कबीरा आप ठगाइए और न ठगिए कोय -चंद्रेश्वर

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भोजपुरी दिवस आ कबीर जयंती पर विशेष

कबीर के हम किशोरावस्था से सुनत-पढ़त आ गुनत आ रहल बानी। धीरे-धीरे ऊ हमार चेतना के किछु हद तक बदले के काम ज़रूर कइले बाड़न। उन्हुकर जेवन छवि अब ले बनल बा, हमरा मानस में; ऊ एगो अइसन संत-साधक, चिंतक, गृहस्थ,बुनकर,कवि आ समाज सुधारक के बा जेवन बिना केवनो लाग-लपेट के निर्भय होके आपन बात के कहत आ सुनावत बा। जेवन खरा-खरा बोलत बा आ दुविधा से मुक्त हो के बोलत बा। जेवन बेबाकपन खातिर प्रसिद्ध हो चुकल बा। जेकर नाम एगो मुहावरा में बदल गइल बा। कबीर आपन नाम के सार्थक कइले बांड़न, आपन कर्म से। ऊ ईश्वर के त मानत बाड़न; बाकिर अवतार के ना। जेकर चिंतन के धुरी निर्गुण ब्रह्म बाड़न। ऊ निर्गुण ब्रह्म ज्ञानपरक आ प्रेमपरक बाड़न। ऊ अजोध्या के चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के राम ना हंवन; जेकर महिमा के बखान तीनों लोक में बेआपल बा। एह निर्गुण राम के नाम के मर्म त किछु दोसरे बा -‘दसरथ सुत तिहूँ लोक बखाना, राम नाम को मरम है आना।’ एह तरह से साफ़ बात बा कि कबीर भारतीय परंपरा में मुख्य धारा के बरअक्स आपन नयकी आ दोसरकी धारा के निर्माण अने संधान करत बाड़ें। एकरे के हिन्दी आलोचक प्रोफ़ेसर नामवर सिंह दोसरकी परंपरा के खोज कहले बाडन। ई परंपरा वेद, पुराण आ स्मृतियन के प्रत्याख्यान करत नव विकल्प प्रस्तुत करत बिया। उन्हुकर एगो पद देखल जाय –

‘मोंको कहां ढूंढ़े बंदे मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद ना काबे कैलास में।
ना तो कौनो किरिया करम में नाही जोग बैराग में।
ना मैं छगरी ना मैं भेंड़ी ना मैं छूरी गंडास में।
नहीं खाल में नहीं पूंछ में ना हड्डी औ मांस में।
मैं तो रहां सहर के बाहर मेरी पूरी मवास में।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौ पल भर की तलास में।
कहैं कबीर सुनौ भाई साधो, सब सांसन की सांस में।’

       कबीर के साफ़ मानना बा कि उन्हुकर राम त घट-घट में रहेलन। ऊ सब जगह बसल बाड़न। ऊ एगो अइसन पुरुष हँवन जेकरा के अक्षर आ अविनाशी कहल जाला। ऊ अजन्मा हँवन। ऊ कहत बांड़न कि हैं ईश्वरत्व हमनी के जिनगी में एगो थोपल कल्पित अवधारणा ना ह। ऊ सज़िल्द पोथियन में भा शब्दन में क़ैद ना हो सकेला। ऊ मंदिर, मस्ज़िद , चर्च भा गुरुद्वारा में ना होखे। ऊ केवनो तीर्थ में अने काशी, काबा भा कैलाश में ना मिले। ऊ असीम बा। ऊ हद से बाहर बा। ऊ शून्य बा। उन्हुकर राम त हरेक जीवात्मा के अंतस में पइसल बा। ओकरा के पहचाने, जाने आ चीन्हे के पड़ेला। ऊ राम के नाम के रटे भा ओकरा उच्चारण मात्र से ना हासिल हो सकेला। अगर अइसने होखे के रहित त एगो सुग्गो राम-राम रटके वोह राम के, सर्व शक्तिमान ब्रह्म के जान लिहित। कबीर ईश्वर तक पहुँचे के सरल मार्ग बतावत बाड़न -निज आत्म के दर्शन भा ओकर साक्षात्कार। एक तरह से कहल जाए त स्वयं के वजूद के तलाशे उन्हुका हियां ईश्वर के तलाश बा।
कबीर के मए ‘बीजक’ ( साखी, सबद आ रमैनी ) में ईश्वर के ले के एगो जेवन वैचारिकी सामने आइल बा,ओकरो सहारे गोरखनाथ, नौ गो नाथ आ चौरासी गो सिद्धन से हो के बुद्ध तक पहुँचल जा सकत बा। जेवन तरीका से बुद्ध स्वयं दीपक बने के बात कइले बाड़न, ओही तरह से कबीरो आत्मतत्त आ आत्मग्यान प ज़ोर देले बाड़ें। हमार परंपरा के मुख्यधारा के बरअक्स जेवन कई गो अन्य धारा रहल बाड़ी स, कबीर ओह अन्य सब धारा के भीतर के शीर्ष संत आ विचारक हंवन।

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कबीर हिन्दी में जेवन भक्ति काव्य आ भक्ति आंदोलन के शुरुआत करत बाड़े, ऊ बहुते क्रांतिकारी अवधारणा से जुड़ल रहल बा। कबीर ओह तरह के भक्तन में नइखन जे सबकिछु के स्वीकार कर लेला, निरीह बन के भा आँख मूँद के। ऊ ओह भक्तन में शामिल नइखन जे अंधसरधा में डूब जाय भा सबकिछु के तर्क से परे मानत होखे। ऊ परंपरा में जेवन किछु सड़ल-गलल बा, जेवन किछु कमज़ोर बा, ओह सब के तज देबे के बात करत बाड़न। ऊ परंपरा के क क गो रूपकन, मिथकन भा पौराणिक आख्यानन के तर्क आ विवेक के कसौटी प कसत बाड़न।
एहिजे उन्हुकर आधुनिक मन सामने आ जात बा। ई तर्क आ विवेके बा जेवन उन्हुका के जगावत बा । ऊ उन्हुका के रोवे खातिर विवश कर देत बा, ना त ऊहो एह सुखिया संसार के हिस्सा बन सकत रहलन।
ऊ ईश्वर आ ईश्वरत्व के ले के आपन सबद, साखी आ रमैनी में हज़ार-हज़ार तरह से अवरू दू टूक लहज़ा में आपन बात राखत बाड़न। ऊ ईश्वर तक पहुँचे खातिर ग्यान के होखल ज़रूरी मानत बाड़न। ऊ ग्यान के प्रेम से बहरी नइखन मानत। उन्हुकर ‘पब्लिक स्फेयर’ (लोकवृत्त ) में एगो बहुते लोकप्रिय दोहा बा -‘ पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।’
उन्हुकर प्रेम एगो अइसन अँजोर लेखा बा जेवन सबके हिरदय के उजियार करत बा। ऊ केहू के अछूत भा नीच नइखे मानत। कबीर के प्रेम निजी होइओ के सभकरा खातिर बा श। ऊ समाज के एगो नयकी दिशा में ले जाए वाला बा।
पंडित भा बिदमान के ले के कबीर के जेवन अवधारणा बा ऊ परंपरावादी आ रूढ़ चिंतन प हथौड़ा लेखा चोट करे वाला बा। ऊ पंडित उन्हुकरा के मानत बाड़न जे संवेदना से भरल आ सजल हिरदय वाला मानुष बा। हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध भी कोरा शब्दजीवी भा ग्रंथ में डूबल रहे वाला के ब्रह्मराक्षस कहले बाड़न। उन्हुकर लमहर कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ फैंटेसी के शिल्प में रचल गइल बा जेवन कबीर के वैचारिकी आ ग्यान के धारा से जुड़ल बा । ऊ ग्यान के कर्म आ प्रेम से जोड़े के हिमायती बाड़न। कबीर एगो महान कर्मयोगी भी रहल बाड़न।
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कबीर धर्म के भी लीक आ रूढ़ियन से हटके सरल-सहज व्याख्या बाड़न। उन्हुकर बात हमनी के मर्म के गहिरारे भेदे वाली होली स । ऊ एगो दोहा में कहले बाड़न –

‘जहाँ दया तँह धरम है, जहाँ लोभ तँह पाप।
जहाँ क्रोध तँह काल है, जहाँ छिमा तँह आप।।’

     जहाँ क्षमा भाव बा, ओहिजे ईश्वर बाड़न। जहाँ दया भाव बा ओहिजे धर्म बा। एक तरह से कबीर धर्म के मर्म के थोरही शब्दन में निचोड़ के हमनी सामने रख देले बाड़न। उन्हुकर धर्म कर्मकांड से कोसन्ह दूर बा। उन्हुकर ईश्वर अने निर्गुण ब्रह्म जे ग्यान आ प्रेम से दीप्त बाड़न, जे मानुष के निज स्वारथ के दायरा से बाहर निकाल देत बाड़न; जे ख़ुद के घर के जरावे भा फूँके के बात करत बाड़न; जे सतावल गइल, उत्पीड़ित समुदाय, वर्ण आ वर्ग के पक्ष में ला खड़ा करत बा। ई ऊ ईश्वर बा जेवन निष्पक्ष बना रहल बा अने पूर्वाग्रह रहित बना रहल बा। ई ऊ ईश्वर बा जेवन हरमेश सच्चाई के पक्ष में ठाढ़ रहे के सीख दे रहल बा। ई ऊ ईश्वर बा जेवन निर्मल चित्त में निवास करे वाला बा। ऊ चित्त जेवन कपट से मुक्त हो गइल बा ।

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कबीर केवनो क़िसिम के छद्म, पाखंड भा फ़रेब भा ठगी के विरोध में बाड़न। ऊ कहा रहल बाड़न-

‘कबीरा आप ठगाइए और न ठगिए कोय।
आप ठगे सुख होत है और ठगे दुःख होय।।’

       कबीर आपन वाणी आ कर्म से सौ फीसदी एक बाड़न। उन्हुकर मए जिनगी एगो नैतिक पाठ भा संदेश लेखा बा। ऊ कतो दुचित्तापन भा दोहरापन भा छद्म पर जमके प्रहार कइले बाड़न। ऊ काव्य कला के अभ्यासी भा नाना पुराण, निगम भा आगम के अध्येता नइखन। ऊ ‘कागद की लेखी’ के बात नइखन कइले; ऊ त ‘आँखिन देखी’ के बात कइले बाड़न।
उन्हुकर जिनगी सत्य, ‘आतमगेयान’ आ ‘अनुभव के साँचा’ से निखर के सबके सोझा आइल बा। ई ग्यान, ई अनुभव उन्हुका आ उन्हुका वाणी के मर्म के जाने वाला के अनभय अने भयमुक्तो करे वाल बा। ऊ जेवना निर्गुण -निराकार ब्रह्म के कथा के बात करत बाड़न, ऊ कथा त निर्भयता प्रदान करने वाला बा; बाकिर एह कथा के रहस्य के बूझ लिहल सबके बूता के बात ना हो सके -‘निर्भय कथा कौन सूँ कहियो, है कोई चतुर बभेकी।’

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