डॉ. सुनील कुमार पाठक
भोजपुरी दिवस पर विशेष: कबीर जयंती के अवसर पर भोजपुरी भाषा, साहित्य और अस्मिता पर एक व्यापक विमर्श
कबीर केवल एक संत या कवि नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज के स्वभाव, साहस और स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतीक हैं। जब-जब भोजपुरी भाषा की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक चेतना और उसके संघर्ष की चर्चा होगी, तब-तब संत कबीर का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। यह संयोग नहीं है कि जेठ पूर्णिमा, जिस दिन संत कबीर का प्राकट्य दिवस माना जाता है, उसी दिन भोजपुरी समाज ‘भोजपुरी दिवस’ भी मनाता है। यह परंपरा केवल तिथि का मेल नहीं, बल्कि विचारों का गहरा संबंध है।
प्रख्यात आलोचक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा था। उनका आशय यह था कि कबीर अपनी बात बिना किसी भय, संकोच या समझौते के कहते थे। द्विवेदी जी लिखते हैं कि ‘कबीर जो कहना चाहते थे, उसे अपनी वाणी से कहलवा लेते थे; सीधे नहीं तो दरेरा देकर।’
यही स्वभाव भोजपुरी समाज का भी है। भोजपुरी मन न तो बनावटी भाषा बोलता है और न ही घुमा-फिराकर बात कहने का अभ्यस्त है। उसकी प्रकृति साफगोई की है। भोजपुरी लोकजीवन में प्रचलित कहावतें और लोकगीत इसकी पुष्टि करते हैं। प्रसिद्ध लोककवि भानु जी की पंक्ति- ‘होला एके पानी के मरद भोजपुरिया।’ भोजपुरी समाज के उसी आत्मविश्वास और स्वाभिमान को व्यक्त करती है, जो कबीर की वाणी में दिखाई देता है।
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कबीर : भोजपुरी के आदिकवि?
प्रख्यात आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने कबीर को ‘भोजपुरी का आदिकवि’ कहा है। उनका मानना है कि कबीर की कविता में भोजपुरी क्षेत्र का तेवर, मन-मिजाज, लोकसंस्कार और सामाजिक चेतना पूरी शक्ति के साथ उपस्थित हैं। यद्यपि कबीर की भाषा को सामान्यतः सधुक्कड़ी कहा जाता है, लेकिन भाषाविदों का मत है कि उसमें पूर्वांचल की लोकभाषाओं विशेषतः भोजपुरी का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। कबीर ने कहा भी है-
‘बोली हमरी पुरब की, हमें लखे नहीं कोय।
हमके तो सोई लखे, धुर पुरब का होय॥’
उनके पदों और साखियों में प्रयुक्त अनेक शब्द, वाक्य-विन्यास और ध्वनियाँ आज भी भोजपुरी अंचल में उसी रूप में बोली जाती हैं। यही कारण है कि कबीर गाँवों में आज भी पुस्तक से नहीं, बल्कि लोकस्मृति से जीवित हैं।ज्ञातव्य है कि अधिकतर कबीरमठ भोजपुरी क्षेत्र में ही हैं।कबीर की कुछ भोजपुरी रचना ओं को देख -पढढ़ लेना यहाँ उचित ही होगा-
1-मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा
मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।। टेक।
आसन मारि मंदिर में बैठे, नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।।
कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले, दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।।
जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले, काम जराय जोगी होइ गैलै हिजरा।।
मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रंगौले, गीता बाँचि के होइ गैले लबरा।।
कहहि कबीर सुनो भाई साधो, जम दरबजवाँ बाँधल जैवे पकरा।।
2-कौन ठगवा नगरिया लूटल हो
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।। टेक।।
चंदन काठ कै वनल खटोलना, तापर दुलहिन सूतल हो।।
उठो री सखी मोरी माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूसल हो।।
आये जमराज पलंग चढ़ि बैठे, नैनन आँसू टूटल हो।।
चारि जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धू-धू उठल हो।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, जग से नाता टूटल हो।।
3-तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में
तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में।। टेक।।
कोई ढूँढे पूरब कोई पच्छिम, कोई ढूँढ़े पानी पथरे में।।
सुर नर अरु पीर औलिया, सब भूलल बाड़ै नखरे में।।
दास कबीर ये हीरा को परखै, बाँधि लिहलैं जतन से अँचरे में।।
4- का ले जैबो, ससुर घर ऐबो
का ले जैबो, ससुर घर ऐबो।। टेक।।
गाँव के लोग जब पूछन लगिहैं, तब तुम का रे बतैबो ।।
खोल घुंघट जब देखन लगिहैं, तब बहुतै सरमैबो ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, फिर सासुर नहिं पैबो ।।
5- कँवल से भँवरा विछुड़ल हो, जहँ कोइ न हमार
कँवल से भँवरा विछुड़ल हो, जहँ कोइ न हमार ।।
भौंजल नदिया भयावन हो, बिन जल कै धार ।।
ना देखूँ नाव ना बेड़ा हो, कैसे उतरब पार ।।
सत्त की नैया सिर्जावल हो, सुकिरत करि धार ।।
गुरु के सबद की नहरिया हो, खेइ उतरब पार ।।
दास कबीर निरगुन गावल हो, संत लेहु बिचार ।।
भोजपुरी दिवस की परिकल्पना कैसे हुई?
प्रख्यात विद्वान डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के रेणुकूट अधिवेशन में प्रस्ताव रखा था कि जेठ पूर्णिमा, अर्थात कबीर जयंती के दिन ही पूरे भोजपुरी समाज को ‘भोजपुरी दिवस’ मनाना चाहिए। उनका तर्क था कि जिस भाषा को कबीर ने जनभाषा का सम्मान दिया, उसी भाषा को अपनी सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
सम्मेलन ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और भोजपुरी दिवस मनाने की शुरुआत हुई। हालांकि समय के साथ यह आंदोलन उतनी व्यापक गति नहीं पकड़ सका, जितनी अपेक्षा थी। आज आवश्यकता है कि भोजपुरी दिवस केवल औपचारिक आयोजन न बनकर सामाजिक चेतना का अभियान बने।
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भोजपुरी केवल भाषा नहीं, सभ्यता है
भोजपुरी को केवल एक बोली मानना उसके विशाल सांस्कृतिक स्वरूप के साथ अन्याय होगा। यह भाषा खेती-किसानी, लोकसंगीत, श्रम, प्रवास, अध्यात्म, प्रेम, विद्रोह और लोकज्ञान की भाषा है। भारत से लेकर मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना और नेपाल तक भोजपुरी की सांस्कृतिक उपस्थिति है। लगभग 25 से 30 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में भोजपुरी बोलते या समझते हैं। इतनी व्यापक जनसंख्या के बावजूद भोजपुरी आज भी संवैधानिक मान्यता की प्रतीक्षा कर रही है।
साहित्य का विस्तार जरूरी है
यह विचारणीय है कि भोजपुरी आज खूब लिखी जा रही है, लेकिन अब गंभीर और ज्ञानपरक लेखन की आवश्यकता है। यह बात आज और अधिक प्रासंगिक हो गई है।
साहित्य के साथ-साथ विज्ञान, चिकित्सा, पत्रकारिता, इतिहास, तकनीक, अर्थशास्त्र, कानून, पर्यावरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों पर भी भोजपुरी में मौलिक लेखन होना चाहिए। केवल कविता और गीत किसी भाषा को महान नहीं बनाते; ज्ञान-विज्ञान का साहित्य भी उतना ही आवश्यक है।
शोध और इतिहास लेखन की आवश्यकता
यह भी एक सच्चाई है कि भोजपुरी साहित्य का इतिहास तो लिखा गया है, लेकिन आज भी एक व्यापक, प्रामाणिक और समग्र इतिहास-ग्रंथ की आवश्यकता है। फिलहाल यह कार्य किसी एक लेखक के बस की बात नहीं। इसके लिए विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और स्वतंत्र विद्वानों को मिलकर कार्य करना होगा। भोजपुरी पर गंभीर शोध, शब्दकोश, विश्वकोश, व्याकरण, आलोचना और डिजिटल अभिलेखागार समय की आवश्यकता हैं।
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आठवीं अनुसूची है सबसे बड़ा लक्ष्य
सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संघर्ष कैसे फलीभूत हो। दरअसल ‘भोजपुरी दिवस’ आत्ममंथन का दिन है और अब सभी प्रयासों का केंद्र यही होना चाहिए। यदि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में स्थान मिलता है तो साहित्य अकादमी में प्रतिनिधित्व बढ़ेगा।
UPSC और राज्य लोक सेवा आयोगों में विषय के रूप में अवसर मिलेगा। विश्वविद्यालयों में नियमित अध्ययन होगा। सरकारी संस्थानों में प्रयोग बढ़ेगा।
रोजगार के नए अवसर बनेंगे। यह केवल भाषा की प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के अधिकारों का प्रश्न है।
लिपि का विवाद केवल बहाना
भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल न करने के लिए अक्सर उसकी लिपि का प्रश्न उठाया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि संविधान की कई भाषाएँ देवनागरी सहित अन्य साझा लिपियों में लिखी जाती हैं। मैथिली की अधिकांश पुस्तकें भी आज देवनागरी में प्रकाशित होती हैं। इसलिए लिपि का प्रश्न भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता में बाधा नहीं होना चाहिए।
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव
स्पष्ट है कि अनेक राजनीतिक दल और नेता चुनाव के समय भोजपुरी की बात करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद विषय ठंडे बस्ते में चला जाता है। भोजपुरी समाज अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहता है।
आज आत्मावलोकन भी बहुत जरूरी है।हमें भोजपुरी समाज की कमजोरियों पर भी ईमानदारी से चर्चा करनी चाहिए। व्यक्तिगत महिमामंडन, गुटबाज़ी, जातीय आग्रह और संगठनात्मक विखंडन ने भोजपुरी आंदोलन को कमजोर किया है। यदि समाज स्वयं संगठित नहीं होगा तो बाहरी सहयोग की अपेक्षा करना व्यर्थ होगा।
आज सेंट्रल को -आर्डिनेशन कमिटी बनाकर एक मंच से अपनी बातें रखने का वक्त आ गया है।
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कबीर का संदेश आज भी प्रासंगिक
कबीर ने कहा था कि ‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।’ और ‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।’ उनका पूरा जीवन सामाजिक समानता, धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का संदेश देता है। भोजपुरी की आत्मा भी इन्हीं मूल्यों पर आधारित है। भोजपुरी बचानी है तो भोजपुरी में अधिकाधिक बोलने का प्रयास करना होगा।
भोजपुरी केवल सरकारी आदेशों से नहीं बचेगी। वह तब बचेगी जब घरों में भोजपुरी बोली जाएगी। बच्चे भोजपुरी सीखेंगे। भोजपुरी की पुस्तकें खरीदी जाएँगी। शोध होगा। डिजिटल दुनिया में भोजपुरी सम्मान के साथ उपस्थित होगी।
‘भोजपुरी दिवस ‘ केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि संकल्प का दिवस है। आज संत कबीर की जयंती पर हमें उनके निर्भीक व्यक्तित्व, सामाजिक चेतना और लोकभाषा के प्रति समर्पण से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। आइए, कबीर की वाणी को केवल गाने-बजाने तक सीमित न रखें, बल्कि उसे सामाजिक व्यवहार और भाषाई आंदोलन का आधार बनाएं। जैसा कि भोजपुरी के कवि श्रीमंत लिखते हैं कि
‘गुमसुम-गुमसुम तनिको ना भावे हमें,
आँधी हईं, आँधी अंधाधुंध हम मचाइले।’
और कवि पांडेय कपिल की ये पंक्तियाँ आज भी भोजपुरी समाज को प्रेरित करती हैं-
‘बान्ह के मोटरी एह जिनिगी के जीयऽ मत,
रो-रो के जीयऽ मत, हँसि-हँसि के मरऽ।’
इसी जिजीविषा, संघर्ष और स्वाभिमान के साथ भोजपुरी आगे बढ़े, यही भोजपुरी दिवस और संत कबीर जयंती का सबसे बड़ा संदेश है। संत कबीर को शत-शत नमन। समस्त भोजपुरी समाज को भोजपुरी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
लेखक-परिचय : डॉ.सुनील कुमार पाठक, वरिष्ठ भोजपुरी विद्वान और विमर्शकार। कई भोजपुरी-हिन्दी पुस्तकों यथा-‘कविता का सर्वनाम ‘(हिन्दी कविता संग्रह)’नेवान'(भोजपुरी का प्रथम हाइकु संग्रह)’छवि और छाप-राष्ट्रीयता के आलोक में भोजपुरी कविता का पाठ’ (समालोचना) ‘पढ़त-लिखत ‘(काव्यालोचना) ‘भोजपुरी कविता -रुचि आ रचाव’ (समीक्षा) आदि अनेक पुस्तकों के लेखक-संपादक, निवासीय-303,परमानन्द पैलेस, सर गणेशदत्त काॅलेज के समीप, आर पी एस मोड़, दानापुर, पटना।


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