Bhojpuri24.com के भोजपुरी धुरंधर सीरीज में आज आप पढ़ रहे हैं शम्स जमील के बारे में। शम्स जमील का मानना है कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक स्मृति होती है। उनकी वास्तविक पहचान भोजपुरी के युवा लोककवि, संवेदनशील रचनाकार और मातृभाषा के सजग प्रहरी के रूप में है।
‘भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आत्मा, संस्कृति और पहचान है।’ इस विश्वास को अपने जीवन का उद्देश्य बनाने वाले युवा लोककवि शम्स जमील आज उन प्रवासी भोजपुरीभाषियों की आवाज़ बन चुके हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी अपनी मिट्टी की खुशबू को सीने में संजोए हुए हैं। संयुक्त अरब अमीरात के अजमान में सेफ्टी ऑफिसर के रूप में कार्यरत शम्स जमील ने यह साबित कर दिया कि यदि मन में मातृभाषा के प्रति समर्पण हो, तो सीमाएं कभी बाधा नहीं बनतीं। उनकी लेखनी भोजपुरी के सम्मान, संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना की नई पहचान बन चुकी है।
‘प्रवास देह के दूर कर सकेला, बाकिर मातृभाषा के प्रेम के कबो दूर ना कर सकेला।’
किस्मत ने बदल दी राह
बिहार के सिवान जिले के बालापुर गांव में जन्मे शम्स जमील ने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर (एम.ए.) की शिक्षा प्राप्त की। उनका सपना प्रशासनिक सेवा में जाकर समाज के लिए काम करने का था। वे पीसीएस परीक्षा की तैयारी कर रहे थे और पूरी निष्ठा से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे।
लेकिन वर्ष 2015 में उनके जीवन में ऐसा मोड़ आया जिसने सब कुछ बदल दिया। उनके छोटे भाई की भीषण सड़क दुर्घटना ने पूरे परिवार को आर्थिक संकट में डाल दिया। लाखों रुपये के इलाज के बाद परिवार की स्थिति इतनी कमजोर हो गई कि उन्हें अपने सपनों को पीछे छोड़कर रोजगार के लिए संयुक्त अरब अमीरात जाना पड़ा।
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एक संभावित प्रशासनिक अधिकारी का सपना अधूरा रह गया, लेकिन उसी अधूरे सपने ने उन्हें समाज और संवेदनाओं का ऐसा कवि बना दिया, जिसकी आवाज़ आज लाखों लोगों तक पहुंच रही है।
‘भोजपुरी बोले में गर्व करीं, लिखे में जिम्मेदारी निभाईं आ अगिला पीढ़ी तक एह धरोहर के पहुँचाईं।’
अपमान की एक से घटना भोजपुरी के लिए आजीवन संकल्प
हर रचनाकार के जीवन में कोई न कोई ऐसी घटना होती है जो उसकी दिशा तय करती है। शम्स जमील के साथ भी ऐसा ही हुआ।
एक निजी विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में वे भोजपुरी कविता का पाठ कर रहे थे। मंच संचालक ने बीच कार्यक्रम में उनके हाथ से माइक छीन लिया। यह केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं था, बल्कि उन्हें लगा कि उनकी मातृभाषा भोजपुरी का भी अपमान हुआ है।
यही वह क्षण था जिसने उनके भीतर एक अटूट संकल्प पैदा किया। उन्होंने उसी दिन तय किया कि अब वे केवल भोजपुरी में ही लिखेंगे और जीवन भर अपनी मातृभाषा के सम्मान, प्रचार-प्रसार और संरक्षण के लिए कार्य करेंगे। यहीं से एक सामान्य युवक भोजपुरी अस्मिता का सजग प्रहरी बन गया।
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प्रवासी मजदूरों के दर्द को शब्द देकर बने लाखों दिलों की आवाज़
संयुक्त अरब अमीरात में रहते हुए शम्स जमील ने करीब चार वर्षों तक मानसिक संघर्ष झेला। जब वे अपने सहपाठियों को प्रशासनिक अधिकारी बनते देखते, तो मन में निराशा और आत्मग्लानि घर कर जाती। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
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वर्ष 2022 में उन्होंने खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के संघर्ष पर एक भोजपुरी कविता लिखी। सोशल मीडिया पर साझा किया गया यह वीडियो देखते ही देखते लाखों लोगों तक पहुंच गया।
लोगों ने उस कविता में अपना दर्द, अपना संघर्ष और अपनी कहानी देखी। यही वह पल था, जब शम्स जमील की पहचान एक ऐसे लोककवि के रूप में बनी जो समाज के वास्तविक जीवन को बेहद सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है। आज उनके साहित्य को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों में बसे भोजपुरीभाषी सम्मान के साथ पढ़ते और सुनते हैं।
‘भोजपुरी के सम्मान, हमनी के स्वाभिमान; एह अभियान में हर भोजपुरीया के योगदान जरूरी बा।’
भोजपुरी केवल भाषा नहीं, सांस्कृतिक विरासत है
शम्स जमील का मानना है कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक स्मृति होती है। उनकी रचनाओं में गांव की मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की सहजता, प्रवासी मजदूरों का संघर्ष, सामाजिक विसंगतियां, अश्लीलता के विरुद्ध आवाज़, श्रृंगार, वीर रस, व्यंग्य और समसामयिक राजनीति सभी विषय समान संवेदनशीलता के साथ दिखाई देते हैं।
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वे लगातार युवाओं से अपील करते हैं कि वे केवल भोजपुरी बोलें ही नहीं, बल्कि उसे पढ़ें, लिखें और नई पीढ़ी तक पहुंचाएं। उनका मानना है कि जब तक भाषा लेखन और साहित्य में जीवित रहेगी, तब तक उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी।
दुनिया भर में जगा रहे हैं भोजपुरी का दीप
विदेश में रहकर अपनी मातृभाषा से जुड़ाव बनाए रखना आसान नहीं होता, लेकिन शम्स जमील ने इसे अपनी ताकत बना लिया। संयुक्त अरब अमीरात के विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंचों पर वे नियमित रूप से भोजपुरी काव्य पाठ करते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से भी वे हजारों युवाओं को भोजपुरी भाषा और संस्कृति से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।

वे मानते हैं कि डिजिटल माध्यम आज भोजपुरी के लिए सबसे बड़ा अवसर है। यदि युवा सोशल मीडिया पर भोजपुरी की सकारात्मक और साहित्यिक सामग्री प्रस्तुत करें, तो यह भाषा विश्व स्तर पर नई पहचान बना सकती है।
उनकी सक्रियता ने यह सिद्ध कर दिया है कि मातृभाषा का प्रचार केवल अपने गांव या राज्य में रहकर ही नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी कोने से किया जा सकता है।
आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को स्थान दिलाना ही सबसे बड़ा सम्मान
शम्स जमील साहित्य को प्रसिद्धि या पुरस्कार प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानते। यही कारण है कि उन्होंने आज तक पुस्तक प्रकाशित करने की जल्दबाजी नहीं दिखाई। उनका विश्वास है कि किसी लेखक की असली पहचान उसकी रचनाएं होती हैं, न कि पुरस्कार।
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उनका सबसे बड़ा सपना है कि भोजपुरी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिले। वे मानते हैं कि यही वह दिन होगा जब करोड़ों भोजपुरीभाषियों के आत्मसम्मान को वास्तविक पहचान मिलेगी।
भविष्य में भी वे ऐसा साहित्य रचना चाहते हैं जो भोजपुरी भाषा, उसकी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचा सके।
शम्स जमील की यात्रा यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में मातृभाषा के प्रति प्रेम और समाज के प्रति समर्पण हो, तो व्यक्ति अपनी पहचान स्वयं गढ़ सकता है। आज वे प्रवास में रहकर भी भोजपुरी अस्मिता की मशाल को पूरी दुनिया में रोशन कर रहे हैं।



शम्स जमील जी कवनो परिचय के मोहताज़ नइखीं। इनकर रचना भोजपुरी साहित्य के समृद्ध कर रहल बा।