रामायण काल से जुड़ा है दुनिया की दीवारों को रंगीन बनाने वाली मधुबनी पेंटिंग का नाता

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मान्यता है कि राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के अवसर पर मिथिला की महिलाओं को पूरे नगर को सजाने का आदेश दिया था। तभी से यह कला विवाह और शुभ अवसरों का अभिन्न हिस्सा बन गई।

अंजली पांडेय की रिपोर्ट

मधुबनी: मधुबनी पेंटिंग, जिसे मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है, बिहार के मिथिला क्षेत्र की एक ऐसी लोक कला है, जिसने मिट्टी की दीवारों से निकलकर आज वैश्विक पहचान बना ली है। यह सिर्फ चित्रकला नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था, प्रकृति और सामाजिक जीवन का जीवंत दस्तावेज है। सदियों से महिलाएं इसे अपने घरों की दीवारों पर बनाती रही हैं जहां हर रेखा एक कहानी कहती है और हर रंग एक भावना को व्यक्त करता है। मधुबनी और दरभंगा जिले के सैकड़ों गांवों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। यह किसी एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मिथिलांचल क्षेत्र के घर-घर में रची-बसी एक जीवित परंपरा है। हालांकि इसके कुछ प्रमुख केंद्र भी हैं, जहां यह कला विशेष रूप से विकसित हुई है। जितवारपुर को मधुबनी पेंटिंग का गढ़ माना जाता है, जहां से इस कला की पहचान और व्यावसायिक विस्तार को सबसे अधिक गति मिली। इसके अलावा रांटी, रसिदपुर और सौराठ जैसे गांव भी इस पारंपरिक चित्रकला के महत्वपूर्ण केंद्र हैं, जहां आज भी घरों की दीवारों और आंगनों पर पारंपरिक शैली में मधुबनी पेंटिंग देखने को मिलती है।

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रामायण काल से जुड़ी जड़ें
मधुबनी पेंटिंग का इतिहास पौराणिक काल तक जाता है। मान्यता है कि राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के अवसर पर मिथिला की महिलाओं को पूरे नगर को सजाने का आदेश दिया था। तभी से यह कला विवाह और शुभ अवसरों का अभिन्न हिस्सा बन गई। यह परंपरा आज भी कोहबर (विवाह कक्ष) की दीवारों में जीवित है, जहां दूल्हा-दुल्हन के लिए विशेष चित्र बनाए जाते हैं। http://गोबर के कैनवास पर उकेरी गई बहनों के प्रेम और लोक-संस्कृति की जीवंत कला है पिड़िया

दीवारों से कैनवास तक का सफर
शुरुआत में यह कला केवल मिट्टी की दीवारों और आंगनों तक सीमित थी। चावल के पेस्ट, गोबर, हल्दी, काजल और फूल-पत्तियों से बने प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता था। 1960 के दशक में जब बिहार में सूखा पड़ा, तब इस कला को कागज और कपड़े पर लाने का प्रयास हुआ ताकि महिलाओं को रोजगार मिल सके। यहीं से मधुबनी पेंटिंग का व्यावसायिक रूप शुरू हुआ और यह अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंची।

शैली और प्रतीकों की अनोखी भाषा
मधुबनी पेंटिंग अपनी विशिष्ट शैली और प्रतीकों की अनोखी भाषा के लिए जानी जाती है, जिसमें दोहरी रेखाओं, बारीक पैटर्न और पूरे फ्रेम को भर देने की परंपरा प्रमुख होती है, यहां खाली स्थान लगभग नहीं छोड़ा जाता। आकृतियों की बड़ी और उभरी हुई आंखें इसकी खास पहचान हैं, जो भावनाओं को जीवंत बनाती हैं। इस कला में राम, सीता, कृष्ण, दुर्गा जैसे देवी-देवताओं के साथ सूर्य, चंद्रमा, तुलसी, मछली और कमल जैसे प्रतीकों का व्यापक उपयोग होता है। मछली समृद्धि और उर्वरता का संकेत देती है, जबकि सूर्य जीवन ऊर्जा और निरंतरता का प्रतीक माना जाता है, जो इस कला को आध्यात्मिक गहराई प्रदान करता है।

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महिलाओं की कला, अब वैश्विक पहचान
मधुबनी पेंटिंग मूल रूप से महिलाओं की कला रही है। गांव की महिलाएं इसे पीढ़ी दर पीढ़ी सीखती और सिखाती आई हैं। आज यही कला हजारों महिलाओं के लिए रोजगार का साधन बन चुकी है। कई स्वयं सहायता समूह और कलाकार अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेते हैं। सीता देवी, गंगा देवी, महासुंदरी देवी जैसी कलाकारों को पद्मश्री जैसे सम्मान भी मिल चुके हैं।

अर्थव्यवस्था और रोजगार का मजबूत आधार
मधुबनी पेंटिंग आज एक मजबूत हस्तशिल्प उद्योग के रूप में उभर चुकी है, जिससे मिथिला क्षेत्र के हजारों परिवार जुड़े हुए हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, केवल बिहार में ही 10–15 हजार से अधिक कलाकार सीधे तौर पर इस कला से अपनी आजीविका चला रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है। देश-विदेश में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, सरकारी मेलों व निर्यात के जरिए बिक्री में इजाफा हुआ है। यह कला ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही है। मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी महिलाएं (जैसे झज्जर में) प्रतिमाह 9,000-10,000 रुपये तक कमाकर बेरोजगारी से उबर रही हैं।

MadhubaniPaintingपर्यावरण से गहरा रिश्ता

मधुबनी पेंटिंग की सबसे खास बात इसका इको-फ्रेंडली होना है। प्राकृतिक रंग हल्दी (पीला), नीम और पत्तियां (हरा), काजल (काला), फूलों से लाल-गुलाबी रंग का उपयोग किया जाता है। यह कला प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन का संदेश देती है, जो आज के पर्यावरण संकट के दौर में बेहद प्रासंगिक है।

मार्केटिंग, ब्रांडिंग और चुनौतियां
आज मधुबनी पेंटिंग फैशन, होम डेकोर, टेक्सटाइल और गिफ्ट इंडस्ट्री में इस्तेमाल हो रही है। सरकार और एनजीओ इसके प्रमोशन में लगे हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं-
मशीन प्रिंट की वजह से असली कला का मूल्य कम होना
कलाकारों को उचित कीमत न मिलना
नई पीढ़ी का इस कला से दूर होना
फिर भी सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे नया बाजार दिया है।

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मिथिला की पहचान, भारत का गौरव
मिथिला सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान है। मधुबनी पेंटिंग इस पहचान का सबसे सशक्त प्रतीक है। केबीसी जैसे बड़े मंचों पर भी इसका जिक्र हो चुका है, और आज यह भारत की सॉफ्ट पावर का हिस्सा बन चुकी है। मधुबनी पेंटिंग हमें यह सिखाती है कि कला सिर्फ दीवारों पर बनी तस्वीर नहीं होती, बल्कि वह समाज की आत्मा होती है। यह परंपरा, प्रकृति और प्रगति का ऐसा संगम है, जो समय के साथ बदलते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। जब भी आप मधुबनी पेंटिंग देखें, तो उसे सिर्फ एक डिजाइन की तरह न देखें बल्कि समझें कि यह सदियों पुरानी संस्कृति, महिलाओं की मेहनत और मिथिला की मिट्टी की खुशबू का जीवंत प्रतीक है।

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