-डॉ. सुनील कुमार पाठक
भोजपुरी को लेकर जब भी चर्चा होती है, तो अक्सर इसे केवल एक भाषा के रूप में देखा जाता है। जनगणना, संविधान की आठवीं अनुसूची, भाषाई अस्मिता और राजनीतिक विमर्श के दायरे में भोजपुरी का मूल्यांकन किया जाता है। लेकिन क्या भोजपुरी केवल बोलचाल का माध्यम भर है? क्या इसकी पहचान केवल व्याकरण, शब्दकोश और साहित्य तक सीमित है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है।
दरअसल, ‘भोजपुरी’ एक भाषा से कहीं अधिक एक सांस्कृतिक अवधारणा है। यह शब्द केवल संज्ञा नहीं, बल्कि विशेषण के रूप में भी जीवंत है। हम भोजपुरी संस्कृति, भोजपुरी लोकजीवन, भोजपुरी विरासत, भोजपुरी कलाकार, भोजपुरी साहित्य, भोजपुरी संगीत, भोजपुरी महापुरुष और भोजपुरी लोककलाओं की बात करते हैं। इसका अर्थ यह है कि भोजपुरी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सभ्यता की पहचान है।
आज जब भोजपुरी की सांस्कृतिक विरासत और लोककलाओं की मौलिकता पर प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं, तब आवश्यकता है कि इस विषय को तथ्यों, इतिहास और सांस्कृतिक दृष्टि से देखा-समझा जाए।
भाषा से आगे बढ़कर एक सांस्कृतिक भूगोल
भोजपुरी का विस्तार केवल बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। नेपाल की तराई से लेकर झारखंड, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों और मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना तथा दक्षिण अफ्रीका तक इसकी सांस्कृतिक छाप दिखाई देती है। अलग अलग आँकड़ों की मानें तो 30 करोड़ से अधिक लोग इसको बोलते, सुनते और समझते हैं । यह विस्तार केवल प्रवासी मजदूरों के कारण नहीं हुआ, बल्कि उनके साथ गई लोकसंस्कृति, गीत, नृत्य, रीति-रिवाज और जीवन दर्शन के कारण संभव हुआ।
यही कारण है कि आज भी मॉरीशस में ‘छठ पूजा’ होती है, फिजी में ‘बिरहा’ और ‘कजरी’ की धुन सुनाई देती है तथा सूरीनाम में भोजपुरी लोकगीत सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा हैं। यदि भोजपुरी केवल भाषा होती, तो शायद यह सांस्कृतिक निरंतरता और संपन्नता संभव नहीं होती।
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भोजपुरी लोककलाएँ, इतिहास की जीवित धरोहर
भोजपुर अंचल की लोककलाएँ हजारों वर्षों से सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं। इनमें केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का इतिहास, दर्शन, लोकविश्वास और सामूहिक स्मृति भी सुरक्षित है।
‘बिरहा’ केवल गीत नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद की परंपरा है। ‘ कजरी ‘ केवल सावन का संगीत नहीं, बल्कि स्त्री -मन की संवेदनाओं का मुखरित अभिलेख है। ‘सोहर’ केवल जन्मोत्सव का गीत नहीं, बल्कि परिवार और समाज की सांस्कृतिक संरचना का प्रतीक है। ‘जोगीरा’, ‘चैता’, ‘फगुआ’, ‘निरगुन’, ‘पूरबी ‘, ‘बारहमासा’, ‘ मलहा गीत’, ‘रोपनी गीत ‘ और ‘जतसार’ जैसी गीत- परंपराएँ कृषि, ऋतु, श्रम और जीवन के विविध आयामों को अभिव्यक्त करती हैं।
इसी प्रकार भोजपुर क्षेत्र की लोकचित्र परंपराएँ, लोकनाट्य, विवाह संस्कार, लोकवाद्य, मिट्टी की कला, बांस एवं लकड़ी के शिल्प और पारंपरिक हस्तकलाएँ आदि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक अनुरक्ति और समृद्धि को रूपायित करती हैं।
क्या इतिहास केवल गजेटियर से तय होगा?
हाल के वर्षों में कुछ लोग पूर्वाग्रह भाव से अपने संकुचित उद्देश्यों से परिचालित होकर भोजपुरी संस्कृति और लोककलाओं की प्राचीनता पर सवाल उठाते हुए सरकारी गजेटियर, औपनिवेशिक दस्तावेजों या आधुनिक अभिलेखों को अंतिम प्रमाण मानते हुए अपने छद्म एजेन्डों को पूरा करने के लिए तत्पर दिखते हैं। किन्तु अंतत: यह दृष्टिकोण भारतीय लोकपरंपराओं की प्रकृति को समझने में असफल ही साबित होने वाला है।
भारत की अधिकांश लोकसंस्कृतियाँ सदियों तक मौखिक परंपरा के माध्यम से जीवित रही हैं। वे पुस्तकों में कम और जनजीवन में अधिक व्याप्त और सुरक्षित-संरक्षित रही हैं। किसी लोककला का अस्तित्व इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसका उल्लेख किसी अंग्रेज अधिकारी ने अपने गजेटियर में किया या नहीं।
यदि ऐसा होता, तो भारत की अनेक लोक परंपराएँ आज इतिहास से बाहर रहतीं,उनका कोई अस्तित्व बचा नहीं रहता। वास्तव में, लोकसंस्कृति का सबसे बड़ा अभिलेख स्वयं समाज होता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपराएँ, लोकगीत, उत्सव, रीति-रिवाज और सामाजिक स्मृतियाँ किसी भी दस्तावेज से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।
विवाद क्यों खड़े किए जा रहे हैं?
आज सांस्कृतिक पहचान भी राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है। ऐसे समय में कई बार किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने या उसकी मौलिकता पर प्रश्न उठाने का प्रयास किया जाता है।
भोजपुरी भी इस प्रवृत्ति से अछूती नहीं रही है। कभी इसकी भाषायी अस्मिता पर प्रश्न उठते हैं, कभी इसके साहित्य पर और कभी इसकी लोककलाओं पर। कई बार भोजपुरी की सांस्कृतिक उपलब्धियों को किसी अन्य क्षेत्र की परंपरा बताने की भी दुरावह कल्पना और कोशिशें होती है।
यह प्रवृत्ति केवल भोजपुरी के साथ नहीं है। भारत की अनेक लोकसंस्कृतियाँ इस प्रकार के सांस्कृतिक विवादों का सामना कर रही हैं। लेकिन इतिहास का सच दस्तावेजों से अधिक समाज की स्मृति और निरंतर परंपरा में सुरक्षित रहता है।
सांस्कृतिक पहचान का संकट
भोजपुरी समाज का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि उसकी संस्कृति पर सवाल उठ रहे हैं। असली चुनौती यह है कि नई पीढ़ी अपनी लोककलाओं से दूर होती जा रही है। डिजिटल मनोरंजन के दौर में बिरहा, चैता, कजरी, नौटंकी, लोकनाट्य और पारंपरिक लोकवाद्य धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं। गाँवों के सामूहिक सांस्कृतिक आयोजन कम हो रहे हैं। लोक कलाकारों को पर्याप्त सम्मान और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल रही। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले वर्षों में कई लोककलाएँ केवल शोधपत्रों और अभिलेखों तक सीमित होकर रह जाएँगी।
संरक्षण का अर्थ केवल संग्रह नहीं
लोककलाओं का संरक्षण केवल संग्रहालय बनाने से नहीं होगा। इसके लिए समाज, सरकार, शिक्षण संस्थानों और डिजिटल माध्यमों को मिलकर काम करना होगा। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में भोजपुरी लोकसंस्कृति पर अध्ययन को बढ़ावा दिया जाए। लोक कलाकारों को आर्थिक सहायता मिले। डिजिटल अभिलेख तैयार हों। लोकगीतों, लोकनाट्यों और पारंपरिक कलाओं का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए। प्रवासी समाज को भी इस अभियान से जोड़ा जाए, क्योंकि आज विश्वभर में फैला भोजपुरी समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ना चाहता है।
भोजपुरी का भविष्य उसकी संस्कृति में है
भोजपुरी को केवल संवैधानिक मान्यता दिलाना ही पर्याप्त नहीं होगा। यदि उसकी संस्कृति कमजोर पड़ गई तो भाषा भी धीरे-धीरे अपना प्रभाव खो देगी और उसका अपकर्ष दिखने लगेगा। दुनिया की हर बड़ी भाषा अपनी सांस्कृतिक शक्ति और प्रौढ़ि के कारण ही जीवित रहती है।
भोजपुरी की वास्तविक ताकत उसके लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथाएँ, लोककलाएँ, पर्व-त्योहार, पारिवारिक संस्कार और सामूहिक जीवन शैली हैं। यही इसकी सबसे बड़ी थाती हैं।
समासत: कहना चाहूंगा कि भोजपुरी को केवल एक भाषा मानना उसके व्यापक सांस्कृतिक स्वरूप को सीमित-संकुचित कर देना होगा। यह एक ऐसी वैभवशाली सभ्यता है, जिसने सदियों से लोकजीवन, कला, संगीत, साहित्य, आस्था और सामाजिक मूल्यों को एक साथ समेटकर रखा है।
इसलिए भोजपुरी की लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत की प्राचीनता किसी सरकारी गजेटियर, औपनिवेशिक दस्तावेज , आधुनिक कला- मठों के महंथों की अनर्गल घोषणाओं या प्रमाणपत्रों की मोहताज नहीं है। उसका सबसे बड़ा प्रमाण स्वयं भोजपुरी समाज है, जिसकी स्मृतियों, परंपराओं और जीवनशैली में यह विरासत आज भी जीवित है।
भोजपुरी की असली पहचान उसके शब्दों के साथ-साथ, उसके लोकजीवन में व्याप्त स्मृतियों,परम्पराओं, मान्यताओं,रीति-रिवाजों,प्रचालनों,विधि-व्यवहारों, आस्थाओं आदि के जरिए मूर्तिमान होती है।। यही कारण है कि आज भोजपुरी केवल एक भाषा भर नहीं, बल्कि एक जीवंत ,कलावंत और कीर्तिवंत सांस्कृतिक संसार है, जिसका संरक्षण और संवर्द्धन आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
लेखक-परिचय : डॉ.सुनील कुमार पाठक, वरिष्ठ भोजपुरी विद्वान और विमर्शकार। कई भोजपुरी-हिन्दी पुस्तकों यथा-‘कविता का सर्वनाम ‘(हिन्दी कविता संग्रह)’नेवान'(भोजपुरी का प्रथम हाइकु संग्रह)’छवि और छाप-राष्ट्रीयता के आलोक में भोजपुरी कविता का पाठ’ (समालोचना) ‘पढ़त-लिखत ‘(काव्यालोचना) ‘भोजपुरी कविता -रुचि आ रचाव’ (समीक्षा) आदि अनेक पुस्तकों के लेखक-संपादक, निवासीय-303,परमानन्द पैलेस, सर गणेशदत्त काॅलेज के समीप, आर पी एस मोडड़, दानापुर, पटना


महत्वपूर्ण चिंतन
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