लिंग्विस्टिक सर्वे में उन्होंने भोजपुरी की चार मुख्य बोलियां (उत्तरी, पश्चिमी, दक्षिणी और नागपुरिया) विस्तार से वर्णित कीं। उन्होंने भोजपुरी लोकसाहित्य को भी महत्व दिया। सोहर, कजरी, बिरहा, बारहमासा जैसे गीतों को ‘साहित्य’ का दर्जा दिया। ग्रीअरसन ने लिखा कि भोजपुरी बोलने वाली ‘ऊर्जावान जाति’ ने पूरे भारत में अपना प्रभाव फैलाया। यह टिप्पणी माइग्रेशन और भोजपुरी प्रवासियों (गिरमिटिया) की भूमिका को रेखांकित करती है।
उनकी विरासत आज भी है प्रासंगिक
ग्रीअरसन की मृत्यु 1941 में हुई, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। भोजपुरी को झारखंड में द्वितीय भाषा का दर्जा (2018), भोजपुरी अकादमियां और यूट्यूब पर लोकगीतों का प्रसार आदि में ग्रीअरसन का योगदान छिपा है। उन्होंने भोजपुरी को ‘व्यावहारिक’ बताकर किसानों-मजदूरों की भाषा को गौरवान्वित किया। आज जब माइग्रेशन, सांस्कृतिक पहचान और भाषा संरक्षण की बहस चल रही है, ग्रीअरसन की टिप्पणियां नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।

