कलम, स्वर और संघर्ष के संगम हैं भोजपुरी के धुरंधर डॉ. गोपाल ठाकुर

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Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज पढ़िए उस व्यक्तित्व की कहानी, जिसने भोजपुरी को किताबों, गीतों, शोध संस्थानों और संविधान तक पहुंचाने का काम किया। भाषाविज्ञान के शोधकर्ता, भोजपुरी शब्दकोश के निर्माता, गीतकार, गायक, संविधान सभा सदस्य और भाषा आयोग के अध्यक्ष रहे डॉ. गोपाल ठाकुर का पूरा जीवन मातृभाषा भोजपुरी की सेवा को समर्पित रहा।

काठमांडू: भोजपुरी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की संस्कृति, स्मृतियों और जीवन अनुभवों की अभिव्यक्ति है। भारत के बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड से लेकर नेपाल के मधेश क्षेत्र और दुनिया के कई देशों तक भोजपुरी की अपनी मजबूत पहचान है। नेपाल में 20 लाख से अधिक लोग भोजपुरी बोलते हैं। इस पहचान को वैज्ञानिक आधार देने और वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाले महान व्यक्तित्वों में नेपाल के डॉ. गोपाल ठाकुर का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है।

भाषाविज्ञान, साहित्य, संगीत और राजनीति, इन सभी क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय रहकर उन्होंने साबित किया कि मातृभाषा के प्रति समर्पण किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होता। उन्होंने भोजपुरी को केवल बोलचाल की भाषा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे शोध, शिक्षा और नीति निर्माण की भाषा बनाने के लिए जीवनभर संघर्ष किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के साथ डॉ. गोपाल ठाकुर और भाषा आयोग के उनके साथी 

कचोरवा की मिट्टी से शुरू हुई भोजपुरी साधना

डॉ. गोपाल ठाकुर का जन्म 10 जनवरी 1962 को नेपाल के बारा जिले के सिमरौनगढ़ नगरपालिका स्थित कचोरवा गांव में हुआ। मधेश की सांस्कृतिक मिट्टी में पले-बढ़े डॉ. ठाकुर को बचपन से ही भोजपुरी भाषा और लोकसंस्कृति का गहरा संस्कार मिला।

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जीवन के शुरुआती वर्षों में उन्हें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन संघर्षों ने उनके इरादों को कमजोर नहीं किया। शिक्षा के प्रति उनकी गहरी रुचि रही। अंग्रेजी और गणित जैसे विषयों में मजबूत पकड़ रखने वाले डॉ. ठाकुर आगे चलकर भाषा विज्ञान के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुए।

भोजपुरी को मिला वैज्ञानिक आधार

डॉ. गोपाल ठाकुर ने त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू से भाषाविज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने भोजपुरी भाषा की संरचना और व्याकरण पर गहन अध्ययन करते हुए ‘A Grammar of Bhojpuri’ विषय पर पीएच.डी. की।

यह शोध केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भोजपुरी को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने और दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।

उन्होंने नेपाल के भाषा सर्वेक्षण परियोजना में शोधकर्ता के रूप में कार्य किया, जहां भोजपुरी सहित कई भाषाओं के अध्ययन और दस्तावेजीकरण में योगदान दिया। उनका प्रयास रहा कि भाषाएं केवल बोलने वालों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका व्यवस्थित संरक्षण और अध्ययन भी हो।

भोजपुरी शब्दकोश और शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा योगदान

डॉ. ठाकुर का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भोजपुरी के शैक्षणिक विकास से जुड़ा है। उन्होंने नेपाल सरकार के पाठ्यक्रम विकास केंद्र के साथ मिलकर कक्षा एक से बारह तक भोजपुरी भाषा की पाठ्यपुस्तकों और शिक्षण सामग्री के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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उनके नेतृत्व में तैयार ‘प्रज्ञा भोजपुरी-भोजपुरी-नेपाली-अंग्रेजी शब्दकोश’ भोजपुरी भाषा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जाता है। इस शब्दकोश ने भोजपुरी शब्दों को व्यवस्थित रूप से संकलित कर भाषा के अध्ययन को नई दिशा दी।

उनकी अंग्रेजी में प्रकाशित पुस्तकों ने भी भोजपुरी को अंतरराष्ट्रीय शोध जगत में पहचान दिलाई। उन्होंने साबित किया कि भोजपुरी केवल लोकगीतों और बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि गंभीर अध्ययन और शोध की भाषा भी है।

भाषा अधिकार के लिए संघर्ष और राजनीतिक यात्रा

डॉ. गोपाल ठाकुर का जीवन केवल साहित्य और शोध तक सीमित नहीं रहा। वे सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से भी जुड़े रहे। मात्र 17 वर्ष की उम्र में वे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और लोकतांत्रिक अधिकारों तथा भाषाई सम्मान के लिए संघर्ष शुरू किया।

1984 में उन्हें राजनीतिक गतिविधियों के कारण जेल भी जाना पड़ा। इसके बाद उन्होंने निर्वासन और भूमिगत जीवन का भी सामना किया। लेकिन संघर्षों के बावजूद उनका विश्वास भाषा, संस्कृति और समाज के अधिकारों में बना रहा।

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नेपाल में राजतंत्र विरोधी जनआंदोलन के दौरान उन्होंने कलाकार के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भोजपुरी, मैथिली, हिंदी, नेपाली और अंग्रेजी भाषाओं में गीतों के माध्यम से उन्होंने जनचेतना फैलाने का काम किया।

2008 से 2012 तक वे नेपाल की संविधान सभा और विधायिका-संसद के सदस्य रहे। यह वह दौर था जब नेपाल नए संविधान निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा था और डॉ. ठाकुर को भाषा और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को नीति निर्माण के मंच तक पहुंचाने का अवसर मिला। मार्च 2023 से अप्रैल 2026 तक उन्होंने नेपाल भाषा आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई और भाषाई विविधता के संरक्षण के लिए काम किया।

गीतों में भी बसती है भोजपुरी की आत्मा

डॉ. ठाकुर सिर्फ भाषाविद् और लेखक ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील गायक भी हैं। वर्ष 1996 में वे रेडियो नेपाल से प्रमाणित आधुनिक गायक बने।

उन्होंने जनगीतों के माध्यम से समाज की आवाज को स्वर दिया। ‘भविष्यनिधि’ और ‘जय किसान’ जैसे गीत संग्रहों में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। ‘निर्मोहिया’, ‘नया सांस’, ‘अब का सूतब’ और ‘मास्टर साहब’ जैसे एल्बमों में उनकी रचनात्मकता देखने को मिलती है।

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उनकी गायकी नेपाल से निकलकर भारत, मॉरीशस, कतर और थाईलैंड तक पहुंची। अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलनों में उन्होंने नेपाल की सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व किया।

साहित्य में भी अमिट छाप

डॉ. गोपाल ठाकुर की साहित्यिक यात्रा भी बेहद समृद्ध रही है। उन्होंने भोजपुरी भाषा, इतिहास, व्याकरण और समाज से जुड़े कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘जनता के गीत गावत रहीं’, ‘उत्पीड़ित मधेश आ भोजपुरी’, ‘सहज भोजपुरी बरतनी’, ‘भोजपुरी वर्ण-विन्यास’ और ‘भोजपुरी के आदिम धरोहर’ जैसी पुस्तकें शामिल हैं।

2024 में प्रकाशित उनकी कृति ‘रामराजवा अंहेर’ ने भोजपुरी साहित्य में नई दृष्टि प्रस्तुत की। वहीं 2025 में प्रकाशित ‘लालपुर्जा’ भोजपुरी कहानियों का संग्रह है। डॉ. विशम्भर कुमार शर्मा के साथ मिलकर लिखी गई ‘भोजपुरी भाषा के इतिहास’ जैसी कृति ने भोजपुरी अध्ययन को और समृद्ध किया।

मॉरीशस में आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मेलन में दुनियाभर के भोजपुरी साहित्यकारों के साथ डॉ. ठाकुर

सम्मान से बड़ा है मातृभाषा का सम्मान

डॉ. गोपाल ठाकुर को उनके योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। इनमें लीलाधर मिश्र स्मृति पुरस्कार, मधेश रत्न सम्मान, अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मान और अन्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान शामिल हैं।

लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह क्षण है, जब कोई युवा भोजपुरी में लिखता है, पढ़ता है या अपनी मातृभाषा पर गर्व महसूस करता है।

भोजपुरी समाज के लिए प्रेरणा

डॉ. गोपाल ठाकुर की यात्रा बताती है कि किसी भाषा का विकास केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि शोध, शिक्षा, साहित्य और संस्थागत प्रयासों से होता है।

उन्होंने भोजपुरी को गांव की चौपाल से निकालकर विश्वविद्यालयों, शब्दकोशों, संविधान और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का काम किया। उनकी कलम ने भाषा को दस्तावेज दिया, उनकी आवाज ने उसे जन-जन तक पहुंचाया और उनके संघर्ष ने भोजपुरी को सम्मान दिलाने की राह दिखाई। आज जब भोजपुरी अपनी पहचान और अधिकार के लिए आगे बढ़ रही है, तब डॉ. गोपाल ठाकुर जैसे धुरंधरों का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक रहेगा।

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Bhojpuri24.com से बातचीत में डॉ. गोपाल ठाकुर कहते हैं कि मातृभाषा केवल बोलने की चीज नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को जीवित रखने की सबसे बड़ी शक्ति है। इसलिए न केवल सरकारों को इसका बढ़ावा देना चाहिए बल्कि आम जनता को भी इसको ख़ुशी-ख़ुशी अपनाने की जरूरत है।

1 COMMENT

  1. एक ऐसा विद्वतपुरुष जिसने भाषा को
    हर एक ढंग से प्रस्तुत कर वैश्विक क्षितिज
    पर चमकाया । गाँव से लेकर विश्वविद्यालय तक भोजपुरी का लोहा
    मनवाया । विदेशो में भी भोजपुरी को
    जानने और चाहनेवालो के लिए रास्ता
    प्रसस्त किया । भाषा विज्ञान और विभिन्न
    खोज अन्वेशण में हमेशा लगे रहला इनकी
    दैनिकी है ।

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