Bhojpuri24.com की ‘भोजपुरी धुरंधर’ श्रृंखला में आज पढ़िए ऐसे कर्मयोगी की कहानी, जिन्होंने साहित्य, पत्रकारिता, समाज सेवा और जनआंदोलन को भोजपुरी भाषा के सम्मान से जोड़ दिया। डॉ. जनार्दन सिंह ‘नेताजी’ उन विरले व्यक्तित्वों में हैं, जिन्होंने पाँच दशकों से अधिक समय तक भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और संवैधानिक सम्मान के लिए निरंतर संघर्ष किया।
12 मार्च 1955 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के मिश्रौली गाँव में जन्मे डॉ. जनार्दन सिंह ने प्रारंभ से ही समाज और मातृभाषा के प्रति गहरी संवेदनशीलता दिखाई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने आरामदायक जीवन का रास्ता नहीं चुना, बल्कि भोजपुरी भाषा और समाज की सेवा को अपना जीवन-ध्येय बना लिया।
छात्र जीवन में वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े। लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनचेतना के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने जेल यात्रा भी की। यही संघर्ष आगे चलकर भोजपुरी आंदोलन की उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
उनका मानना रहा कि ‘जिस समाज को अपनी भाषा पर गर्व नहीं होता, वह अपनी सांस्कृतिक पहचान भी धीरे-धीरे खो देता है।’ यही विचार उनके पूरे जीवन की दिशा बन गया।
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पाँच दशकों से भोजपुरी अस्मिता के प्रहरी
डॉ. जनार्दन सिंह का सबसे बड़ा योगदान भोजपुरी भाषा को जनआंदोलन से जोड़ना है। वर्ष 1972 से लेकर आज तक वे भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने, उसके प्रचार-प्रसार और सामाजिक सम्मान के लिए लगातार सक्रिय रहे हैं।
धरना-प्रदर्शन, मशाल जुलूस, जनसभाएँ, संगोष्ठियाँ, साहित्यिक सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने भोजपुरी के पक्ष में जनमत तैयार किया। उन्होंने हमेशा यह संदेश दिया कि भोजपुरी केवल घर की भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान है।
वे मानते हैं कि भाषा का विकास केवल साहित्यकारों से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से होता है। यही कारण है कि उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को मातृभाषा के महत्व से जोड़ा।
साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से जगाई चेतना
डॉ. जनार्दन सिंह केवल आंदोलनकारी नहीं, बल्कि एक सशक्त लेखक और पत्रकार भी हैं। उन्होंने भोजपुरी और हिन्दी में अनेक लेख, टिप्पणियाँ और सामाजिक विषयों पर विचारपरक सामग्री लिखी। उनके लेखों में भोजपुरी समाज की समस्याएँ, भाषा की चुनौतियाँ और सांस्कृतिक चेतना प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं।
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उन्होंने ‘भोजपुरिया अमन’ जैसी भोजपुरी पत्रिका का प्रधान संपादन किया। इसके अलावा ‘भोजपुरी राज्य संदेश’, ‘महाभोजपुर’, ‘भोजपुरी वार्ता’ सहित कई पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने भोजपुरी भाषा की समस्याओं और संभावनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
उनकी लेखनी हमेशा समाज से जुड़ी रही। उन्होंने साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का औजार माना।

संगठन निर्माण में निभाई अग्रणी भूमिका
डॉ. जनार्दन सिंह की पहचान एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में भी रही है। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संस्थाओं में नेतृत्व करते हुए भोजपुरी आंदोलन को संगठित स्वरूप प्रदान किया।
वे प्रगतिशील भोजपुरी समाज, वाराणसी के केंद्रीय महासचिव रहे। इसके अलावा विश्व भोजपुरी परिषद, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, उत्तर प्रदेश भोजपुरी संघ, भोजपुरी ग्राम्य विकास परिषद सहित अनेक संस्थाओं से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ जुड़े रहे।
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उन्होंने हमेशा कहा कि भाषा की लड़ाई अकेले लेखक नहीं जीत सकते। इसके लिए साहित्यकार, पत्रकार, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा पीढ़ी को एक मंच पर आना होगा। इसी सोच के कारण वे जीवनभर संगठन निर्माण को प्राथमिकता देते रहे।

समाज सेवा और भोजपुरी का अद्भुत संगम
डॉ. जनार्दन सिंह ने साहित्य को समाज से अलग कभी नहीं माना। वे ग्रामीण शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के मुद्दों पर भी लगातार सक्रिय रहे।
1983 से 1987 के बीच आनंद मार्ग यूनिवर्सल रिलीफ टीम (AMURT) के माध्यम से उन्होंने फिलीपींस, सिंगापुर, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में चिकित्सा एवं सेवा कार्यों में भाग लिया। भारत लौटने के बाद उन्होंने सूचना के अधिकार, ग्रामीण विकास, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के अनेक अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई।
उनका विश्वास रहा कि भाषा तभी जीवित रहती है, जब उसके बोलने वाले समाज का विकास भी साथ-साथ हो।
सम्मानों से कहीं बड़ा है उनका योगदान
डॉ. जनार्दन सिंह को देश-विदेश की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। उन्हें भोजपुरी रत्न, भोजपुरी गौरव सम्मान, वीर कुंवर सिंह सम्मान, भोजपुरी जनक सारस्वत सम्मान, भोजपुरी पुरोधा सम्मान, हिन्दी रत्न सम्मान, चंपारण गौरव सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं।
नेपाल, दिल्ली, मुंबई, वाराणसी, पटना, भोपाल, जयपुर, रांची और देश के अनेक शहरों में उन्हें भोजपुरी भाषा और समाज के लिए किए गए योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
लेकिन स्वयं डॉ. जनार्दन सिंह हमेशा कहते हैं कि उनका सबसे बड़ा सम्मान वह दिन होगा, जब भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलेगा और नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा पर गर्व करेगी।
भोजपुरी धरोहर के सच्चे प्रहरी
आज जब भोजपुरी डिजिटल माध्यमों के जरिए दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही है, तब डॉ. जनार्दन सिंह जैसे व्यक्तित्व और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भाषा की सेवा केवल कविता या कहानी लिखने से नहीं होती, बल्कि समाज को जोड़ने, संस्थाएँ खड़ी करने, नई पीढ़ी को प्रेरित करने और निरंतर संघर्ष करने से होती है।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि समर्पण सच्चा हो तो एक व्यक्ति भी भाषा आंदोलन की मजबूत नींव बन सकता है। वे साहित्यकार भी हैं, पत्रकार भी, समाजसेवी भी और भोजपुरी अस्मिता के सजग प्रहरी भी।

