भोजपुरी के पहले ऑर्केस्ट्रा बैंड के शिल्पी मोहम्मद खलील, जिनकी आवाज में बसती थी लोकमाटी की खुशबू
Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी पुरोधा’ श्रृंखला में आज पढ़िए उस महान लोकगायक की कहानी, जिसने अपनी मखमली आवाज से भोजपुरी लोकसंगीत को नई पहचान दिलाई। लोकगीतों के साधक, मंचीय गायकी के लोकप्रिय कलाकार, ‘झंकार पार्टी’ के प्रमुख स्तंभ और भोजपुरी संस्कृति के संवाहक मोहम्मद खलील का पूरा जीवन मातृभाषा भोजपुरी, लोकपरंपरा और संगीत साधना को समर्पित रहा। उनकी आवाज़ में भोजपुरी मिट्टी की खुशबू थी, जिसने पीढ़ियों तक श्रोताओं के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी।
भोजपुरी लोकसंगीत का इतिहास केवल गीतों और धुनों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन साधकों की तपस्या का भी इतिहास है, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से भोजपुरी भाषा और संस्कृति को सम्मान दिलाया। ऐसे ही अमर लोकगायक थे मोहम्मद खलील, जिनकी मखमली आवाज ने भोजपुरी गायकी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने उस दौर में भोजपुरी को प्रतिष्ठा दिलाई, जब लोकगीत मनोरंजन के साथ-साथ समाज की संवेदनाओं, संस्कृति और साहित्य का दर्पण हुआ करते थे।
आज जब भोजपुरी संगीत का एक बड़ा हिस्सा बाजारवाद और फूहड़ता की बहस में उलझा दिखाई देता है, तब मोहम्मद खलील का नाम एक ऐसे कलाकार के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने पूरी जिंदगी शालीनता, साहित्यिकता और लोकसंस्कृति की मर्यादा को अपनी गायकी का आधार बनाया। उनकी आवाज में मिठास थी, प्रस्तुति में आत्मीयता थी और गीतों में लोकजीवन की सोंधी खुशबू। यही कारण है कि दशकों बाद भी उनके गीत भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक धरोहर माने जाते हैं।
मोतीहारी की मिट्टी से निकला सुरों का अनमोल रत्न
मोहम्मद खलील का जन्म सन 1935-36 में भवानीपुर जिराट, मोतीहारी (वर्तमान में इसे बापू धाम कहा जा रहा है), पूर्वी चम्पारन में हुआ था। इनके पिता शेख मोहम्मुदीन का देहांत बचपन में ही हो गया था। इस कारण से इनकी शिक्षा-दीक्षा बहुत नहीं हो पाई। उनके बड़े पुत्र आजाद के अनुसार, उनके अब्बा पढ़े-लिखे थे। संभवतः प्राथमिक शिक्षा मिली थी उन्हें। मोहम्मद खलील के बड़े भाई मोहम्मद क़ासिम रेलवे में ड्राइवर थे और बनारस में रेलवे क्वार्टर में रहते थे इसलिए पिता के देहांत के बाद खलील बनारस आ गये।
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मोहम्मद खलील को गाने-बजाने का शौक था। बलिया में रेलवे कर्मचारी रहते उन्होंने वहां ‘पूर्वांचल झंकार पार्टी’ नामक एक गायन दल बना लिया। बलिया के सीताराम चतुर्वेदी, भोजपुरी में गीत लिखा करते थे। वह खलील की गायकी से बहुत प्रभावित थे। उनका एक गीत था- छलकल गगरिया मोर निरमोहिया। इस गीत को उन्होंने खलील को दिया। खलील ने गीत की जो धुन बनायी और जिस लय से गाया, वह वाह-वाही लूट ले गया। चारों ओर खलील की गायकी का डंका बजने लगा। उनकी प्रस्तुतियों में हजारों श्रोता जुटते थे और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी लोग उनके गीत गुनगुनाते रहते थे।
आवाज जिसने लोगों के दिल जीत लिए
मोहम्मद खलील की सबसे बड़ी ताकत उनकी आवाज थी। उसमें न बनावट थी, न कृत्रिमता। उनकी गायकी में लोकजीवन की सहजता, शास्त्रीय संगीत की मिठास और शब्दों के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता था। वे गीत केवल गाते नहीं थे, बल्कि उसके भावों को जीते थे। उनकी प्रस्तुति में दर्द हो तो श्रोता की आंखें नम हो जाती थीं और उल्लास हो तो पूरा माहौल झूम उठता था।
उनकी लोकप्रियता का पहला बड़ा आधार बना गीत – ‘अजब सनेहिया बा तोर निरमोहिया…’ जिसे पंडित सीताराम चतुर्वेदी ने लिखा था। इसके बाद उन्होंने महेंद्र मिसिर की अमर रचना-‘अंगुरी में डसले बिया नगिनिया, ए ननदी दीयरा जरा द…’ को अपनी आवाज दी। यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि भोजपुरी अंचल के गांव-गांव में गूंजने लगा। रेडियो, मंच और मेलों में यह गीत लोगों की पहली पसंद बन गया।
‘आहि रे बालम चिरई’ से मिली अमर पहचान
यदि मोहम्मद खलील की पहचान किसी एक गीत से सबसे अधिक जुड़ी है, तो वह है ‘आहि रे बालम चिरई…’
कवना खोतवा में लुकइलू, आहि रे बालम चिरई ।
बन-बन ढूँढलीं, दर-दर ढूँढलीं, ढूँढलीं नदी के तीरे,
साँझ के ढूँढलीं, रात के ढूँढलीं, ढूँढलीं होत फजीरे
जन में ढूँढलीं, मन में ढूँढलीं, ढूँढलीं बीच बजारे,
हिया हिया में पैस के ढूँढलीं, ढूँढलीं बिरह के मारे
कवने अतरे में, कवने अतरे में समइलू, आहि रे बालम चिरई ।
गीत के हर घड़ी से पूछलीं, पूछलीं राग मिलन से,
छंद छंद लय ताल से पूछलीं, पूछलीं सुर के मन से
किरन किरन से जाके पूछलीं, पूछलीं नील गगन से,
धरती और पाताल से पूछलीं, पूछलीं मस्त पवन से
कवने सुगना पर, कवने सुगना पर लुभइलू, आहि रे बालम चिरई ।
मंदिर से मस्जिद तक देखली, गिरजा से गुरूद्वारा,
गीता और कुरान में देखलीं, देखलीं तीरथ सारा
पंडित से मुल्ला तक देखलीं, देखलीं घरे कसाई,
सगरी उमिरिया छछनत जियरा, कैसे तोहके पाईं
कवने बतिया पर, कवने बतिया पर कोन्हइलू, आहि रे बालम चिरई ।
कवने खोतवा में लुकइलू, आहि रे बालम चिरई ।
आहि रे बालम चिरई, आहि रे बालम चिरई ॥
भोलानाथ गहमरी द्वारा लिखे गए इस गीत को मोहम्मद खलील ने अपनी मधुर आवाज से अमर बना दिया। आज भी इसे भोजपुरी लोकसंगीत के श्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है। साहित्यकार ई.एस.डी. ओझा अपने संस्मरणों में लिखते हैं कि उन्होंने 1977 में पहली बार गोरखपुर आकाशवाणी से यह गीत सुना। गीत समाप्त होने के बाद भी उसकी मिठास देर तक मन में बनी रही। वर्षों बाद लद्दाख महोत्सव में जब उनकी मुलाकात मोहम्मद खलील से हुई तो उन्होंने विशेष आग्रह पर यही गीत सुनाया। ओझा ने उस क्षण को अपने जीवन की सबसे मधुर सांस्कृतिक स्मृतियों में शामिल किया।
इलाहाबाद बना कर्मभूमि
वर्ष 1965 में रेलवे सेवा के दौरान मोहम्मद खलील का स्थानांतरण इलाहाबाद (अब प्रयागराज) हो गया। यहीं से उनके संगीत जीवन का दूसरा और अधिक प्रभावशाली दौर शुरू हुआ। उन्होंने इलाहाबाद में नई झंकार पार्टी का गठन किया और पूरे उत्तर भारत में मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से भोजपुरी संगीत का परचम लहराया।

उनके साथ हारमोनियम पर चंदर परदेशी जैसे कलाकार जुड़े। शुरुआती दिनों में खलील स्वयं हारमोनियम नहीं बजाते थे, लेकिन अपनी गायकी के दम पर उन्होंने ऐसी पहचान बनाई कि वाद्ययंत्रों से अधिक लोग उनकी आवाज सुनने आते थे। चंदर परदेशी और मोहम्मद खलील की जोड़ी लंबे समय तक भोजपुरी मंचों की शान बनी रही।
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साहित्य और संगीत का अद्भुत संगम
मोहम्मद खलील की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि उस समय के प्रतिष्ठित साहित्यकार और कवि उनके लिए गीत लिखना सम्मान की बात मानते थे। उनके लिए जिन रचनाकारों ने गीत लिखे, उनमें महेंद्र मिसिर, भोलानाथ गहमरी, उमाकांत मालवीय, शंभुनाथ सिंह, उमाशंकर तिवारी, मोती बी.ए., हरिराम द्विवेदी, राहगीर बनारसी, बेकल उत्साही जैसे बड़े नाम शामिल हैं। यह उस दौर का स्वर्णिम अध्याय था, जब भोजपुरी गीत साहित्य और लोकसंगीत का सुंदर संगम हुआ करते थे। मोहम्मद खलील ने इन रचनाओं को अपनी आवाज़ देकर उन्हें जन-जन तक पहुंचाया।
नौशाद भी थे प्रशंसक, गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रतीक
लोकगायकी की दुनिया में मोहम्मद खलील की पहचान इतनी मजबूत थी कि हिंदी फिल्म संगीत के महान संगीतकार नौशाद भी उनकी गायकी से प्रभावित बताए जाते हैं। उनकी आवाज़ में लोकधुनों की आत्मीयता और शास्त्रीय संगीत की गहराई का अद्भुत मेल दिखाई देता था। यही कारण था कि मंच पर उनका हर गीत श्रोताओं के दिलों तक सीधे पहुंचता था।
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मोहम्मद खलील केवल महान गायक ही नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक समरसता के भी प्रतीक थे। वे हर मंचीय कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की वंदना से करते थे -‘माई मोरा गीतिया में अस रस भरि दे…’ एक मुस्लिम कलाकार द्वारा मां सरस्वती की वंदना से कार्यक्रम आरंभ करना उस भारतीय गंगा-जमुनी संस्कृति का जीवंत उदाहरण था, जिसमें कला और संस्कृति किसी धर्म या जाति की सीमाओं में बंधी नहीं होती। उनका जीवन यह संदेश देता है कि कलाकार की सबसे बड़ी पहचान उसकी साधना होती है।
अश्लीलता से दूर, लोकसंस्कृति के प्रहरी
जब भोजपुरी संगीत में व्यावसायिकता का प्रभाव बढ़ने लगा, तब भी मोहम्मद खलील ने कभी अपनी गायकी की गरिमा से समझौता नहीं किया। उन्होंने हमेशा ऐसे गीत चुने, जिनमें परिवार, समाज, रिश्ते, प्रेम, विरह, लोकपरंपरा और मानवीय संवेदनाएं हों। उनकी मान्यता थी कि लोकगीत समाज का संस्कार बनाते हैं, इसलिए उनमें मर्यादा और साहित्यिकता का होना आवश्यक है। यही कारण है कि आज भी संगीत प्रेमी उनकी गायकी को भोजपुरी के स्वर्णिम दौर का प्रतिनिधि मानते हैं।
कुशीनगर लोकरंग के संस्थापक सुभाष चंद्र कुशवाहा कहते हैं कि देखा जाये तो खलील जैसी भोजपुरी गायकी परंपरा अब गायब है। उन्हीं के शब्दों में कहा जा सकता है कि वह गायकी लुका गई है। उनके स्वर में यह मार्मिक निर्गुन गीत, मन को सुकुन देता है-
अइसन पलंगिया बनइहा बलमुवा
हिले ना कवनो अलंगीया हो राम
हरे-हरे बसवा के पाटिया बनइहा
सुंदर बनइहा डसानवा
ता उपर दुलहिन बन सोइब
उपरा से तनिहा चदरिया हो राम
अइसन पलंगीया…..
पहिले तू रेशम के साडी पहिनइह
नकिया में सोने के नथुनिया
अब कइसे भार सही हई देहियाँ
मती दिहा मोटकी कफनिया हो राम
अईसन पलंगिया…….
लाल गाल लाल होठ राख होई जाई
जर जाई चाँद सी टिकुलिया
खाड़ बलम सब देखत रहबा
चली नाही एकहू अकिलिया हो राम
अइसन पलंगिया……..
केकरा के तू पतिया पेठइबा
केकरा के कहबा दुलहिनिया
कवन पता तोहके बतलाइब
अजबे ओह देस के चलनिया हो राम
अइसन पलंगिया……..
चुन चुन कलियन के सेज सजइहा
खूब करिहा रूप के बखानवा
सुंदर चिता सजा के मोर बलमू
फूंकी दिहा सुघर बदनियाँ हो राम
अइसन पलंगिया…….
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज जब भोजपुरी संगीत नई चुनौतियों और नए अवसरों के दौर से गुजर रहा है, तब मोहम्मद खलील का जीवन नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित किया कि लोकप्रियता पाने के लिए शोर नहीं, बल्कि सुरों की साधना, भाषा के प्रति सम्मान और लोकसंस्कृति के प्रति समर्पण जरूरी है।
उनकी गायकी हमें याद दिलाती है कि भोजपुरी केवल एक बोली नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान है। यदि इस पहचान को सम्मान देना है तो मोहम्मद खलील जैसे लोकगायकों की परंपरा को आगे बढ़ाना होगा।
अंत में मैं तो यही कहूंगा कि मोहम्मद खलील केवल एक लोकगायक नहीं थे, बल्कि भोजपुरी संस्कृति के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने अपनी मखमली आवाज से भाषा को नई प्रतिष्ठा दिलाई। उन्होंने मंचों पर भोजपुरी को सम्मान दिलाया, साहित्यकारों की रचनाओं को जन-जन तक पहुंचाया और यह साबित किया कि लोकसंगीत समाज की आत्मा होता है।
आज जब उनके गीत फिर से नई पीढ़ी सुन रही है, तब यह कहना गलत नहीं होगा कि मोहम्मद खलील की आवाज भले ही मौन हो गई हो, लेकिन उनके सुर आज भी भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक चेतना में जीवित हैं। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है और यही उन्हें भोजपुरी लोकगायकी के अमर ‘भोजपुरी पुरोधा’ के रूप में स्थापित करती है।


मेरे पसंदीदा गायक थे।गोरखपुर आकाशवाणी से भोलानाथ गहमरी का लिखा गीत ,,,,,,,करने खोतवा में,,,,,,बहुत पसंद था
खलील और उनकी झनकार पार्टी को सुनने का मौका मिला था और गवाने का भी। प्रभावशाली।