Bhojpuri24.com की विशेष श्रृंखला ‘भोजपुरी धुरंधर’ में आज परिचय ऐसे साहित्यकार का, जिन्होंने भोजपुरी को केवल लोकभाषा या रचनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे शोध, आलोचना, लोकसाहित्य, हास्य-व्यंग्य और अकादमिक विमर्श की समृद्ध भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डॉ. शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’ समकालीन भोजपुरी और हिंदी साहित्य के उन विशिष्ट हस्ताक्षरों में हैं, जिन्होंने अपनी बहुआयामी लेखनी से भोजपुरी भाषा को नई वैचारिक ऊंचाई प्रदान की है। उनकी रचनाओं में लोकजीवन की संवेदनाएं, सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक चेतना और साहित्यिक गंभीरता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
वे साहित्यकार, समीक्षक, संपादक, शोधकर्ता और शिक्षाविद् के रूप में समान रूप से प्रतिष्ठित हैं। भोजपुरी भाषा के गंभीर अध्ययन, लोक साहित्य के संरक्षण और हास्य-व्यंग्य को साहित्यिक गरिमा प्रदान करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले चार दशकों से वे हिंदी और भोजपुरी साहित्य की निरंतर सेवा कर रहे हैं।
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कैमूर की धरती से निकला भोजपुरी साहित्य का सृजनधर्मी व्यक्तित्व
डॉ. शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’ का जन्म 6 जनवरी 1962 को बिहार के कैमूर (भभुआ) जिले के झलखोरा गांव में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय रामप्यारे राय थे। ग्रामीण परिवेश, लोकजीवन और सामाजिक अनुभवों ने बचपन से ही उनके भीतर भाषा, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी संवेदना विकसित की।

गांव की परंपराएं, लोकगीत, कहावतें और जनजीवन के विविध रंग आगे चलकर उनकी साहित्यिक चेतना का आधार बने। यही कारण है कि उनके साहित्य में लोकजीवन की सहजता और अकादमिक गंभीरता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
शिक्षा और अध्यापन का मजबूत आधार
उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए., पीएचडी तथा पत्रकारिता में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अध्ययन काल से ही साहित्य और शोध के प्रति उनका विशेष झुकाव रहा। उन्होंने भोजपुरी साहित्य को शोधपरक दृष्टि से देखने की परंपरा को मजबूत किया और लोक साहित्य को अकादमिक विमर्श का विषय बनाया।
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वर्तमान में वे शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) के हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। अध्यापन के साथ-साथ वे साहित्य सृजन और शोध निर्देशन में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
हास्य-व्यंग्य और लोकसाहित्य के सशक्त हस्ताक्षर
डॉ. शंकर मुनि राय का साहित्य अनेक विधाओं में विस्तृत है। उन्होंने कविता, व्यंग्य, आलोचना, लोक साहित्य, शोध, संपादन और पाठ्य पुस्तकों के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। विशेष रूप से भोजपुरी साहित्य में हास्य-व्यंग्य को गंभीर साहित्यिक अध्ययन का विषय बनाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।

उनकी चर्चित कृतियों में ‘भोजपुरी साहित्य में हास्य-व्यंग्य’, ‘भोजपुरी लोकसाहित्य में नारी’, ‘अइसन गारी के गारी जनि जानी’, ‘खबर है कि….’, ‘दो मिनट का मौन’ और ‘भोजपुरी गीत-कवित्त’ जैसी पुस्तकें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं में लोकजीवन, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय व्यवहार का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
शोध और संपादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान
डॉ. राय केवल रचनाकार ही नहीं, बल्कि गंभीर शोधकर्ता और संपादक भी हैं। उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य काव्य-दर्शन, धर्म-दर्शन, आदिवासी संस्कृति, लोकसाहित्य, भाषा और संचार माध्यमों जैसे विविध विषयों पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं और संपादित कीं।
उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘भारतीय धर्म-दर्शन’, ‘पाश्चात्य काव्य-दर्शन’, ‘आदिवासी लोकजीवन और संस्कृति’, ‘लोकसाहित्य की भारतीय अवधारणा और नारी’, ‘चुटकुले का वैश्विक इतिहास : सैद्धांतिकी एवं प्रासंगिकता’, ‘हिंदी भाषा और संचार माध्यम’, ‘मुक्तिबोध का साहित्य : युगबोध और प्रवृत्तियां’ तथा ‘सरल व्यावहारिक हिंदी’ शामिल हैं।
उन्होंने साहित्य, संस्कृति और समाज को जोड़ने वाले अनेक संपादित ग्रंथों के माध्यम से शोधार्थियों और विद्यार्थियों को महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री उपलब्ध कराई है।
लोक संस्कृति के संरक्षण में विशेष भूमिका
डॉ. शंकर मुनि राय का साहित्य लोक संस्कृति के संरक्षण का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ी कहावतें, मुहावरे एवं पहेलियां’ जैसी पुस्तक के माध्यम से क्षेत्रीय लोकधरोहर को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।
वहीं भोजपुरी लोकसाहित्य में स्त्री की भूमिका, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों पर उनका अध्ययन शोधार्थियों के लिए उपयोगी माना जाता है।
वे मानते हैं कि किसी भी भाषा की वास्तविक शक्ति उसके लोकजीवन और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित होती है। यही दृष्टि उनकी अधिकांश कृतियों में दिखाई देती है।
साहित्य की विविध विधाओं में सक्रिय लेखनी
डॉ. राय की प्रकाशित पुस्तकों की संख्या बीस से अधिक है। उनकी रचनाधर्मिता कविता, हास्य-व्यंग्य, आलोचना, लोकसाहित्य, शोध, संपादन और पाठ्य पुस्तकों जैसे विविध क्षेत्रों में विस्तृत है। उनकी कृतियां भोजपुरी भाषा, लोक संस्कृति और साहित्यिक विमर्श को नई दिशा प्रदान करती हैं। भोजपुरी साहित्य में ‘भोजपुरी साहित्य में हास्य-व्यंग्य’, ‘भोजपुरी लोकसाहित्य में नारी’, ‘अइसन गारी के गारी जनि जानी’, ‘भोजपुरी गीत-कवित्त’ और ‘कोरोना काल की भोजपुरी कविताई’ जैसी रचनाएं उनकी भोजपुरी के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और शोध दृष्टि को दर्शाती हैं। वहीं ‘पत्नी चालीसा एवं अन्य हास्य कविताएं’, ‘खबर है कि….’ और ‘दो मिनट का मौन’ जैसी कृतियों में उनकी व्यंग्य शैली की विशिष्ट पहचान दिखाई देती है।
साहित्य, संस्कृति और समाज के व्यापक सरोकारों को समेटने वाली उनकी प्रमुख कृतियों में ‘भारतीय धर्म-दर्शन’, ‘पाश्चात्य काव्य-दर्शन’, ‘छत्तीसगढ़ी कहावतें, मुहावरे एवं पहेलियां’, ‘लोकसाहित्य की भारतीय अवधारणा और नारी’, ‘आदिवासी लोकजीवन और संस्कृति’, ‘हिंदी भाषा और संचार माध्यम’, ‘सरल व्यावहारिक हिंदी’, ‘मुक्तिबोध का साहित्य : युगबोध और प्रवृत्तियां’, ‘चुटकुले का वैश्विक इतिहास : सैद्धांतिकी एवं प्रासंगिकता’, ‘यादों में साहित्यकार : बख्शी, मुक्तिबोध और बलदेव प्रसाद मिश्र’ तथा ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ प्रमुख हैं।
क्यों हैं भोजपुरी धुरंधर?
डॉ. शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’ को ‘भोजपुरी धुरंधर’ इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भोजपुरी भाषा को शोध, आलोचना, हास्य-व्यंग्य और लोकसाहित्य के माध्यम से नई वैचारिक पहचान दी है।
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उन्होंने यह सिद्ध किया कि भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि गंभीर साहित्य, अकादमिक अध्ययन और सांस्कृतिक विमर्श की भी समृद्ध भाषा है।
उनकी लेखनी में लोकजीवन की आत्मीयता, शोध की प्रामाणिकता, व्यंग्य की तीक्ष्णता और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। वे उन साहित्य साधकों में हैं, जिन्होंने भोजपुरी साहित्य को विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और राष्ट्रीय साहित्यिक विमर्श तक पहुंचाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
भोजपुरी धुरंधर श्रृंखला में डॉ. शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’ का नाम उस साहित्य पुरोधा के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी बहुआयामी लेखनी से भोजपुरी भाषा को ज्ञान, शोध, लोक संस्कृति और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम बनाया।

