भोजपुरी के हक पर संसद का ‘मानदंड’ वाला अड़ंगा, मान्यता के लिए लड़ाई जारी रहेगी

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भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग छह दशक पुरानी है। यह मांग केवल भाषा के संवैधानिक दर्जे की नहीं, बल्कि पहचान, साहित्य, शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक संरक्षण से भी जुड़ी हुई है। संसद के रिकॉर्ड बताते हैं कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के सांसद समय-समय पर इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने अब तक भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 2026 में भी भोजपुरी की मांग संसद तक पहुंची, लेकिन सरकार ने फिर वही जवाब दोहराया-आठवीं अनुसूची में नई भाषाओं को शामिल करने के लिए कोई निश्चित मानदंड और समय-सीमा तय नहीं है।

भोजपुरी की मांग नई नहीं, संसद के रिकॉर्ड में दशकों पुरानी

भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने की संसदीय कोशिशों का प्रमुख नाम प्रभुनाथ सिंह रहा है। 19 दिसंबर 2002 को उन्होंने लोकसभा में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की जरूरत पर सरकार से जवाब मांगा था। उस समय सरकार ने बताया था कि भोजपुरी समेत 32 भाषाओं को शामिल करने के अनुरोध लंबित हैं और नई भाषाओं को शामिल करने के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंड विकसित करने पर विचार किया जा रहा है।

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18 दिसंबर 2006 को प्रभुनाथ सिंह ने फिर लोकसभा में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का मुद्दा उठाया। तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने सदन में कहा था कि सरकार को लंबे समय से ऐसी मांगें मिल रही हैं और भोजपुरी तथा राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए कार्रवाई शुरू की गई है। उस बहस में कई अन्य सांसदों ने भी भोजपुरी के समर्थन में अपनी बात रखी। यानी 2000 के दशक में ही भोजपुरी की मांग संसद के भीतर एक गंभीर राजनीतिक प्रश्न बन चुकी थी।

2003 का संविधान संशोधन, भोजपुरी के लिए क्यों महत्वपूर्ण था यह दौर?

भोजपुरी की मांग को समझने के लिए 2003 का दौर महत्वपूर्ण है। 92वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के जरिए बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया। इसके बाद आठवीं अनुसूची में भाषाओं की संख्या 22 हो गई। गृह मंत्रालय के अनुसार वर्तमान में यही 22 भाषाएं आठवीं अनुसूची में हैं।

यहीं से भोजपुरी समाज के बीच यह सवाल और मजबूत हुआ कि मैथिली को संवैधानिक सूची में स्थान मिलने के बाद भोजपुरी को क्यों नहीं?

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है-किसी दूसरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने से भोजपुरी को स्वतः शामिल किए जाने का संवैधानिक अधिकार नहीं बनता। हर नई भाषा के मामले में संसद के माध्यम से संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होती है।

सरकार ही सबसे बड़ी अड़चन, मानदंड निश्चित नहीं कर रही है

भोजपुरी की मान्यता की लड़ाई में सबसे बड़ा पेच ‘मानदंड’ का है। संसद में अलग-अलग समय पर कहा है कि आठवीं अनुसूची में नई भाषाओं को शामिल करने के लिए कोई अंतिम और निश्चित वस्तुनिष्ठ मानदंड निर्धारित नहीं हैं। तो सरकार को इसके लिए एक कमेटी बनानी चाहिए जो इसको आगे ले जाए लेकिन वो इसके लिए काम नहीं कर रही है?
1996 में एक समिति गठित की गई थी और उसने 1998 में अपनी रिपोर्ट दी। इसके बाद 2003 में सीताकांत महापात्रा समिति के माध्यम से भी ऐसे मानदंड विकसित करने का प्रयास हुआ। लेकिन सरकार के अनुसार ये प्रयास निर्णायक मानदंड तय करने में सफल नहीं रहे। 2026 में भी सरकार ने इसी स्थिति को दोहराया। 28 जुलाई 2026 को लोकसभा में रामाशंकर विद्यार्थी राजभर ने भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के प्रस्ताव की स्थिति और संभावित समय-सीमा पर सवाल पूछा। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जवाब दिया कि भोजपुरी समेत कई भाषाओं को शामिल करने की मांगें समय-समय पर आती रही हैं, लेकिन कोई निश्चित मानदंड नहीं है और इसलिए कोई समय-सीमा भी तय नहीं की जा सकती। यह जवाब भोजपुरी आंदोलन के लिए सबसे महत्वपूर्ण वर्तमान तथ्य है।

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प्रभुनाथ सिंह: संसद में लगातार भोजपुरी का सवाल उठाने वालों में प्रमुख

भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग को संसद में मजबूती से उठाने वाले प्रमुख नामों में प्रभुनाथ सिंह का नाम सामने आता है।

18 दिसंबर 2000 को लोकसभा में उन्होंने भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने और विश्व भोजपुरी सम्मेलन के प्रस्तावों को लागू करने की मांग उठाई थी। उस समय उन्होंने विश्व भोजपुरी सम्मेलन का उल्लेख करते हुए भोजपुरी बोलने वालों की बड़ी संख्या और भाषा को संवैधानिक मान्यता देने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

इसके बाद 19 दिसंबर 2002 को भी प्रभुनाथ सिंह ने लोकसभा में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की आवश्यकता पर सरकार से जवाब मांगा। उस बहस में उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि प्रस्तावित व्यवस्था में भोजपुरी क्षेत्र के विद्वानों और प्रतिनिधियों को उचित स्थान दिया जाएगा या नहीं।

18 दिसंबर 2006 को उन्होंने फिर इसी मुद्दे पर गृह मंत्री का ध्यान आकर्षित किया। सरकारी जवाब में बताया गया कि भोजपुरी और राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने पर कार्रवाई शुरू की जा चुकी थी।

23 अगस्त 2007 को भी प्रभुनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का मुद्दा कई सांसदों द्वारा अलग-अलग संसदीय माध्यमों से उठाया जा चुका है। इसलिए संसदीय रिकॉर्ड के आधार पर प्रभुनाथ सिंह को भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता के सवाल को बार-बार संसद में उठाने वाले प्रमुख नेताओं में रखा जा सकता है।

जगदंबिका पाल और दूसरे सांसद, मांग का विस्तार

2002 की लोकसभा बहस में तत्कालीन नेता राम विलास पासवान ने भी भोजपुरी और मैथिली की मांग का समर्थन किया था। उन्होंने सरकार से इस विषय पर निश्चित समय-सीमा बताने की मांग की थी। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता का सवाल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के नेताओं ने समय-समय पर इसका समर्थन किया।

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2009 में लोकसभा के विशेष उल्लेख में भी भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दर्ज हुई। इसमें जय प्रकाश अग्रवाल, कीर्ति आजाद, महेश्वर हजारी, शहनवाज हुसैन, अर्जुन राम मेघवाल, जगदंबिका पाल, रघुवंश प्रसाद सिंह, रेवेती रमण सिंह, तूफानी सरोज सहित अनेक सांसदों के नाम संसदीय रिकॉर्ड में दर्ज हैं।

2010 की एक संसदीय बहस में संजय निरुपम ने भी भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता की मांग का समर्थन किया। उन्होंने भोजपुरी के टेलीविजन और सिनेमा के विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि बिना सरकारी सहयोग के भी भोजपुरी ने अपना मजबूत सांस्कृतिक और मीडिया क्षेत्र बनाया है।

17 मई 2012 की लोकसभा कार्यवाही में जगदंबिका पाल ने भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने का सवाल प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि यह मांग कई वर्षों से संसद में उठती रही है और सरकार की ओर से विचार किए जाने की बात भी कही जाती रही है। इससे स्पष्ट होता है कि भोजपुरी का सवाल अलग-अलग राजनीतिक दलों और क्षेत्रों के सांसदों तक पहुंच चुका था।

2019 और 2020 में भी सांसदों का सामूहिक दबाव

भोजपुरी की मांग केवल एक-दो सांसदों तक सीमित नहीं रही। 1 जुलाई 2019 को लोकसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में कमलेश पासवान, किरीट सोलंकी, नरनभाई कच्छड़िया, पुष्पेंद्र सिंह चंदेल, रवि किशन शुक्ला, संजय जायसवाल और उदय प्रताप सिंह द्वारा भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दर्ज है।

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18 मार्च 2020 को भी लोकसभा में भोजपुरी, भोटी और राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठी। इस दौरान अर्जुन राम मेघवाल, चंद्र प्रकाश जोशी, देवजी पटेल, जगदंबिका पाल, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल, मलूक नागर, निशिकांत दुबे, राम कृपाल यादव, रितेश पांडेय सहित कई सांसदों के नाम आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। यह आंकड़ा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य सामने रखता है-भोजपुरी की मांग किसी एक पार्टी या किसी एक नेता की मांग नहीं रही है।

2022 के बाद भी संसद में उठती रही भोजपुरी की आवाज

2022 में आजमगढ़ से सांसद बने भोजपुरी अभिनेता दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने भी अपने शुरुआती संसदीय हस्तक्षेपों में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की थी। समकालीन रिपोर्टों में उनके लोकसभा वक्तव्य का उल्लेख मिलता है। 10 फरवरी 2022 को जगदंबिका पाल ने लोकसभा में भोजपुरी, राजस्थानी और भोटी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाई थी।

इसके अलावा 3 अगस्त 2023 को राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दर्ज है। इसमें अमर पटनायक, प्रकाश जावड़ेकर, राधा मोहन दास अग्रवाल, सस्मित पात्रा, सीमा द्विवेदी और रामचंद्र जांगड़ा सहित सदस्यों के नाम दर्ज हैं।

2025 में फिर सामने आया वही सवाल

19 मार्च 2025 को लोकसभा में सुनील कुमार ने विशेष उल्लेख के माध्यम से भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाई। संसदीय डिजिटल रिकॉर्ड में इसका स्पष्ट उल्लेख है। इसके बाद 6 अगस्त 2025 को विजय कुमार दुबे ने भी लोकसभा में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की जरूरत का मुद्दा उठाया।

11 फरवरी 2025 को रामाशंकर विद्यार्थी राजभर ने भी भोजपुरी की संवैधानिक मान्यता का सवाल उठाते हुए कहा कि भोजपुरी भाषी समाज लंबे समय से इस मांग को उठा रहा है। उन्होंने भोजपुरी के व्यापक सामाजिक और भौगोलिक प्रसार का भी उल्लेख किया। इससे 2025 में भी यह स्पष्ट रहा कि भोजपुरी का मुद्दा संसद में सक्रिय था।

28 जुलाई 2026: संसद में फिर गूंजा भोजपुरी के संवैधानिक अधिकार का सवाल

28 जुलाई 2026 को रामाशंकर विद्यार्थी राजभर ने लोकसभा में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को मजबूती से उठाते हुए सरकार से पूछा कि इस संबंध में प्रस्ताव की वर्तमान स्थिति क्या है और भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता कब तक दी जाएगी।

सरकार ने जवाब दिया कि भोजपुरी समेत कई भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांगें लगातार प्राप्त होती रही हैं, लेकिन नई भाषाओं को शामिल करने के लिए कोई निश्चित और सर्वमान्य मानदंड निर्धारित नहीं है। इसलिए भोजपुरी को शामिल करने की कोई निश्चित समय-सीमा भी बताना संभव नहीं है। सरकार ने इस संदर्भ में पाहवा समिति और सीताकांत महापात्रा समिति के प्रयासों का उल्लेख भी किया।

लेकिन भोजपुरी समाज के लिए यह जवाब एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है-जब सरकार ने अभी तक नई भाषाओं को संवैधानिक मान्यता देने के स्पष्ट मानदंड ही तय नहीं किए हैं, तो भोजपुरी जैसी समृद्ध और व्यापक लोकभाषा के दावे का निष्पक्ष मूल्यांकन आखिर किस आधार पर होगा?

भोजपुरी समर्थकों का तर्क है कि मान्यता की मांग को अनिश्चितकाल तक लंबित रखने के बजाय सरकार को पहले पारदर्शी मानदंड तय करने चाहिए और फिर उन मानदंडों के आधार पर भोजपुरी सहित सभी दावेदार भाषाओं का समान रूप से मूल्यांकन करना चाहिए।

भोजपुरी की मांग केवल भावनात्मक आग्रह नहीं है-यह भाषा, साहित्य, संस्कृति और करोड़ों लोगों की भाषाई पहचान से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए अब भोजपुरी समाज की नजर सिर्फ सरकार के अगले जवाब पर नहीं, बल्कि स्पष्ट नीति और ठोस निर्णय पर है।

आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने का मतलब क्या है?

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग केवल संविधान में एक नाम जोड़ने की मांग नहीं है। यह भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति और करोड़ों भोजपुरी भाषी लोगों की भाषाई पहचान और सम्मान से जुड़ा सवाल है। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएं शामिल हैं। इससे संबंधित संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 344(1) और 351 में हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद कोई भाषा अपने आप भारत की ‘राष्ट्रीय भाषा’ नहीं बन जाती। भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है।

इसी तरह भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने का यह अर्थ भी नहीं होगा कि अगले दिन से केंद्र सरकार के हर कार्यालय, हर अदालत या हर स्कूल में भोजपुरी अनिवार्य हो जाएगी।

लेकिन आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने का प्रतीकात्मक और संस्थागत महत्व बहुत बड़ा है। इससे भाषा के संरक्षण, साहित्यिक विकास, अकादमिक शोध, अनुवाद, शब्दकोश निर्माण और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए संस्थागत आधार मजबूत होने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे नई पीढ़ी के बीच भोजपुरी के भविष्य को लेकर भी भरोसा मजबूत हो सकता है।

भोजपुरी के पक्ष में केवल संख्या नहीं, मजबूत दस्तावेज भी हैं

भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के पक्ष में केवल इसके बोलने वालों की संख्या ही आधार नहीं है।

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भोजपुरी के पास समृद्ध साहित्य, लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, कहावतें, मुहावरे, व्याकरण, शब्द-संपदा और लंबे समय से चली आ रही मौखिक परंपरा का विशाल भंडार है। भोजपुरी में उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक और पत्रकारिता का भी व्यापक साहित्य उपलब्ध है। इसके अलावा भोजपुरी सिनेमा और संगीत ने भाषा को देश-विदेश तक पहुंचाया है। जरूरत है कि इस पूरी विरासत का वैज्ञानिक और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण हो, ताकि संवैधानिक मान्यता की मांग भावनात्मक नहीं, बल्कि मजबूत अकादमिक और तथ्यात्मक आधार पर भी प्रस्तुत की जा सके।

भोजपुरी की आवाज अब फैसले की मांग करती है

भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के मांग के खाली भावनात्मक मुद्दा मानल ठीक ना होई। ई हमनी के भाषा, संस्कृति, साहित्य आ भाषाई अस्मिता से जुड़ल सवाल ह। भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता खातिर लड़ाई लंबा जरूर भइल बा, बाकिर हमनी के आवाज आजो जिंदा बा—आ अब ई आवाज फैसला के मांग करतिया। आज हमनी सभे से एगो आग्रह बा-जहाँ बानी, जे हाल में बानी, भोजपुरी खातिर आवाज उठाईं। अपना जनप्रतिनिधि से सवाल करीं कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करे खातिर ऊ का पहल करत बाड़ें। अपना सोशल मीडिया पर भोजपुरी के मान्यता के सवाल उठाईं, दूसरन तक बात पहुंचाईं आ एह अभियान के आवाज बुलंद करीं। सबसे जरूरी बात-भोजपुरी बोले में कवनो झिझक मत करीं। अपना घर में, समाज में, बाजार में, मंच पर आ सोशल मीडिया पर गर्व से भोजपुरी बोलीं। हमार भाषा, हमार पहचान, हमार गौरव-भोजपुरी। भोजपुरी बोलीं, भोजपुरी लिखीं, भोजपुरी खातिर आवाज उठाईं। अब चुप ना बइठीं-मान्यता खातिर आवाज बुलंद करीं!

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

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