Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय उस साहित्य साधक का, जिसने यह साबित किया कि भाषा की कोई राजनीतिक सीमा नहीं होती। भारत और नेपाल के बीच बहने वाली सांस्कृतिक धारा में भोजपुरी को साहित्य, शोध और अकादमिक पहचान दिलाने वाले जिन चुनिंदा रचनाकारों का नाम सबसे पहले लिया जाता है, उनमें गोपाल अश्क अग्रणी हैं। दो महाकाव्यों से इतिहास को शब्द देने वाले, नेपाल भाषा आयोग के पूर्व सदस्य और संस्कृति मंत्रालय से दो बार सम्मानित गोपाल अश्क आज नेपाल में भोजपुरी साहित्य का सबसे सशक्त और सम्मानित चेहरा हैं।
नेपाल के साहित्यिक जगत में उन्हें ‘भोजपुरी के महाकवि’ के रूप में सम्मान दिया जाता है। कविता, महाकाव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, व्याकरण, शोध, आलोचना, अनुवाद और शब्दकोश- ऐसी शायद ही कोई विधा हो, जिसमें उन्होंने उल्लेखनीय योगदान न दिया हो। अब तक उनकी 52 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 13 पुस्तकें भोजपुरी भाषा की हैं। गोपाल अश्क (वास्तविक नाम: गोपालप्रसाद सर्राफ) का जन्म 3 अक्टूबर 1962 (वि.सं. 2018, असोज 3) को भेडियारी, पर्सा जिला, नेपाल में हुआ। वे नेपाल के अग्रणी भोजपुरी साहित्यकार, महाकवि, ग़ज़लकार, कथाकार और शोधकर्ता हैं।
आंदोलनों का इतिहास लिखने वाले महाकवि
गोपाल अश्क की पहचान केवल कवि के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे साहित्यकार के रूप में भी है, जिन्होंने इतिहास के निर्णायक क्षणों को साहित्य में अमर कर दिया। उनके दो महाकाव्य विशेष रूप से चर्चित हैं। पहला है ‘धंधोर’, जो नेपाल के 2046 (1990) के जनआंदोलन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। दूसरा है ‘शंखनाद’, जो 2062–63 के मधेश आंदोलन पर आधारित है। इन दोनों कृतियों ने यह सिद्ध किया कि महाकाव्य केवल पौराणिक आख्यानों तक सीमित नहीं, बल्कि समकालीन इतिहास को भी महाकाव्यात्मक स्वर दिया जा सकता है। खुद डॉ. अश्क कहते हैं कि उनके लिए साहित्य समाज की स्मृति है और आंदोलन उस स्मृति का सबसे जीवंत अध्याय। 
गोपाल अश्क की भोजपुरी की प्रमुख कृतियां
सीमाओं से बड़ी होती है मातृभाषा
भोजपुरी को अक्सर भारत के बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की भाषा माना जाता है, लेकिन इसकी एक मजबूत पहचान नेपाल के तराई और मधेश क्षेत्र में भी है। यहां लाखों लोग भोजपुरी बोलते हैं, लेकिन लंबे समय तक इस भाषा को वह संस्थागत सम्मान नहीं मिल सका, जिसकी वह अधिकारी थी। गोपाल अश्क ने इस स्थिति को बदलने का आजीवन प्रयास किया। उन्होंने अपने लेखन से यह स्थापित किया कि नेपाल की बहुभाषिक संस्कृति में भोजपुरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण भाषा है, जितनी नेपाली या मैथिली। उनकी रचनाओं में गांव की मिट्टी, सीमांत समाज का संघर्ष, किसान, श्रमिक, पलायन, सामाजिक परिवर्तन और मानवीय संवेदनाएं पूरी जीवंतता के साथ उपस्थित होती हैं।
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राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति श्री रामचन्द्र पौडेल जी के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत करते हुए गोपाल अश्क
बहुभाषी साहित्यकार, जिन्होंने जोड़ीं तीन भाषाएं
गोपाल अश्क की सबसे बड़ी ताकत उनकी बहुभाषिक दृष्टि है। उन्होंने भोजपुरी, नेपाली और हिंदी तीनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन किया। उनका मानना है कि किसी भाषा का विकास दूसरी भाषाओं से संवाद के बिना संभव नहीं। यही सोच उन्हें एक सफल अनुवादक भी बनाती है। उन्होंने नेपाली साहित्य को हिंदी और भोजपुरी पाठकों तक पहुंचाया तथा भोजपुरी साहित्य को व्यापक पाठक वर्ग से जोड़ने का काम किया।
भाषा आयोग से लेकर साहित्य तक
गोपाल अश्क नेपाल भाषा आयोग के सदस्य भी रह चुके हैं। इस भूमिका में उन्होंने भोजपुरी सहित नेपाल की मातृभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और अकादमिक विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। वे लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि यदि किसी भाषा को भविष्य देना है तो उसे विद्यालय, विश्वविद्यालय, शोध और डिजिटल माध्यमों से जोड़ना होगा।
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गोपाल अश्क का साहित्यिक संसार अत्यंत व्यापक है। उनकी 52 प्रकाशित पुस्तकों में कविता, कहानी, उपन्यास, महाकाव्य, नाटक, व्याकरण, शोध, आलोचना, शब्दकोश और अनुवाद जैसी अनेक विधाएं शामिल हैं। भोजपुरी में उनकी चर्चित कृतियों में कजरी, कवि के जन्मकुंडली, नइहर के चुनरी, अभी बाकी बा, धंधोर, फूलवा, उ भोर ना भइल, बेकहल जिन्दगी, भोजपुरी नाटक, नेपालीय भोजपुरी साहित्यको इतिहास, भोजपुरी व्याकरण, भोजपुरी के आदिक धरोहर और भोजपुरी वर्ण-विन्यास जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं। इन कृतियों ने भोजपुरी साहित्य को केवल रचनात्मक ही नहीं, बल्कि अकादमिक और भाषावैज्ञानिक आधार भी प्रदान किया।
डॉ. तैयब हुसैन पीड़ित के साथ. (इस फोटो की क्वालिटी AI से बेहतर की गई है)
शोध और व्याकरण के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान
गोपाल अश्क केवल रचनाकार नहीं, बल्कि गंभीर शोधकर्ता और भाषाविद् भी हैं। उन्होंने भोजपुरी भाषा के इतिहास, व्याकरण, शब्द-संपदा और साहित्यिक विकास पर निरंतर काम किया। उनकी पुस्तक ‘प्रयोगात्मक भोजपुरी व्याकरण’ आज शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है। वहीं ‘नेपालीय भोजपुरी साहित्यको इतिहास’ नेपाल में भोजपुरी साहित्य के विकास का पहला व्यवस्थित दस्तावेज माना जाता है।
कविता में लोकजीवन की धड़कन
गोपाल अश्क की कविताओं में गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू है। खेत, किसान, मजदूर, मां, बेटी, गांव की चौपाल, बदलते रिश्ते और सामाजिक संघर्ष उनकी कविता के प्रमुख विषय हैं। उनकी भाषा सहज, सरल और लोकजीवन से जुड़ी है। वे मानते हैं कि साहित्य तभी सार्थक है, जब वह आम आदमी की भाषा में उसकी पीड़ा और उम्मीद को अभिव्यक्त करे।
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अनुवाद से संस्कृतियों को जोड़ा
अश्क ने अनुवाद को केवल भाषाई अभ्यास नहीं माना, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बनाया। उन्होंने नेपाली की अनेक चर्चित कृतियों का हिंदी और भोजपुरी में तथा विभिन्न भाषाओं की महत्वपूर्ण रचनाओं का नेपाली में अनुवाद किया। इस कार्य ने भारत और नेपाल के साहित्यिक संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सम्मान, जो इतिहास बन गए
गोपाल अश्क को नेपाल सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने दो बार सम्मानित किया है। पहली बार भोजपुरी भाषा और साहित्य में उनके योगदान के लिए और दूसरी बार नेपाली साहित्य में उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए। उन्हें मिला महाकवि लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा राष्ट्रीय प्रतिभा पुरस्कार विशेष महत्व रखता है। यह सम्मान पाने वाले वे अब तक के एकमात्र भोजपुरी साहित्यकार हैं। यह उपलब्धि न केवल उनके लिए बल्कि पूरे भोजपुरी समाज के लिए गर्व का विषय है।

इसके अलावा उन्हें लीलाधर मिश्र स्मृति सम्मान, गंकी बसुन्या पुरस्कार, महाकवि देवकोटा पुरस्कार, लोकसाहित्य पुरस्कार, गजलश्री सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और प्रादेशिक सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।
नई पीढ़ी के प्रेरणास्रोत
गोपाल अश्क का मानना है कि डिजिटल युग क्षेत्रीय भाषाओं के लिए चुनौती नहीं, बल्कि अवसर लेकर आया है। वे युवाओं से लगातार आग्रह करते हैं कि वे अपनी मातृभाषा में लिखें, पढ़ें और शोध करें। उनके अनुसार, ‘भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय साहित्य रचने की क्षमता रखने वाली समृद्ध भाषा है।’
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भोजपुरी की वैश्विक पहचान के प्रहरी
आज जब भोजपुरी विश्वभर में करोड़ों लोगों की भाषा बन चुकी है, तब डॉ. गोपाल अश्क जैसे साहित्यकारों का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने नेपाल की धरती से यह साबित किया कि भोजपुरी किसी एक देश या राज्य की भाषा नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, इतिहास और अस्मिता की भाषा है।
नेपाल में उन्हें ‘भोजपुरी के महाकवि’ कहा जाता है, लेकिन सच यह है कि उन्होंने अपनी लेखनी से पूरे भोजपुरी समाज को गौरवान्वित किया है। उनकी साहित्य-साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है और यह विश्वास भी कि मातृभाषा की शक्ति किसी सीमा, किसी राजनीति और किसी भूगोल से छोटी नहीं होती।
प्रोफाइल
नाम: गोपाल अश्क
पहचान: महाकवि, भाषाविद्, शोधकर्ता, अनुवादक एवं आलोचक
देश: नेपाल
प्रकाशित पुस्तकें: 52 (इनमें 13 भोजपुरी की)
विशेष उपलब्धि: नेपाल भाषा आयोग के पूर्व सदस्य
विशेष सम्मान: नेपाल संस्कृति मंत्रालय से दो बार सम्मानित, महाकवि लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा राष्ट्रीय प्रतिभा पुरस्कार से सम्मानित होने वाले पहले और अब तक के एकमात्र भोजपुरी साहित्यकार।
प्रमुख कृतियां: धंधोर, शंखनाद, फूलवा, कजरी, नइहर के चुनरी, अभी बाकी बा, भोजपुरी व्याकरण, नेपालीय भोजपुरी साहित्यको इतिहास, प्रयोगात्मक भोजपुरी व्याकरण आदि।



भाई गोपाल अश्क भोजपुरी नेपाली हिन्दी और अंग्रेज़ी चारों भाषाओं में काम करते रहे हैं। हर विधा में साहित्य रचने वाले अश्क जी को हार्दिक बधाई
मेरे मीतराम को हार्दिक बधाई और भोजपुरी24.कम को भी।