‘देखावा के जिनगी’ में महकत बा भोजपुरी माटी के सोंध

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राम नाथ बेख़बर (वरिष्ठ साहित्यकार)

भोजपुरी ग़ज़ल के युवा हस्ताक्षर नूरैन अंसारी कवनो परिचय के मोहताज नइखीं। इहां के भोजपुरी के एगो बहुत समर्थ कवि आ ग़ज़लकार बानी। भोजपुरी लेखन के क्षेत्र में नूरैन साहेब के नाव बड़ा आदर से लिहल जाला। अंसारी जी भोजपुरी में लगातार कविता आ ग़ज़ल के रचना करत रहल बानी। ‘देखावा के जिनगी’ नूरैन साहेब के चउथा ग़ज़ल संग्रह ह। एकरा पहिले इनकर तीन गो ग़ज़ल संग्रह (वक़्त के परिंदे,अपनइत,बिखरे हुए ख़्वाब) अउर एगो कविता संग्रह (कुछ तो बात है) प्रकाशित हो चुकल बा। ‘देखावा के जिनगी’ में कुल 75 गो सतरंगी ग़ज़ल संकलित बाड़ी स। इनकर एह संग्रह में बिहारी माटी के महक बा। इ एगो अइसन ग़ज़ल संग्रह बा जवना में बिहार के ना खाली सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित बा बल्कि संरक्षित भी बा। नूरैन जी अपना गँवई समाज में जवन जिअले बाड़े, देखले बाड़े अउर अनुभव कइले बाड़ें, ओकरे के इ संग्रह में हूबहू हमनीं तक पहुँचावे के प्रयास कइले बाड़े I गाँव के प्रति शायर के मन में विशेष लगाव बा। मिसाल के तौर पर कुछ शेर देखीं:-

आईं, गाँव पुकारत बाटे
रस्ता केहू निहारत बाटे

असरा में केहू अचरा से
रोज़ दुवार बहारत बाटे

रोज़ उमीद से ताखा पर अब
ऐगो दियना बारत बाटे

इनकर ग़ज़लन के क्षेत्र बहुत व्यापक बा। एह ग़ज़लन में एक ओर घर बा परिवार बा त ओहिजे दोसरा ओर गँवई समाज बा। अतने ना एह में खेत बा,खलिहान बा,बाग़ बा,बगइचा बा।

अंसारी जी के हर रिश्ता के निभावे बहुत बढ़िया तरह से आवेला। इनकर इ संग्रह में बाबू,माई,बाबा,ईया,भईया, भउजी, बेटी,बेटा,बहिन के उपर भी कई गो शेर बा। बच्चा से लेके बुढ़-पुरनिया पर कुछ न कुछ जरूर पढ़े के मिल जाई।कुछ शेर रउवो देखीं:- 

बाबूजी के टूटल लाठी
केहू नाही सम्हारत बाटे

रउआ ख़ातिर बुढ़ पुरनीया
नेह के गगरी ढारत बाटे

साख आपन हमेशा बचावत रहीं
रिश्ता-नाता के मन से निभावत रहीं

सिर उठल बा झुकी ना तनिक भी इहाँ
सिर बुजुर्गन के आगे झुकावत रहीं

प्रकृति, प्रेम आ समाज के हर चित्र एह संग्रह के विशेष बनावत बा।
मूलतः गँवई समाज के होखे के नाते नूरैन जी गाँव के हर एक रंग से बड़ी अच्छा से परिचित बानी I नूरैन जी गाँव में ही हँसत- खेलत,उछलत-कूदत बड़ भइल बानी। एहि से इ ग़ज़लन में गाँव-देहात के व्यापक जन जीवन के बहुत बढ़िया चित्रण भइल बा। एह सन्दर्भ में कुछ शेर देखीं :-

जब से वीडियो हमरा गावें आइल बा
हर इक लइका गँउवा के बउराइल बा

जाने कवन नगर से घामा आइल बा
सगरी हरियर-हरियर गांछ सुखाइल बा

लैला के चक्कर में हमरा टोला में
एगो मजनू राते खूब धुनाइल बा

नूरैन जी के ग़ज़लन में वर्तमान सामाजिक परिवेश आ रोज-रोज गिरत,तार-तार होखत मानवीय मूल्य के बहुत सुंदर चित्रण भइल बा। आज जिनिगी के हर महत्वपूर्ण पहलुअन के क्षरण बड़ी तेजी के साथ हो रहल बा। जेकरा कारण से हमनी के घर,परिवार व समाज के बहुत तेजी से पतन हो रहल बा। हर आमदी भीड़ में अकेले बा। पीड़ा,घुटन आ संत्रास के दंश झेले के मजबूर बा। 

आम आमदी के दुख-दरद के चित्रण में हुसैन जी के अद्भुत सफलता मिलल बा।भय,भूख आ भ्र्ष्टाचार के चित्रण में इनकर कलम के ताकत देखते बनत बा।सब कुछ बहुत स्वाभाविकता से कहल गइल बा। कहीं कवनो बनावटीपन न इखे। कुछ बानगी रउओ देखीं-

भूख कहँवा सँभारल गइल
हाथ सगरो पसारल गइल

माई गिरली इ सुनके ख़बर
बेटी ससुरा में जारल गइल

करजा उतरल मुड़ी से न रउवा कभी
सूद पर सूद रोजे चुकावत रहीं

कवि के व्यक्ति,समाज आ देश के चिंता भीतर-भीतर खा रहल बिया। कवि के अपना देश आ समाज से बहुते लगाव बा। बतौर उदाहरण एगो शेर देखीं:-

दुनिया में त देश बहुत बा
पर भारत विशेष बहुत बा

ग़ज़लकार नूरैन जी के हर ग़ज़ल में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एकदम साफ झलक रहल बा। हर ग़ज़ल जीवन के बेहतरी के कोशिश करत प्रतीत हो रहल बाड़ी सन। अगर जीवन में मुश्किल बा त ओकर हल भी बा। कबो जिनगी में हताश-निराश ना होखे के चाहीं। एह सन्दर्भ में कुछ शेर देखीं सभे:-

एक लेखा ना गीत होखेला
हार के बाद जीत होखेला

जियेम तऽ ज़िनगी पहाड़ नइखे.
क़ौना मुश्किल के जुगाड़ नइखे.

संघर्ष के नाम जीवन ह। नूरैन साहेब के रचना में जीवन के प्रति संघर्ष के भाव साफ-साफ दिखाई पड़ रहल बा। बक़ौल शायर:-

ज़िनगी नाच नचावत बिया
कहवा हाथ में आवत बिया

खुलके साँस न लेवे दी ई
जब देखी डहकावत बिया

केने तोपी केने छोड़ीं
बस खाली उलझावत बिया

नूरैन जी व्यंग्य के तीर छोड़े में भी पीछे नइखन। आज के नेता लोगन पर चुटकी लेबे में इहां के बहुत माहिर बानी-

लोग आगे भी लड़िहें धरम पर इहां
नाम लेके धरम के लड़ावत रहीं

सब गँवा के इ अँखियन के आँसू मिलल
ख़ुद हँसी दोसरो के हँसावत रहीं

चारो ओर छल-प्रपंच के वातावरण बा। लोगन के कथनी-करनी में जमीन असमान के फरक बा। आज के कुचक्र आ दुमुंहापन पर कुछ शेर देखीं:-

मुँहवा पर लोग हँसत बा
पर भीतरे से डसत बा

दोसर असहिं बा बदनाम
अपने साज़िश उ रचत बा

जेकरा में बा सई गो पय,
ताना अब उहो कसत बा.

करत बा जे बर-बेईमानी
वोकरो कहवा रसत बा

जाल बिछाये वाला मनई
खुदे उ जाल में फ़सत बा

हर अमदी दोसरा अमदी के गिरावे में लागल बा। बाकिर इ बात भुला गइल बा कि :-

दोसरा के जे गढ़हा खोदेला
उनके माटी पलीद होखेला

हमनी के इ बात हमेशा याद रखे के चाहीं कि:-

जउना बोली से जिनगी सुधरी
बोली सच में उ तीत होखेला

तुलसी बाबा लिखले बाड़ें ‘भय बिनु होई न प्रीति’। जिनगी में भय के होखल जरूरी बा। तुलसी बाबा के सुर में सुर मिलावत कवि नूरैन कहत बाड़ें:-

भय ज़रूरी बा जिनगी खातिर
कब बिना भय के प्रीत होखेला

इनकर ग़ज़लन के कहे के अंदाज़ बहुत निराला बा। हुसैन जी ग़ज़ल कहे के सलीका से परिचित बानी। बहुत सहज,सरल भाषा में इ ग़ज़लन के कहल गइल बा। इ संग्रह अपने कथ्य और शिल्प दुनो में बेजोड़ बा।

हमरा पुरहर उमेद आ बिस्वास बा कि इहां के भोजपुरी ग़ज़ल के एह संग्रह के पाठक हाथों-हाथ लिहें और ई संग्रह भोजपुरी ग़ज़ल के सफ़र में मील के पत्थर साबित होई । एह ग़ज़ल संग्रह के प्रकाशन पर हमरा तरफ से नूरैन जी के बहुत-बहुत बधाई!

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