पटना: अरे ई का शॉट लगवलस! गेंद सीधा बाउंड्री पार, ई त पूरा बिहार के दिल खुश कर देले बा!….गेंदबाज दौड़त आवत बा… आ ई रही तेज गेंद! बल्लेबाज देखत ही रह गइल क्लीन बोल्ड! कमाल कर देलस!……भाई साहब, ई खिलाड़ी में दम बा! माटी से उठ के आज मैदान पर राज कर रहल बा! कैच के मौका… आ पकड़ लिहलस! वाह!
ये कुछ लाइन्स हैं भोजपुरी कमेंटेटर रॉबिन सिंह के। बिहार की क्रिकेट दुनिया लंबे समय तक सन्नाटे में डूबी रही, जहां प्रतिभा तो थी लेकिन मंच नहीं। इसी सन्नाटे को आवाज देने वाले व्यक्ति हैं रॉबिन सिंह एक ऐसे कोच, जिन्होंने मेडिकल करियर छोड़कर क्रिकेट को अपना जीवन बना लिया और आज भोजपुरी कमेंट्री के जरिए लाखों लोगों तक बिहार क्रिकेट की कहानियां पहुंचा रहे हैं।
डॉक्टर बनने का सपना छोड़ा, क्रिकेट को चुना
रॉबिन सिंह का जीवन एक तय रास्ते पर चल रहा था। पढ़ाई में अव्वल, 10वीं में राज्य टॉपर और पटना साइंस कॉलेज से पढ़ाई, सब कुछ उन्हें एक सफल डॉक्टर बनने की ओर ले जा रहा था। परिवार की भी यही अपेक्षा थी। लेकिन उनके भीतर क्रिकेट के लिए एक अलग ही जुनून था। हैदराबाद जाकर उन्होंने मेडिकल क्षेत्र में काम भी किया, लेकिन एक स्थानीय क्रिकेट अकादमी में बिताए समय ने उनकी दिशा बदल दी। वहां उन्होंने देखा कि साधारण पृष्ठभूमि के खिलाड़ी संसाधनों की कमी के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। यहीं उन्हें एहसास हुआ कि वह खिलाड़ी से ज्यादा एक कोच के रूप में बेहतर योगदान दे सकते हैं। परिवार का विरोध भी झेलना पड़ा, लेकिन रॉबिन ने अपने फैसले पर अडिग रहते हुए क्रिकेट को ही अपना मिशन बना लिया।
हैदराबाद से सीखी प्रोफेशनल कोचिंग, बिहार में किया लागू
हैदराबाद में रहते हुए रॉबिन ने आधुनिक क्रिकेट कोचिंग की बारीकियों को समझा। उन्होंने देखा कि कैसे प्रोफेशनल ट्रेनिंग, डेटा एनालिसिस और सही मार्गदर्शन खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा सकता है। उन्होंने कोचिंग सर्टिफिकेट हासिल किए और बायो-मैकेनिक्स, वर्कलोड मैनेजमेंट और मानसिक प्रशिक्षण जैसे पहलुओं पर गहराई से काम किया। जब वे 2017 में बिहार लौटे, तो उनके पास एक आधुनिक सोच और वैज्ञानिक प्रशिक्षण का मॉडल था, जो यहां के पारंपरिक ढांचे से बिल्कुल अलग था। उनकी इसी सोच ने बिहार क्रिकेट में एक नई शुरुआत की नींव रखी।
पंकज त्रिपाठी की भोजपुरी कमेंटरी भी देखें
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बिहार वापसी और बिना वेतन के शुरू किया मिशन
रॉबिन सिंह की बिहार वापसी भी एक संयोग से कम नहीं थी। बहन की शादी में आए रॉबिन को बिहार क्रिकेट एसोसिएशन ने अंडर-16 टीम का कोच बनने का प्रस्ताव दिया वह भी बिना वेतन के। यह प्रस्ताव किसी भी प्रोफेशनल के लिए असामान्य था, लेकिन रॉबिन ने इसे एक अवसर के रूप में देखा। उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद काम शुरू किया। टीम की हालत बेहद खराब थी, खिलाड़ियों के पास यूनिफॉर्म तक नहीं थी। ऐसे में रॉबिन ने खुद पहल करते हुए अपने डॉक्टर मित्रों और संस्थानों से मदद ली और करीब 2 लाख रुपये का प्रायोजन जुटाया। पहली बार बिहार की टीम एक प्रोफेशनल टीम की तरह दिखने लगी। यह केवल कोचिंग नहीं थी, बल्कि एक सिस्टम को खड़ा करने की शुरुआत थी।
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साकिब हुसैन और नई पीढ़ी का उदय
रॉबिन सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है प्रतिभाओं को पहचानना और उन्हें सही दिशा देना। गोपालगंज के तेज गेंदबाज साकिब हुसैन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। जब रॉबिन ने पहली बार साकिब को देखा, तो उनकी लाइन-लेंथ खराब थी, लेकिन गति और क्षमता असाधारण थी। साकिब आर्थिक रूप से कमजोर थे और टेनिस बॉल क्रिकेट खेलकर पैसे कमाते थे। रॉबिन ने उन्हें समझाया कि अगर वे प्रोफेशनल क्रिकेट अपनाते हैं, तो उनकी जिंदगी बदल सकती है। कई बार समझाने के बाद साकिब ने मौका लिया बिना पैसे, बिना स्पाइक्स के पटना पहुंचे और अपने पहले ही स्पेल में सबको प्रभावित कर दिया। आज वही साकिब आईपीएल में अपनी पहचान बना चुके हैं और ‘गोपालगंज का रबाड़ा’ कहलाते हैं। इसी तरह वैभव सूर्यवंशी जैसे युवा खिलाड़ी भी बिहार को नई पहचान दे रहे हैं।
अब भोजपुरी कमेंट्री से दे रहे हैं बिहार को आवाज
आज रॉबिन सिंह सिर्फ कोच नहीं, बल्कि एक आवाज बन चुके हैं। जियो हॉटस्टार पर उनकी भोजपुरी कमेंट्री ने क्रिकेट को बिहार के आम लोगों से जोड़ दिया है। उनकी आवाज में सिर्फ मैच का रोमांच नहीं, बल्कि उन संघर्षों की कहानी भी होती है जो बिहार के छोटे शहरों और गांवों से निकलकर बड़े मंच तक पहुंचती हैं। रॉबिन सिंह ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही मार्गदर्शन और जुनून हो, तो संसाधनों की कमी भी सफलता की राह नहीं रोक सकती। उन्होंने न केवल खिलाड़ियों को तैयार किया, बल्कि बिहार क्रिकेट को उसकी पहचान भी दिलाई।

