समीक्षक: राजेश भोजपुरिया
‘सँउसे चान आकासे’ भोजपुरी की चर्चित कवयित्री डॉ. वीणा पाण्डेय ‘भारती’ का पहला भोजपुरी काव्य-संग्रह है। इसका प्रकाशन जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् द्वारा किया गया है। यह संग्रह भोजपुरी भाषा, लोकजीवन, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं को समर्पित एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति है।
डॉ. वीणा पाण्डेय ‘भारती’ हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन करती हैं। भोजपुरी में उनकी लेखनी विशेष रूप से प्रभावशाली है। इस पुस्तक के प्रकाशन से पहले उनकी दो हिंदी काव्य कृतियाँ-‘सपनों के पंख’ (2020) तथा ‘स्वयंप्रभा के आंगन से’ (2023) प्रकाशित हो चुकी हैं। वे देशभर के अनेक साहित्यिक मंचों पर अपनी कविताओं का सस्वर पाठ कर श्रोताओं के बीच विशिष्ट पहचान बना चुकी हैं।
‘सँउसे चान आकासे’ उनका पहला भोजपुरी काव्य-संग्रह है, जिसमें मातृभाषा, गांव, लोकसंस्कृति, परंपरा और मानवीय रिश्तों से जुड़े भावों को अत्यंत सहज और आत्मीय ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।
“उठत बईठत सांझ सकारे,
याद ना मन से मेट सकेला,
मन में एगो गांव बसेला।।”
इन पंक्तियों में गांव केवल एक स्थान नहीं, बल्कि स्मृतियों, संस्कारों और आत्मीयता का प्रतीक बनकर उभरता है।
कविता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भावात्मक तन्मयता और मुक्त अभिव्यक्ति होती है। डॉ. वीणा पाण्डेय की कविताओं में यही सहज भावधारा निरंतर प्रवाहित होती दिखाई देती है।
“सँउसे चान आकासे बा।
तबो पपिहा प्यासे बा।
मउरल मन के धरती के,
कोना पडल उदासे बा।
खिलल कुमुदिनी के छू के
सिसिकत मंद बतासे बा।”
यह संग्रह भोजपुरी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का सशक्त प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही इसमें मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का भी गहरा स्वर सुनाई देता है। यही कारण है कि यह कृति नई पीढ़ी के रचनाकारों को भोजपुरी साहित्य की ओर आकर्षित करने और सृजन के लिए प्रेरित करने का कार्य करती है।
भोजपुरी शब्दों के सुंदर संयोजन का एक उदाहरण देखिए—
“पवन पावन मोर देश के धरतिया से,
लउकेला सगरो बहार मोर सखिया।
दक्षिणी पवन बही कहेले कहनिया से,
फुलवा खिलेला डार-डार मोर सखिया।।”
डॉ. वीणा पाण्डेय ‘भारती’ की कविताओं को मंच से सुनना एक अलग ही अनुभव होता है। वे अत्यंत भावपूर्ण और तन्मयता के साथ अपनी रचनाओं का पाठ करती हैं। उनकी काव्य प्रस्तुति श्रोताओं को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। वे एक कुशल मंच संचालक भी हैं और अनेक साहित्यिक आयोजनों का सफल संचालन कर चुकी हैं।
इस संग्रह की प्रत्येक कविता और उसमें प्रयुक्त ठेठ भोजपुरी शब्द पाठक को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़ते हैं। सतुआन पर्व पर आधारित यह कविता इसकी सुंदर मिसाल है—
बा सतुआन के परब मौसमी, सतुआ आज सनाइल बा।
साथ मिलल मिरचा पियाज त, चटनी अब अगराइल बा।
खाये के पहिले सतुआ, रुपया छुई आ दान करी।
पंडित जी के दान दक्षिणा, दीं अउरी सम्मान करी।
कहीं कठेस सनाईल सतुआ, सरपट्टा कही मराइल बा।
साथ मिलल मिरचा पियाज त, चटनी अब अगराइल बा।।”
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इस संग्रह में कुल 64 गीत एवं कविताएँ तथा अंत में मुक्तकों का एक संकलन शामिल है। निजी अनुभूतियों के साथ-साथ इसमें भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक परंपराओं का अत्यंत प्रभावी चित्रण मिलता है। कवयित्री किसी कृत्रिम या रंगीन संसार का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि लोकजीवन की सहजता और वास्तविकता को शब्द देती हैं।
“मनवा में उठेला लहरिया हो, सखी अइले ऋतुराज।
अंग अंग छिटके इंजोरिया हो, सखी अइले ऋतुराज।”
“फगुआ में फगुनहटा बहे,
हरियर रंग नहाइल बा।
माटी के खुशबू से हमरो,
मातल मन बउराइल बा।”
डॉ. वीणा पाण्डेय ‘भारती’ भोजपुरी साहित्य में अपनी सशक्त पहचान बनाने की दिशा में निरंतर अग्रसर हैं। उनकी कविताओं में स्त्री चेतना भी प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त हुई है।
“हई सबला अबला मत जनिह,
कदम से कदम मिलाइलें।
मान प्रतिष्ठा गौरव हमहिं,
हमहिं राज रजाइलें।।”
कवयित्री का संवेदनशील व्यक्तित्व केवल उनकी कविताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके व्यवहार और जीवन दृष्टि में भी दिखाई देता है।
“टप टप चुवेला टुटही पलनिया हो, ओरचनवा भींजेला।
बईठल कइसे काटी रतिया हो, ओरचनवा भींजेला।
आंधी पानी आइल, साथे चमके बिजुरिया हो,
धड़कनवा बढ़ेला।।”
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यह काव्य-संग्रह पारंपरिक धार्मिक गीतों, लोकसंस्कृति, मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति गहरे अनुराग का सुंदर दस्तावेज है।
इंग्लिश बोल फारसी बोल, बोल कवनो भाषा।
बड़ी मिठ लागे भोजपुरी, आपन माई भाषा।
आंगन के तुलसी हुलसेली, माई जब गोहरावे।
भर भर लोटा जल ढारेली, दियना रोज जरावे।
भइल पवितर तनमन सगरो, पुरल सब अभिलाषा।
बड़ी मिठ लागे भोजपुरी, आपन माई भाषा।।
पुस्तक के शीर्षक के संबंध में डॉ. वीणा पाण्डेय ‘भारती’ स्वयं लिखती हैं कि ‘सँउसे चान आकासे’ नाम रखने के पीछे उनका विचार यह है कि जीवन के आकाश में पूर्णिमा का चाँद हमेशा मौजूद रहता है। आवश्यकता केवल उसकी चाँदनी को महसूस करने की होती है। जो व्यक्ति उस उजाले को अनुभव नहीं कर पाता, वह मृगतृष्णा में भटकता रहता है। यही भाव इस पूरे काव्य-संग्रह की आत्मा है।
संग्रह में शामिल मुक्तक भी प्रेम, सौहार्द और मातृभाषा के प्रति समर्पण का संदेश देते हैं-
“नेहिया के डोर बान्हे रउरा आईं।
तील गुड़ जईसन सभे मिल जाई।
नफरत के अगिया प डाल दीही पानी,
सभे एक दूसरे के गरवा लगाईं।।”
“भोजपुरी बा जन जन के भाषा।
सबके मन के ई अभिलाषा।
जीवन के गति, लय ई देला,
सरस सरल बा आपन भाषा।।”
‘सँउसे चान आकासे’ भोजपुरी कविता का एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय काव्य-संग्रह है। इसमें लोकजीवन, संस्कृति, मातृभाषा, मानवीय संवेदनाओं और परंपराओं का अत्यंत सुंदर और आत्मीय चित्रण मिलता है। यह पुस्तक भोजपुरी साहित्य के पाठकों के साथ-साथ नई पीढ़ी के रचनाकारों को भी निश्चित रूप से प्रेरित करेगी।

