डॉ. विश्वनाथ प्रसाद, जिन्होंने दुनिया को बताया कि भोजपुरी भी है वैज्ञानिक भाषा

Date:

Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला में आज प्रस्तुत हैं भोजपुरी भाषा के ऐसे महान मनीषी, जिन्होंने अपनी वैज्ञानिक दृष्टि, शोध और समर्पण से भोजपुरी को विश्व पटल पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई। डॉ. विश्वनाथ प्रसाद भोजपुरी के उन विरल भाषाविदों में शामिल हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल लोकजीवन की भाषा नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र ध्वनि-व्यवस्था, वैज्ञानिक संरचना और समृद्ध भाषिक परंपरा वाली एक पूर्ण भाषा है।

भोजपुरी भाषा को आज जिस सम्मान, शोधपरक पहचान और वैज्ञानिक आधार के साथ देखा जाता है, उसकी नींव रखने वाले विद्वानों में डॉ. विश्वनाथ प्रसाद का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें भोजपुरी का प्रथम ध्वनि वैज्ञानिक (Phonetician) कहा जाता है। उन्होंने न केवल भोजपुरी की ध्वनियों का आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन किया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल लोकगीतों और बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट ध्वनि-व्यवस्था, व्याकरणिक संरचना और भाषिक परंपरा वाली एक समृद्ध भाषा है।

आज जब भोजपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज है, तब डॉ. विश्वनाथ प्रसाद का शोध पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। उन्होंने लगभग सात दशक पहले जिन तथ्यों को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया था, वे आज भी भोजपुरी की भाषिक अस्मिता के सबसे मजबूत आधार माने जाते हैं।

साधारण गांव से निकलकर बने अंतरराष्ट्रीय भाषाविद्

डॉ. विश्वनाथ प्रसाद का जन्म 30 अगस्त 1905 को तत्कालीन शाहाबाद जिले (अब बक्सर) के मुरार गांव में हुआ। उनका पैतृक संबंध बिहार के सारण जिले के छपरा नगर से था। प्रारंभिक शिक्षा छपरा जिला स्कूल से पूरी करने के बाद उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से संस्कृत और हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त कीं। साथ ही वे साहित्याचार्य, साहित्य रत्न तथा बी.एल. की डिग्रियां भी प्राप्त कर चुके थे।

उनकी मेधा और भाषाओं के प्रति गहरी रुचि ने उन्हें विदेश तक पहुंचाया। उस समय जब विदेश जाकर पढ़ाई करना बहुत कम लोगों के लिए संभव था, तब उन्होंने इंग्लैंड जाकर भाषा विज्ञान के क्षेत्र में ऐसा शोध किया जिसने भोजपुरी के इतिहास को नई दिशा दे दी।

ये भी पढ़ें-डॉ. ब्रज भूषण मिश्र, भोजपुरी शब्द, शोध और संगठन के त्रिवेणी पुरुष

भोजपुरी पर दुनिया का पहला वैज्ञानिक ध्वनि-अध्ययन

डॉ. विश्वनाथ प्रसाद की सबसे बड़ी उपलब्धि थी कैम्ब्रिज/लंदन विश्वविद्यालय में किया गया उनका ऐतिहासिक शोध ‘A Phonetic and Phonological Study of Bhojpuri’ है. सन् 1950 में पूर्ण हुए इस शोध में उन्होंने आधुनिक ध्वनि-विज्ञान प्रयोगशाला के अत्याधुनिक उपकरणों की सहायता से भोजपुरी भाषा की ध्वनियों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया। उन्होंने भोजपुरी के 72 स्वन (Speech Sounds) का क्रमबद्ध अध्ययन प्रस्तुत किया, जो उस समय किसी भी भारतीय लोकभाषा पर किया गया अत्यंत दुर्लभ और मौलिक शोध था।

यह शोध केवल भाषाविज्ञान तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने यह स्थापित किया कि भोजपुरी की अपनी स्वतंत्र ध्वनि प्रणाली है। यही कारण है कि आज भी भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए यह शोध एक आधारग्रंथ माना जाता है।

मातृभाषा के लिए छोड़ी विदेश की सुविधाएं

विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके सामने वहीं उज्ज्वल भविष्य बनाने के अनेक अवसर थे। लेकिन उन्होंने विदेश की सुविधाओं और आकर्षक जीवन को त्यागकर भारत लौटने का निर्णय लिया।

उनका मानना था कि यदि भारतीय भाषाओं पर गंभीर वैज्ञानिक शोध होना है तो यह कार्य भारत की धरती पर ही होना चाहिए। मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति उनका यही समर्पण उन्हें महान बनाता है।

अध्यापन और प्रशासन, दोनों क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान

डॉ. विश्वनाथ प्रसाद ने अपने जीवन में अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों में सेवाएं दीं। उन्होंने नालंदा कॉलेज, बिहारशरीफ में संस्कृत के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। इसके बाद टी.एन.बी. कॉलेज, भागलपुर में हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे। लगभग डेढ़ दशक तक पटना विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रहे। पुणे स्थित प्रसिद्ध डेक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में भाषाविज्ञान के प्रथम विजिटिंग प्रोफेसर बने। आगरा विश्वविद्यालय के के.एम. मुंशी हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विद्यापीठ के निदेशक रहे। भारत सरकार के हिन्दी निदेशालय तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी आयोग में महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्व निभाए।

भारत की पहली ध्वनि-विज्ञान प्रयोगशाला की स्थापना

लंदन में शोध करते समय उन्हें जिस आधुनिक प्रयोगशाला का अनुभव मिला था, वैसी सुविधा भारत में नहीं थी। भारत लौटने के बाद उन्होंने इस कमी को महसूस किया और आगरा में के.एम. मुंशी हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विद्यापीठ में भारत की पहली आधुनिक ध्वनि-विज्ञान प्रयोगशाला (Speech Laboratory) की स्थापना की।

यह प्रयोगशाला केवल हिन्दी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश की पहली ऐसी प्रयोगशाला थी जहां भाषाओं के उच्चारण, ध्वनि और स्वराघात का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता था। इस प्रयोगशाला का उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया। उन्होंने कहा था कि ‘उच्चारण भाषा का अविभाज्य अंग है। हमें आशा है कि डॉ. विश्वनाथ प्रसाद के अनुसंधान भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिन्दी, के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।’ यह वक्तव्य स्वयं डॉ. विश्वनाथ प्रसाद के कार्य की ऐतिहासिक महत्ता को प्रमाणित करता है।

  ये भी पढ़ें- भोजपुरी साहित्य के हर विधा के सजग प्रहरी हैं कनक किशोर

भोजपुरी को बोली नहीं, वैज्ञानिक भाषा सिद्ध किया

एक समय ऐसा था जब कुछ विद्वान भोजपुरी को केवल लोकभाषा या बोली मानते थे। डॉ. विश्वनाथ प्रसाद ने अपने शोध और लेखन के माध्यम से इस धारणा को चुनौती दी। उन्होंने सिद्ध किया कि-
भोजपुरी की अपनी स्वतंत्र ध्वनि-प्रणाली है।
इसकी स्वर-व्यवस्था अत्यंत विकसित है।
भाषा में लय, स्वराघात और रागात्मकता का अद्भुत संतुलन है।
भोजपुरी की ध्वनि-प्रकृति भारतीय वैदिक भाषाई परंपरा से जुड़ी हुई है।
भोजपुरी का अपना समृद्ध साहित्यिक इतिहास है।
उनकी इन स्थापनाओं ने भोजपुरी को केवल लोकभाषा मानने वाले विचारों को वैज्ञानिक रूप से खंडित कर दिया।

कोश निर्माण और भाषा अनुसंधान में भी अमूल्य योगदान

डॉ. विश्वनाथ प्रसाद केवल ध्वनि वैज्ञानिक ही नहीं थे, बल्कि उत्कृष्ट कोशकार और संपादक भी थे। उन्होंने बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा प्रकाशित ‘कृषि कोश’ के प्रथम खंड का संपादन किया। बाबू दुर्गा प्रसाद सिंह के ऐतिहासिक ग्रंथ ‘भोजपुरी के कवि और काव्य’ का संपादन किया। भारतीय भाषाओं की पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में योगदान दिया। विभिन्न भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण तथा तुलनात्मक अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी संपादकीय टिप्पणियां आज भी भोजपुरी भाषा के इतिहास और साहित्य को समझने का विश्वसनीय स्रोत मानी जाती हैं।

बाबा भोजपुरिया
बाबा भोजपुरियाhttp://bhojpuri24.com
पत्रकारिता में करीब 20 वर्षों का अनुभव है। भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। भोजपुरी संस्कृति, भाषा, खानपान, पहनावे और लोकगीतों के संरक्षण व संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं।

1 COMMENT

  1. डॉ० प्रसाद का भोजपुरी के भाषा वैज्ञानिक अध्ययन के महत्वपूर्ण है। उनके शोधप्रबंध का भोजपुरी अनुवाद प्रकाशित होना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

भोजपुरी के सोहर में आजो जनमेलन बनवारी, नंद के लाला से मन के कन्हैया तक

-डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी कुछ दृश्य उम्र के साथ धुँधले...

लोक-संस्कृति की अमर धरोहर, जनवादी कविराज-गीतकार शैलेंद्र

 डॉ. संतोष पटेल जन्मदिन विशेष: शैलेंद्र ने भारत की पहली...

‘गंगा रतन बिदेसी’ भोजपुरी उपन्यास में प्रवासी जीवन की पीड़ा

समीक्षक: प्रकाश प्रियांशु भोजपुरी साहित्य धारा में उपन्यास विधा अपेक्षाकृत...